भरतजी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण

भरतजी विविध तीर्थों के जल को श्रद्धापूर्वक स्थापित करते हैं और चित्रकूट के पवित्र स्थलों का दर्शन करते हैं। उनका प्रत्येक आचरण इस भूमि के प्रति आदर और श्रीरामजी के प्रति प्रेम से भरा हुआ है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४७ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई॥ सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी ने अत्रिमुनि की आज्ञा पाकर जल के सब पात्र रवाना कर दिये और अपने छोटे भाई के साथ, अत्रि मुनि तथा अन्य साधु-सन्तों सहित आप वहाँ गये जहाँ वह अथाह कुआँ था।

चौपाई

पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा॥ तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू॥ २ ॥

अर्थ:

और उस पवित्र जल को उस पुण्यस्थल में रख दिया। तब अत्रि ऋषि ने प्रेम से आनन्दित होकर ऐसा कहा-हे तात! यह अनादि सिद्धस्थल है। कालक्रम से यह लोप हो गया था इसलिये किसी को इसका पता नहीं था।

चौपाई

तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा॥ बिधिबस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू॥ ३ ॥

अर्थ:

तब [भरतजी के] सेवकों ने उस जलयुक्त स्थान को देखा और उस सुन्दर [तीर्थों] के जल के लिये एक खास कुआँ बना लिया। दैवयोग से विश्वभर का उपकार हो गया। धर्म का विचार जो अत्यन्त अगम था, वह [इस कूप के प्रभाव से] सुगम हो गया।

चौपाई

भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा॥ प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी॥ ४ ॥

अर्थ:

अब इसको लोग भरतकूप कहेंगे। तीर्थों के जल के संयोग से तो यह अत्यन्त ही पवित्र हो गया। इसमें प्रेमपूर्वक नियम से स्नान करने पर प्राणी मन, वचन और कर्म से निर्मल हो जायँगे।

दोहा

कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ। अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ॥ ३१० ॥

अर्थ:

कूप की महिमा कहते हुए सब लोग वहाँ गये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। श्रीरघुनाथजी को अत्रिजी ने उस तीर्थ का पुण्य प्रभाव सुनाया।

दोहा 311 के अंतर्गत
चौपाई

कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती॥ नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई॥ १ ॥

अर्थ:

प्रेमपूर्वक धर्म के इतिहास कहते वह रात सुख से बीत गयी और सबेरा हो गया। भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई नित्यक्रिया पूरी करके, श्रीरामजी, अत्रिजी और गुरु वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर,।

चौपाई

सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें॥ कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं॥ २ ॥

अर्थ:

समाजसहित सब सादे साज से श्रीरामजी के वन में भ्रमण (प्रदक्षिणा) करने के लिये पैदल ही चले। कोमल चरण हैं और बिना जूते के चल रहे हैं, यह देखकर पृथ्वी मन-ही-मन सकुचाकर कोमल हो गयी।

चौपाई

कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं॥ महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे॥ ३ ॥

अर्थ:

कुश, काँटे, कंकड़ी, दरारें आदि कड़वी, कठोर और बुरी वस्तुओं को छिपाकर पृथ्वी ने सुन्दर और कोमल मार्ग कर दिये। सुखों को साथ लिये (सुखदायक) शीतल, मंद, सुगन्ध हवा चलने लगी।

चौपाई

सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं॥ मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी॥ ४ ॥

अर्थ:

रास्ते में देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल-फलकर, तृण अपनी कोमलता से, मृग देखकर और पक्षी सुन्दर वाणी बोलकर--सभी भरतजी को श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे।

दोहा

सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात। राम प्रानप्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात॥ ३११ ॥

अर्थ:

जब एक साधारण मनुष्य को भी [आलस्य से] जँभाई लेते समय 'राम' कह देने से ही सब सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं, तब श्रीरामचन्द्रजी के प्राणप्रिय भरतजी के लिये यह कोई बड़ी (आश्चर्य की) बात नहीं है।

दोहा 312 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं॥ पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार भरतजी वन में फिर रहे हैं। उनके नियम और प्रेम को देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। पवित्र जल के स्थान (नदी, बावली, कुण्ड आदि), पृथ्वी के पृथक्-पृथक् भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, तृण, पर्वत, वन और बगीचे--

चौपाई

चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी॥ सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ॥ २ ॥

अर्थ:

सभी विशेषरूप से सुन्दर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरतजी पूछते हैं और उनका प्रश्न सुनकर ऋषिराज अत्रिजी प्रसन्न मन से सब के हेतु, नाम, गुण और पुण्य-प्रभाव को कहते हैं।

चौपाई

कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा॥ कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई॥ ३ ॥

अर्थ:

भरतजी कहीं स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं, कहीं मनोहर स्थानों के दर्शन करते हैं और कहीं मुनि अत्रिजी की आज्ञा पाकर बैठकर, सीताजी सहित श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयों का स्मरण करते हैं।

चौपाई

देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा॥ फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी के स्वभाव, प्रेम और सुन्दर सेवाभाव को देखकर वनदेवता आनन्दित होकर आशीर्वाद देते हैं। यों घूम-फिरकर ढाई पहर दिन बीतने पर लौट पड़ते हैं और आकर प्रभु श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों का दर्शन करते हैं।

दोहा

देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ॥ ३१२ ॥

अर्थ:

भरतजी ने पाँच दिन में सब तीर्थस्थानों के दर्शन कर लिये। भगवान् विष्णु और महादेवजी का सुन्दर यश कहते-सुनते वह (पाँचवाँ) दिन भी बीत गया, सन्ध्या हो गयी।