भरतजी का अयोध्या लौटना, भरतजी द्वारा पादुका की स्थापना, नंदिग्राम में निवास और श्रीभरतजी के चरित्र श्रवण की महिमा

भरतजी अयोध्या लौटकर श्रीरामजी की पादुकाओं को राज्यासन पर स्थापित करते हैं और स्वयं नंदिग्राम में तपस्वी भाव से निवास करते हैं। अंत में उनके निर्मल चरित्र और उसके श्रवण की महिमा का वर्णन किया गया है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४९ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई॥ देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ॥ १ ॥

अर्थ:

छोटे भाई लक्ष्मणजी समेत श्रीरामजी ने राजा जनकजी को सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकार से विनती और बड़ाई की [और कहा--] हे देव! दयावश आपने बहुत दुःख पाया। आप समाज सहित वन में आये।

चौपाई

पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा॥ मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने॥ २ ॥

अर्थ:

अब आशीर्वाद देकर नगर को पधारिये। यह सुन राजा जनकजी ने धीरज धरकर गमन किया। फिर श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि, ब्राह्मण और साधुओं को विष्णु और शिव के समान जानकर सम्मान करके उनको विदा किया।

चौपाई

सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई॥ कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली॥ ३ ॥

अर्थ:

तब श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाई सास (सुनयनाजी) के पास गये और उनके चरणों की वन्दना करके आशीर्वाद पाकर लौट आये। फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और शुभ आचरण वाले कुटुम्बी, नगर निवासी और मन्त्री--।

चौपाई

जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा॥ नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥ ४ ॥

अर्थ:

सबको छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित श्रीरामचन्द्रजी ने यथायोग्य विनय एवं प्रणाम करके विदा किया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने छोटे, मध्यम (मझले) और बड़े सभी श्रेणी के स्त्री-पुरुषों का सम्मान करके उनको लौटाया।

दोहा

भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि। बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि॥ ३१९ ॥

अर्थ:

भरत की माता कैकेयी के चरणों की वन्दना करके प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने पवित्र (निश्छल) प्रेम के साथ उनसे मिल-भेंटकर तथा उनके सारे संकोच और सोच को मिटाकर पालकी सजाकर उनको विदा किया।

दोहा 320 के अंतर्गत
चौपाई

परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता॥ करि प्रनामु भेंटीं सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू॥ १ ॥

अर्थ:

प्राणप्रिय पति श्रीरामचन्द्रजी के साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नैहर के कुटुम्बियों से तथा माता-पिता से मिलकर लौट आयीं। फिर प्रणाम करके सब सासुओं से गले लगकर मिलीं। उनके प्रेम का वर्णन करने के लिये कवि के हृदय में हुलास (उत्साह) नहीं होता।

चौपाई

सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई॥ रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाईं॥ २ ॥

अर्थ:

उनकी शिक्षा सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीताजी सासुओं तथा माता-पिता दोनों ओर की प्रीति में समायी (बहुत देर तक निमग्न) रहीं! [तब] श्रीरघुनाथजी ने सुन्दर पालकियाँ मँगवायीं और सब माताओं को आश्वासन देकर उन पर चढ़ाया।

चौपाई

बार बार हिलि मिलि दुहु भाईं। सम सनेहँ जननीं पहुँचाईं॥ साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना॥ ३ ॥

अर्थ:

दोनों भाइयों ने माताओं से समान प्रेम से बार-बार मिल-जुलकर उनको पहुँचाया। भरतजी और राजा जनकजी के दलों ने घोड़े, हाथी और अनेक तरह की सवारियाँ सजाकर प्रस्थान किया।

चौपाई

हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता॥ बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें॥ ४ ॥

अर्थ:

सीताजी एवं लक्ष्मणजी सहित श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में रखकर सब लोग बेसुध हुए चले जा रहे हैं। बैल, घोड़े, हाथी आदि पशु हृदय में हारे हुए परवश मनमारे चले जा रहे हैं।

दोहा

गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत। फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत॥ ३२० ॥

अर्थ:

गुरु वसिष्ठजी और गुरुपत्नी अरुन्धतीजी के चरणों की वन्दना करके सीताजी और लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी हर्ष और विस्मय के साथ लौटकर पर्णकुटी पर आये।

दोहा 321 के अंतर्गत
चौपाई

बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥ कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी॥ १ ॥

अर्थ:

फिर सम्मान करके निषादराज को विदा किया। वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदय में विरह का बड़ा भारी विषाद था। फिर कोल, किरात, भील आदि वनवासी लोगों को लौटा दिया। वे सब जोहार-जोहारकर (वन्दना कर-करके) लौटे।

चौपाई

प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं॥ भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी॥ २ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी बड़ी छाया में बैठकर प्रियजन एवं परिवार के वियोग से दुखी हो रहे हैं। भरतजी के स्नेह, स्वभाव और सुन्दर वाणी का बखान-बखानकर वे प्रिय अनुज से कहने लगे।

चौपाई

प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी॥ तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम के वश होकर भरतजी के वचन, मन और कर्म की प्रीति तथा प्रतीति का अपने श्रीमुख से वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु और जल की मछलियाँ, चित्रकूट के चर-अचर सभी जीव उदास हो गये।

चौपाई

बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की॥ प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी की दशा देखकर देवताओं ने उन पर फूल बरसाकर अपनी घर-घर की दशा कही (दुखड़ा सुनाया)। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें प्रणाम कर आश्वासन दिया। तब वे प्रसन्न होकर चले, मन में जरा-सा भी डर न रहा।

दोहा

सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर॥ ३२१ ॥

अर्थ:

छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी समेत प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण करके शोभित हो रहे हों।

दोहा 322 के अंतर्गत
चौपाई

मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू॥ प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

मुनि, ब्राह्मण, गुरु, भरत और राजा—सारा समाज श्रीरामचन्द्रजी के विरह में विह्वल है। प्रभु के गुणसमूहों का मन में स्मरण करते हुए सब लोग मार्ग में चुपचाप चले जा रहे हैं।

चौपाई

जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ॥ उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू॥ २ ॥

अर्थ:

सब लोग यमुना पार करके आगे बढ़े। वह दिन बिना भोजन के ही बीत गया। गंगा पार करके दूसरे दिन का ठिकाना हुआ। वहाँ रामसखा निषादराज ने सबकी अच्छी व्यवस्था कर दी।

चौपाई

सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए॥ जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर सई पार करके गोमती जी में स्नान किया और चौथे दिन सब अयोध्या आ पहुँचे। जनकजी चार दिन नगर में रहे और राजकाज तथा सब साज-सामान सँभालते रहे।

चौपाई

सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू॥ नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी॥ ४ ॥

अर्थ:

मन्त्रियों, गुरुजी और भरतजी को राज्य सौंपकर, सारा साज-सामान ठीक करके तिरहुत को चले। नगर की स्त्री-पुरुष गुरुजी की शिक्षा मानकर श्रीरामजी की राजधानी अयोध्या में सुखपूर्वक रहने लगे।

दोहा

राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास। तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस॥ ३२२ ॥

अर्थ:

सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये नियम और उपवास करने लगे। वे भूषण और भोग-सुखों को छोड़-छोड़कर अवध की आशा पर जी रहे हैं।

दोहा 323 के अंतर्गत
चौपाई

सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ सिख ओधे॥ पुनि सिख दीन्हि बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी ने मन्त्रियों और सेवकों को समझाकर प्रेरित किया। वे सब सीख पाकर अपने-अपने काम में लग गये। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजी को बुलाकर शिक्षा दी और सब माताओं की सेवा उनको सौंपी।

चौपाई

भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे॥ ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू॥ २ ॥

अर्थ:

ब्राह्मणों को बुलाकर भरतजी ने हाथ जोड़कर प्रणाम कर अवस्था के अनुसार विनय और निहोरा किया कि आप लोग ऊँचा-नीचा, अच्छा-बुरा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजियेगा। संकोच न कीजियेगा।

चौपाई

परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए॥ सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी॥ ३ ॥

अर्थ:

भरतजी ने फिर परिवार के लोगों को, नगरवासियों को तथा अन्य प्रजा को बुलाकर, उनका समाधान करके उन्हें सुखपूर्वक बसा दिया। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजी सहित वे गुरुजी के घर गये और दण्डवत् करके हाथ जोड़कर बोले—

चौपाई

आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा॥ समुझब कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई॥ ४ ॥

अर्थ:

आज्ञा हो तो मैं प्रेमपूर्वक रहूँ! मुनि वसिष्ठजी पुलकित शरीर होकर प्रेम के साथ बोले—हे भरत! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वही जगत में धर्म का सार होगा।

दोहा

सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि। सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि॥ ३२३ ॥

अर्थ:

यह सुनकर और शिक्षा तथा बड़ा आशीर्वाद पाकर भरतजी ने ज्योतिषियों को बुलाया और दिन साधकर प्रभु की चरणपादुकाओं को निःविघ्न सिंहासन पर विराजित कराया।

दोहा 324 के अंतर्गत
चौपाई

राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई॥ नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा॥ १ ॥

अर्थ:

राम की माता और गुरु के चरणों में सिर नवाकर तथा प्रभु की चरणपादुकाओं की आज्ञा पाकर, धर्म की धुरी धारण करने में धीर भरतजी ने नन्दिग्राम में पर्णकुटी बनाकर उसी में निवास किया।

चौपाई

जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी॥ असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा॥ २ ॥

अर्थ:

सिर पर जटाजूट और मुनि-पट धारण कर, भूमि खोदकर कुश की आसनी सँवारी। भोजन, वस्त्र, बर्तन, व्रत और नियम—सब बातों में वे ऋषि-धर्म का कठिन आचरण प्रेम सहित करने लगे।

चौपाई

भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी॥ अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई॥ ३ ॥

अर्थ:

गहने, वस्त्र, भोग-सुख और बहुत-सी संपत्तियाँ मन, तन और वचन से तिनके की तरह त्याग दीं। अयोध्या का राज्य देवराज इन्द्र भी सिहाते थे, और दशरथजी की धन-संपत्ति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे।

चौपाई

तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा॥ रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥ ४ ॥

अर्थ:

उसी अयोध्यापुरी में भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पा के बाग में भौंरा। श्रीरामचन्द्रजी के प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मी के विलास [भोगैश्वर्य] को वमन की भाँति त्याग देते हैं (फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं)।

दोहा

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति॥ ३२४ ॥

अर्थ:

फिर भरतजी तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम के पात्र हैं। वे इस करनी से बड़े नहीं हुए; यह उनके लिये कोई बड़ी बात नहीं है। पृथ्वी के जल न पीने की टेक से चातक की और नीर-क्षीर-विवेक की विभूति से हंस की भी सराहना होती है।

दोहा 325 के अंतर्गत
चौपाई

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई॥ नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी का शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है। तेज घट रहा है, बल और मुखछवि वही बनी हुई है। राम-प्रेम का प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्म का दल बढ़ता है, और मन मलिन नहीं है।

चौपाई

जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे॥ सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा॥ २ ॥

अर्थ:

जैसे शरद् ऋतु के प्रकाश में जल घटता है, पर बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं, वैसे ही शम, दम, संयम, नियम और उपवास आदि भरतजी के हृदयरूपी निर्मल आकाश के नक्षत्र हैं।

चौपाई

ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी॥ राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा॥ ३ ॥

अर्थ:

विश्वास ही [उस आकाश में] ध्रुवतारा है, चौदह वर्षों की अवधि पूर्णिमा के समान है, और स्वामी श्रीरामजी की स्मृति आकाश-पथ में प्रकाशित है। राम-प्रेम ही अचल और कलंक-दोषरहित चन्द्रमा है। वह अपने समाज [नक्षत्रों] सहित नित्य सुन्दर सुशोभित है।

चौपाई

भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती॥ बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी की रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्य का वर्णन करने में सभी सुकवि सकुचाते हैं; क्योंकि वहाँ [औरों की तो बात ही क्या] स्वयं शेष, गणेश और सरस्वती की भी पहुँच नहीं है।

दोहा

नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति। मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति॥ ३२५ ॥

अर्थ:

वे नित्य प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं, हृदय में प्रेम समाता नहीं है। पादुकाओं से आज्ञा माँग-माँगकर वे बहुत प्रकार के राज-काज करते हैं।

दोहा 326 के अंतर्गत
चौपाई

पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥ लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं॥ १ ॥

अर्थ:

शरीर पुलकित है, हृदय में श्रीसीता-रामजी हैं। जीभ राम-नाम जप रही है, लोचनों में प्रेम का नीर है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वन में बसते हैं, परन्तु भरतजी भवन ही में रहकर तप के द्वारा शरीर को कसते हैं।

चौपाई

दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू॥ सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

दोनों दिशाओं को समझकर सब लोग कहते हैं कि भरतजी सब प्रकार से सराहने योग्य हैं। सुनकर व्रत और नियमों को साधु सकुचा जाते हैं। उनकी दसा देखकर मुनिराज लजाते हैं।

चौपाई

परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥ हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥ ३ ॥

अर्थ:

भरतजी का परम पवित्र आचरण मधुर, मंजु, मुद-मंगल करनेवाला है। वह कलियुग के कठिन कलुष और कलेशों को हरनेवाला है। वह महामोह-रूपी रात्रि को दलनेवाला दिनेश है।

चौपाई

पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू। जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू॥ ४ ॥

अर्थ:

यह पाप-समूह रूपी हाथी के लिए सिंह है। यह सारे संताप-समूहों को हरनेवाला है। यह जनों को रंजन देनेवाला, भव-भार का भंजन करनेवाला, और श्रीराम-स्नेह रूपी सुधाकर का सार है।

छन्द

सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को। मुनिमन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥ दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को। कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥

अर्थ:

श्रीसीतारामजी के प्रेमरूपी अमृत से परिपूर्ण भरतजी का जन्म यदि न होता, तो मुनियों के मन को भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि विषम व्रतों का आचरण कौन करता? दुःख, दाह, दरिद्रता, दंभ और दूषणों को अपने सुयश के बहाने कौन हरता? तथा कलिकाल में तुलसी जैसे शठों को हठपूर्वक कौन श्रीरामजी के सम्मुख करता?॥

सोरठा

भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं। सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥ ३२६ ॥

अर्थ:

तुलसीदासजी कहते हैं--जो कोई भरतजी के चरित्र को नियम से आदरपूर्वक सुनेंगे, उनके मन में अवश्य ही श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम होगा और संसार-रस से विरति होगी।