श्रीराम-भरतादि का संवाद

सभा में श्रीरामजी, भरतजी और अन्य वरिष्ठ जनों के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा को लेकर गंभीर संवाद होता है। भरतजी की विनय और श्रीरामजी की मर्यादा दोनों इस प्रसंग को अत्यंत पवित्र बनाते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४१ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई॥ लखि अपनें सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू॥ १ ॥

अर्थ:

मुनि के वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर—गुरु तथा स्वामी को भरपेट अपने अनुकूल जानकर—सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरतजी कुछ कह नहीं सकते। वे विचार करने लगे।

चौपाई

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥ कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥ २ ॥

अर्थ:

शरीर से पुलकित होकर वे सभा में खड़े हो गये। कमल के समान नेत्रों में प्रेमाश्रुओं की बाढ़ आ गयी। [वे बोले—] मेरा कहना तो मुनिनाथ ने ही निबाह दिया (जो कुछ मैं कह सकता था वह उन्होंने ही कह दिया)। इससे अधिक मैं क्या कहूँ ?

चौपाई

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥ मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥ ३ ॥

अर्थ:

अपने स्वामी का स्वभाव मैं जानता हूँ। वे अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझ पर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। मैंने खेल में भी कभी उनकी रिस (अप्रसन्नता) नहीं देखी।

चौपाई

सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥ मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही॥ ४ ॥

अर्थ:

बचपन से ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मन को कभी नहीं तोड़ा (मेरे मन के प्रतिकूल कोई काम नहीं किया)। मैंने प्रभु की कृपा की रीति को हृदय में भलीभाँति देखा (अनुभव किया) है। मेरे हारने पर भी खेल में प्रभु मुझे जिता देते रहे हैं।

दोहा

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन। दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन॥ २६० ॥

अर्थ:

मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामने मुँह नहीं खोला। प्रेम के प्यासे मेरे नेत्र आज तक प्रभु के दर्शन से तृप्त नहीं हुए।

दोहा 261 के अंतर्गत
चौपाई

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा॥ यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा॥ १ ॥

अर्थ:

परन्तु विधाता मेरा दुलार न सह सका। उसने नीच माता के बहाने [मेरे और स्वामी के बीच] अन्तर डाल दिया। यह भी कहना आज मुझे शोभा नहीं देता। क्योंकि अपनी समझ से कौन साधु और पवित्र हुआ है? (जिसको दूसरे साधु और पवित्र मानें, वही साधु है)।

चौपाई

मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली॥ फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली॥ २ ॥

अर्थ:

माता नीच है और मैं सदाचारी और साधु हूँ, ऐसा हृदय में लाना ही करोड़ दुराचारों के समान है। क्या कोदों की बाली उत्तम धान फल सकती है? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है?

चौपाई

सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू॥ बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू॥ ३ ॥

अर्थ:

स्वप्न में भी किसी को दोष का लेश भी नहीं है। मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र है। मैंने अपने पापों का परिणाम समझे बिना ही माता को कट वचन कहकर व्यर्थ ही जलाया।

चौपाई

हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा॥ गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं अपने हृदय में सब ओर खोजकर हार गया (मेरी भलाई का कोई साधन नहीं सूझता)। एक ही प्रकार भले ही (निश्चय ही) मेरा भला है। वह यह है कि गुरु महाराज सर्वसमर्थ हैं और श्रीसीतारामजी मेरे स्वामी हैं। इसी से परिणाम मुझे अच्छा जान पड़ता है।

दोहा

साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सतिभाउ। प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ॥ २६१ ॥

अर्थ:

साधुओं की सभा में गुरुजी और स्वामी के निकट इस पवित्र तीर्थ-स्थान में मैं सत्य भाव से कहता हूँ। यह प्रेम है या प्रपंच ? झूठ है या सच? इसे [सर्वज्ञ] मुनि वसिष्ठजी और [अन्तर्यामी] श्रीरघुनाथजी जानते हैं।

दोहा 262 के अंतर्गत
चौपाई

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी॥ देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं॥ १ ॥

अर्थ:

प्रेम के प्रण को निबाहकर महाराज (पिताजी) का मरना और माता की कुमति, दोनों का सारा संसार साक्षी है। माताएँ व्याकुल हैं, वे देखी नहीं जातीं। अवधपुरी के नर-नारी दुःसह ताप से जल रहे हैं।

चौपाई

महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला॥ सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा॥ बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ॥ बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू॥ २-३ ॥

अर्थ:

मैं ही इन सारे अनर्थों का मूल हूँ, यह सुन और समझकर मैंने सब दुःख सहे हैं। श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण और सीताजी के साथ मुनियों का-सा वेष धारण कर बिना जूते पहने पैदल ही वन को चले गये; यह सुनकर, शंकरजी साक्षी हैं, इस घाव से भी मैं जीता रह गया (यह सुनते ही मेरे प्राण नहीं निकल गये)! फिर निषादराज का प्रेम देखकर भी इस वज्र से भी कठोर हृदय में छेद नहीं हुआ (यह फटा नहीं)।

चौपाई

अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई॥ जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी॥ ४ ॥

अर्थ:

अब यहाँ आकर सब आँखों से देख लिया। जीता हुआ जीव जड़ होकर भी सब की सहायता करता है। जिनको देखकर रास्ते की साँपिनी और बिच्छी भी अपने भयंकर विष और तीक्ष्ण तामस को त्याग देती हैं।

दोहा

तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि। तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि॥ २६२ ॥

अर्थ:

वे ही श्रीरघुनंदन, लक्ष्मण और सीता जिसको अनहित लगे, उस तासु तनय को छोड़कर दैव दुःसह दुःख और किसे सहावैगा?

दोहा 263 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी॥ सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू॥ १ ॥

अर्थ:

अत्यन्त व्याकुल तथा दुःख, प्रेम, विनय और नीति में सनी हुई भरतजी की श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब लोग शोक में मग्न हो गये, सारी सभा में विषाद छा गया। मानो कमल के वन पर पाला पड़ गया हो।

चौपाई

कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी॥ बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू॥ २ ॥

अर्थ:

तब ज्ञानी मुनि ने अनेक प्रकार की पुरानी कथाएँ कहकर भरतजी का समाधान किया। फिर सूर्यकुलरूपी कुमुदवन को प्रफुल्लित करने वाले चन्द्रमा श्रीरघुनंदन उचित वचन बोले--।

चौपाई

तात जायँ जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी॥ तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरें॥ ३ ॥

अर्थ:

हे तात! तुम अपने हृदय में व्यर्थ ही ग्लानि करते हो। जीव की गति को ईश्वर के अधीन जानो। मेरे मत में तीनों कालों और तीनों लोकों के सब पुण्यशाली लोग, तात, तुमसे नीचे हैं।

चौपाई

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई॥ दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई॥ ४ ॥

अर्थ:

हृदय में भी तुम पर कुटिलता का आरोप करने से यह लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं। माता कैकेयी को तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया है।

दोहा

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार॥ २६३ ॥

अर्थ:

हे भरत! तुम्हारे नाम-स्मरण से सब पाप, प्रपंच और समस्त अमंगलों का भार मिट जाएगा तथा इस लोक में सुन्दर यश और परलोक में सुख प्राप्त होगा।

दोहा 264 के अंतर्गत
चौपाई

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी॥ तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ॥ १ ॥

अर्थ:

हे भरत! मैं स्वभाव से ही सत्य कहता हूँ, शिवजी साक्षी हैं, भरत भूमि तुम्हारी ही रखी रही है। हे तात! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो। वैर और प्रेम छिपाये नहीं छिपते।

चौपाई

मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥ हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥ २ ॥

अर्थ:

मुनियों के निकट पक्षी और मृग चले जाते हैं, पर हिंसा करने वाले बधिकों को देखकर भाग जाते हैं। मित्र और शत्रु को पशु-पक्षी भी पहचानते हैं। फिर मनुष्य शरीर तो गुण और ज्ञान का भण्डार है।

चौपाई

तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें॥ राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी॥ ३ ॥

अर्थ:

हे तात! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। क्या करूँ? जी में बड़ा असमंजस है। राजा ने मुझे त्यागकर सत्य को रखा और प्रेम-प्रण के लिए शरीर छोड़ दिया।

चौपाई

तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥ ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

उनके वचन को मेटने में मन में सोच होता है। उससे भी अधिक तुम्हारा संकोच है। उस पर गुरुजी ने मुझे आज्ञा दी है। इसलिए अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वही करना चाहता हूँ।

दोहा

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु। सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु॥ २६४ ॥

अर्थ:

तुम मन को प्रसन्न कर और संकोच त्याग कर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूँ। सत्यसंध रघुबर का यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया।

दोहा 265 के अंतर्गत
चौपाई

सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू॥ बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं॥ १ ॥

अर्थ:

देवगणों सहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना-बनाया काम बिगड़ना ही चाहता है। कुछ उपाय करते नहीं बनता। तब वे सब मन ही मन श्रीरामजी की शरण गये।

चौपाई

बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं॥ सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा॥ २ ॥

अर्थ:

फिर विचार करके आपस में कहने लगे कि श्रीरघुनाथजी तो भक्त की भक्ति के वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासा की [घटना] याद करके तो देवता और इन्द्र बिलकुल ही निराश हो गये।

चौपाई

सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा॥ लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा॥ ३ ॥

अर्थ:

पहले देवताओं ने बहुत समय तक दुःख सहे। तब भक्त प्रह्लाद ने ही नरहरि को प्रकट किया था। सब देवता परस्पर कानों से लग-लगकर और सिर धुनकर कहते हैं कि अब देवताओं का काम भरत के हाथ है।

चौपाई

आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा॥ हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि॥ ४ ॥

अर्थ:

हे देवताओं! और कोई उपाय नहीं दिखायी देता। श्रीरामजी अपने सुसेवकों की सेवा को मानते हैं। अतएव अपने गुण और शील से श्रीरामजी को वश में करने वाले भरतजी को सब लोग अपने-अपने हृदय में प्रेम सहित स्मरण करो।

दोहा

सुनि सुरमत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु। सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु॥ २६५ ॥

अर्थ:

देवताओं का मत सुनकर देवगुरु ने कहा--अच्छा, तुम्हारा विचार बहुत बड़ा भाग्यशाली है। जगत में भरत के चरणों का अनुराग समस्त मंगलों का मूल है।

दोहा 266 के अंतर्गत
चौपाई

सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई॥ भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई॥ १ ॥

अर्थ:

सीतानाथ श्रीरामजी के सेवक की सेवकाई सैकड़ों कामधेनुओं के समान सुहावनी है। तुम्हारे मन में भरतजी की भक्ति आ गयी है, तो सोच छोड़ दो। विधाता ने बात बना दी।

चौपाई

देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ॥ मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

हे देवराज! भरतजी का प्रभाव तो देखो। श्रीरघुनाथजी सहज स्वभाव से ही उनके पूर्ण रूप से वश में हैं। हे देवताओं! भरतजी को श्रीरामचन्द्रजी की परछाईं जानकर मन स्थिर करो, डर की बात नहीं है।

चौपाई

सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू॥ निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना॥ ३ ॥

अर्थ:

देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओं की सम्मति और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजी को संकोच हुआ। भरतजी ने अपने मन में सब बोझा अपने ही सिर जाना और वे हृदय में करोड़ों प्रकार के अनुमान करने लगे।

चौपाई

करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका॥ निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा॥ ४ ॥

अर्थ:

सब तरह से विचार करके अन्त में उन्होंने मन में यही निश्चय किया कि श्रीरामजी की आज्ञा में ही अपना कल्याण है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा। यह कुछ कम कृपा और स्नेह नहीं किया (अर्थात् अत्यन्त ही अनुग्रह और स्नेह किया)।

दोहा

कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ। करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ॥ २६६ ॥

अर्थ:

श्रीजानकीनाथजी ने सब प्रकार से मुझ पर अत्यन्त अपार अनुग्रह किया। तदनन्तर भरतजी दोनों कर-कमलों को जोड़कर प्रणाम करके बोले--।

दोहा 267 के अंतर्गत
चौपाई

कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी॥ गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला॥ १ ॥

अर्थ:

हे स्वामी! हे कृपा के समुद्र! हे अन्तर्यामी! अब मैं [अधिक] क्या कहूँ और क्या कहाऊँ? गुरु महाराज को प्रसन्न और स्वामी को अनुकूल जानकर मेरे मलिन मन की कल्पित पीड़ा मिट गयी।

चौपाई

अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें॥ मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई॥ २ ॥

अर्थ:

मैं मिथ्या डर से ही डर गया था। मेरे सोच की जड़ ही न थी। दिशा भूल जाने पर हे देव! सूर्य का दोष नहीं है। मेरा अभाग्य, माता की कुटिलता, विधि की विषम गति और काल की कठिनाई।

चौपाई

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला॥ यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई॥ ३ ॥

अर्थ:

इन सबने मिलकर पाँव रोपकर मुझे घेरा था। शरणागत-पालक ने अपना प्रण निभाया। यह आपकी कोई नयी रीति नहीं है। यह लोक और वेद में विदित है, छिपी नहीं है।

चौपाई

जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं॥ देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

सारा जगत् बुरा हो; किन्तु हे स्वामी! केवल एक आप ही भले हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाई से भला हो सकता है? हे देव! आपका स्वभाव कल्पवृक्ष के समान है; वह न कभी किसी के सम्मुख है, न विमुख।

दोहा

जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच। मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच॥ २६७ ॥

अर्थ:

उस वृक्ष (कल्पवृक्ष) को पहचानकर जो उसके पास जाय, उसकी छाया ही सारी चिन्ताओं को नष्ट करनेवाली है। राजा-रंक, भले-बुरे, जगत् में सभी उससे माँगते ही मनचाही वस्तु पाते हैं।

दोहा 268 के अंतर्गत
चौपाई

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू॥ अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई॥ १ ॥

अर्थ:

गुरु और स्वामी का सब प्रकार से स्नेह देखकर मेरा क्षोभ मिट गया, मन में कुछ भी संदेह नहीं रहा। हे करुणाकर! अब वही कीजिए, जिससे जन-हित में प्रभु के चित्त में क्षोभ न हो।

चौपाई

जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची॥ सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई॥ २ ॥

अर्थ:

जो सेवक स्वामी को संकोच में डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है। सेवक का हित तो इसी में है कि वह समस्त सुखों और लोभों को छोड़कर स्वामी की सेवा ही करे।

चौपाई

स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका॥ यह स्वारथ परमारथ सारू। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू॥ ३ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपके लौटने में सभी का स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा पालन करने में करोड़ों प्रकार से कल्याण है। यही स्वार्थ और परमार्थ का सार है, समस्त पुण्यों का फल और सम्पूर्ण शुभ गतियों का शृंगार है।

चौपाई

देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी॥ तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना॥ ४ ॥

अर्थ:

हे देव! आप मेरी एक विनती सुनकर, फिर जैसा उचित हो वैसा ही कीजिए। तिलक की सब सामग्री सजाकर लायी गयी है, यदि प्रभु का मन माने तो उसे सफल कीजिए (उसका उपयोग कीजिए)।

दोहा

सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ॥ २६८ ॥

अर्थ:

छोटे भाई शत्रुघ्न समेत मुझे वन में भेज दीजिए और [अयोध्या लौटकर] सबको सनाथ कीजिए। नहीं तो किसी तरह भी, यदि आप अयोध्या जाने को तैयार न हों, हे नाथ! दोनों भाइयों को लौटा दीजिए और मैं आपके साथ चलूँ।

दोहा 269 के अंतर्गत
चौपाई

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई॥ जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई॥ १ ॥

अर्थ:

अथवा हम तीनों भाई वन चले जायें और हे श्रीरघुनाथजी! आप श्रीसीताजी सहित [अयोध्या को] लौट जाइये। हे दयासागर! जिस प्रकार से प्रभु का मन प्रसन्न हो, वही कीजिए।

चौपाई

देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारू। मोरें नीति न धरम बिचारू॥ कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू॥ २ ॥

अर्थ:

हे देव! आपने सारा भार मुझ पर रख दिया। पर मुझ में न तो नीति का विचार है, न धर्म का। मैं तो अपने स्वार्थ के लिये सब बातें कह रहा हूँ। आर्त के चित्त में चेत नहीं रहता।

चौपाई

उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई॥ अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू॥ ३ ॥

अर्थ:

स्वामी की आज्ञा सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवक को देखकर लज्जा भी लजा जाती है। मैं अवगुणों का ऐसा अथाह समुद्र हूँ [कि प्रभु को उत्तर दे रहा हूँ]। किन्तु स्वामी आप स्नेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं!

चौपाई

अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा॥ प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

हे कृपालु! अब तो वही मत मुझे भाता है, जिससे स्वामी का मन संकोच न पावे। प्रभु के चरणों की शपथ है, मैं सत्य भाव से कहता हूँ, जगत् के कल्याण के लिये एक यही उपाय है।

दोहा

प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब। सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब॥ २६९ ॥

अर्थ:

प्रभु प्रसन्न मन से संकोच त्यागकर जिसे जो आज्ञा देंगे, उसे सब लोग सिर पर धरकर [पालन] करेंगे और सब उपद्रव और उलझनें मिट जायँगी।

दोहा 270 के अंतर्गत
चौपाई

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥ असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी के पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओं ने फूल बरसाये। अयोध्या निवासी असमंजस के वश हो गये। तपस्वी और वनवासी लोग मन में परम आनन्दित हुए।

चौपाई

चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची॥ जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए॥ २ ॥

अर्थ:

किन्तु संकोची श्रीरघुनाथजी चुप ही रह गये। प्रभु की यह स्थिति देखकर सारी सभा सोच में पड़ गयी। उसी समय जनकजी के दूत आये, यह सुनकर मुनि वसिष्ठजी ने उन्हें तुरंत बुलवा लिया।

चौपाई

करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे॥ दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता॥ ३ ॥

अर्थ:

उन्होंने [आकर] प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजी को देखा। उनका वेष देखकर वे बहुत ही दुखी हुए। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी ने दूतों से बात पूछी कि राजा जनक का कुशल-समाचार कहो।

चौपाई

सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चरबर जोरें हाथा॥ बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

यह सुनकर सकुचाकर पृथ्वी पर मस्तक नवाकर वे श्रेष्ठ दूत हाथ जोड़कर बोले—हे स्वामी! आपका आदर के साथ पूछना, यही हे गोसाईं! कुशल का कारण हो गया।

दोहा

नाहिं त कोसलनाथ कें साथ कुसल गइ नाथ। मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ॥ २७० ॥

अर्थ:

नहीं तो, हे नाथ! कोसलनाथ के साथ ही कुशल भी चली गयी। [उनके चले जाने से] यों तो सारा जगत् ही अनाथ हो गया, किन्तु मिथिला और अवध तो विशेष रूप से अनाथ हो गये।

दोहा 271 के अंतर्गत
चौपाई

कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोकबस बौरा॥ जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू॥ १ ॥

अर्थ:

अयोध्यानाथ की गति (दशरथजी का मरण) सुनकर जनकपुरवासी सभी लोग शोकवश बावले हो गये (सुध-बुध भूल गये)। उस समय जिसने भी विदेह को [शोकमग्न] देखा, उसे ऐसा न लगा कि उनका विदेह नाम सत्य है! [क्योंकि देहाभिमान से शून्य पुरुष को शोक कैसा?]

चौपाई

रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि॥ भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू॥ २ ॥

अर्थ:

रानी की कुचाल सुनकर राजा जनकजी को कुछ सूझ न पड़ा, जैसे मणि के बिना साँप को नहीं सूझता। फिर भरतजी का राज्य और श्रीरामचन्द्रजी का वनवास सुनकर मिथिलेश्वर जनकजी के हृदय में बड़ा दुःख हुआ।

चौपाई

नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥ समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा ने विद्वानों और मन्त्रियों के समाज से पूछा कि विचारकर कहिये, आज (इस समय) क्या करना उचित है? अयोध्या की दशा समझकर और दोनों प्रकार से असमंजस जानकर “चलिये या रहिये?” किसी ने कुछ नहीं कहा।

चौपाई

नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी॥ बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

[जब किसी ने कोई सम्मति नहीं दी] तब राजा ने धीरज धर कर हृदय में विचारकर चार चतुर गुप्तचर अयोध्या भेजे [और उनसे कह दिया कि] तुम लोग [श्रीरामजी के प्रति] भरतजी के सद्भाव (अच्छे भाव, प्रेम) या दुर्भाव (बुरा भाव, विरोध) का [यथार्थ] पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसी को तुम्हारा पता न लगने पाये।

दोहा

गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति। चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति॥ २७१ ॥

अर्थ:

गुप्तचर अवध को गये और भरतजी का ढंग जानकर तथा उनकी करनी देखकर, वे चित्रकूट को चले। भरतजी के साथ चारों तिरहुत चले गये।