भरतजी का अयोध्या लौटना, भरतजी द्वारा पादुका की स्थापना, नंदिग्राम में निवास और श्रीभरतजी के चरित्र श्रवण की महिमा
भरतजी अयोध्या लौटकर श्रीरामजी की पादुकाओं को राज्यासन पर स्थापित करते हैं और स्वयं नंदिग्राम में तपस्वी भाव से निवास करते हैं। अंत में उनके निर्मल चरित्र और उसके श्रवण की महिमा का वर्णन किया गया है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४९ / ४९
प्रकरण पाठ
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा॥ नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥ ४ ॥
अर्थ:
सबको छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित श्रीरामचन्द्रजी ने यथायोग्य विनय एवं प्रणाम करके विदा किया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने छोटे, मध्यम (मझले) और बड़े सभी श्रेणी के स्त्री-पुरुषों का सम्मान करके उनको लौटाया।
परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता॥ करि प्रनामु भेंटीं सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू॥ १ ॥
अर्थ:
प्राणप्रिय पति श्रीरामचन्द्रजी के साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नैहर के कुटुम्बियों से तथा माता-पिता से मिलकर लौट आयीं। फिर प्रणाम करके सब सासुओं से गले लगकर मिलीं। उनके प्रेम का वर्णन करने के लिये कवि के हृदय में हुलास (उत्साह) नहीं होता।
सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई॥ रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाईं॥ २ ॥
अर्थ:
उनकी शिक्षा सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीताजी सासुओं तथा माता-पिता दोनों ओर की प्रीति में समायी (बहुत देर तक निमग्न) रहीं! [तब] श्रीरघुनाथजी ने सुन्दर पालकियाँ मँगवायीं और सब माताओं को आश्वासन देकर उन पर चढ़ाया।
बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥ कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी॥ १ ॥
अर्थ:
फिर सम्मान करके निषादराज को विदा किया। वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदय में विरह का बड़ा भारी विषाद था। फिर कोल, किरात, भील आदि वनवासी लोगों को लौटा दिया। वे सब जोहार-जोहारकर (वन्दना कर-करके) लौटे।
प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं॥ भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी॥ २ ॥
अर्थ:
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी बड़ी छाया में बैठकर प्रियजन एवं परिवार के वियोग से दुखी हो रहे हैं। भरतजी के स्नेह, स्वभाव और सुन्दर वाणी का बखान-बखानकर वे प्रिय अनुज से कहने लगे।
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी॥ तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना॥ ३ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम के वश होकर भरतजी के वचन, मन और कर्म की प्रीति तथा प्रतीति का अपने श्रीमुख से वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु और जल की मछलियाँ, चित्रकूट के चर-अचर सभी जीव उदास हो गये।
बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की॥ प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरघुनाथजी की दशा देखकर देवताओं ने उन पर फूल बरसाकर अपनी घर-घर की दशा कही (दुखड़ा सुनाया)। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें प्रणाम कर आश्वासन दिया। तब वे प्रसन्न होकर चले, मन में जरा-सा भी डर न रहा।
परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए॥ सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी॥ ३ ॥
अर्थ:
भरतजी ने फिर परिवार के लोगों को, नगरवासियों को तथा अन्य प्रजा को बुलाकर, उनका समाधान करके उन्हें सुखपूर्वक बसा दिया। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजी सहित वे गुरुजी के घर गये और दण्डवत् करके हाथ जोड़कर बोले—
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा॥ रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥ ४ ॥
अर्थ:
उसी अयोध्यापुरी में भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पा के बाग में भौंरा। श्रीरामचन्द्रजी के प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मी के विलास [भोगैश्वर्य] को वमन की भाँति त्याग देते हैं (फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं)।
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति॥ ३२४ ॥
अर्थ:
फिर भरतजी तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम के पात्र हैं। वे इस करनी से बड़े नहीं हुए; यह उनके लिये कोई बड़ी बात नहीं है। पृथ्वी के जल न पीने की टेक से चातक की और नीर-क्षीर-विवेक की विभूति से हंस की भी सराहना होती है।
ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी॥ राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा॥ ३ ॥
अर्थ:
विश्वास ही [उस आकाश में] ध्रुवतारा है, चौदह वर्षों की अवधि पूर्णिमा के समान है, और स्वामी श्रीरामजी की स्मृति आकाश-पथ में प्रकाशित है। राम-प्रेम ही अचल और कलंक-दोषरहित चन्द्रमा है। वह अपने समाज [नक्षत्रों] सहित नित्य सुन्दर सुशोभित है।
भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती॥ बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
भरतजी की रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्य का वर्णन करने में सभी सुकवि सकुचाते हैं; क्योंकि वहाँ [औरों की तो बात ही क्या] स्वयं शेष, गणेश और सरस्वती की भी पहुँच नहीं है।
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥ लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं॥ १ ॥
अर्थ:
शरीर पुलकित है, हृदय में श्रीसीता-रामजी हैं। जीभ राम-नाम जप रही है, लोचनों में प्रेम का नीर है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वन में बसते हैं, परन्तु भरतजी भवन ही में रहकर तप के द्वारा शरीर को कसते हैं।
सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को। मुनिमन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥ दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को। कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥
अर्थ:
श्रीसीतारामजी के प्रेमरूपी अमृत से परिपूर्ण भरतजी का जन्म यदि न होता, तो मुनियों के मन को भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि विषम व्रतों का आचरण कौन करता? दुःख, दाह, दरिद्रता, दंभ और दूषणों को अपने सुयश के बहाने कौन हरता? तथा कलिकाल में तुलसी जैसे शठों को हठपूर्वक कौन श्रीरामजी के सम्मुख करता?॥