अरण्यकाण्ड
अरण्यकाण्ड में वनवास के वर्षों, ऋषियों और राक्षसों से मिलन और रावण द्वारा सीता हरण का वर्णन है।
मुख्य प्रसंग: वन जीवन · ऋषियों से मिलन · सीता हरण
काण्ड ३ · १८ प्रकरण
छंद संख्या
अरण्यकाण्ड के प्रकरण
मंगलाचरण
अरण्यकांड का आरंभ विनयपूर्ण मंगलाचरण से होता है। तुलसीदास प्रभु श्रीराम, सीताजी और गुरु चरणों का स्मरण कर कांड को पावन भाव से आरंभ करते हैं।
जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति
इंद्रपुत्र जयन्त कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट पहुँचाता है। श्रीराम के अचूक बाण से भयभीत होकर वह अंततः शरण लेता है और अपने अपराध का फल भोगता है।
अत्रि मिलन एवं स्तुति
अत्रि मुनि के आश्रम में श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मणजी का आदरपूर्वक स्वागत होता है। मुनि प्रेमपूर्वक प्रभु की स्तुति करते हैं और उनके आगमन से आश्रम धन्य हो उठता है।
श्रीसीता-अनसूया मिलन और श्रीसीताजी को अनसूयाजी का पातिव्रत धर्म कहना
माता अनसूया सीताजी का स्नेह से स्वागत करती हैं और उन्हें पातिव्रत धर्म, धैर्य और मर्यादा का उपदेश देती हैं। यह मिलन आदर्श स्त्रीधर्म और गृहस्थ जीवन की पवित्र शिक्षा देता है।
श्रीरामजी का आगे प्रस्थान, विराध वध और शरभंग प्रसंग
वनमार्ग में श्रीराम विराध राक्षस का वध करते हुए आगे बढ़ते हैं। इसके बाद वे शरभंग मुनि से मिलते हैं, जो प्रभु के दर्शन पाकर परम शांति और गति प्राप्त करते हैं।
राक्षस वध की प्रतिज्ञा करना
वन में ऋषियों की अस्थियाँ और उन पर हुए अत्याचार देखकर श्रीराम करुणा और धर्मयुक्त क्रोध से भर उठते हैं। वे राक्षसों का विनाश कर मुनियों की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करते हैं।
सुतीक्ष्णजी का प्रेम, अगस्त्य मिलन, अगस्त्य संवाद, राम का दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन
सुतीक्ष्ण मुनि प्रेमविभोर होकर श्रीराम की सेवा करते हैं। आगे चलकर प्रभु अगस्त्य मुनि से मिलते हैं, उनके साथ धर्ममय संवाद होता है, फिर दंडक वन में प्रवेश कर जटायु से स्नेहपूर्ण भेंट होती है।
पंचवटी निवास और श्रीराम-लक्ष्मण संवाद
श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मणजी पंचवटी में निवास स्थापित करते हैं। वहाँ श्रीराम लक्ष्मणजी को ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति का गूढ़ उपदेश देते हैं।
शूर्पणखा की कथा, शूर्पणखा का खर-दूषण के पास जाना और खर-दूषण आदि का वध
शूर्पणखा की कामासक्ति और दुष्टता से वन में संघर्ष छिड़ जाता है। अपमानित होकर वह खर-दूषण को उकसाती है, और अंत में श्रीराम उनकी सेना सहित उनका संहार करते हैं।
शूर्पणखा का रावण के निकट जाना, श्रीसीताजी का अग्नि प्रवेश और माया सीता
शूर्पणखा रावण के पास जाकर सीताजी के रूप का वर्णन करती है और उसके भीतर दुराशा जगाती है। इसी क्रम में श्रीसीताजी के अग्नि प्रवेश और माया सीता के प्रकट होने का रहस्यपूर्ण प्रसंग आता है।
मारीच प्रसंग और स्वर्ण मृग रूप में मारीच का मारा जाना
रावण की योजना में सहायता करने के लिए मारीच स्वर्ण मृग का मोहक रूप धारण करता है। श्रीराम उसके छल का अंत करते हैं, और मारीच अंतिम क्षण में प्रभु का स्मरण करता है।
श्रीसीता हरण और श्रीसीता विलाप
रावण छल से सीताजी का हरण कर ले जाता है। वियोग में सीताजी करुण पुकार करती हैं और वन, पर्वत, नदी सब मानो उस दुख के साक्षी बन जाते हैं।
जटायु-रावण युद्ध
जटायु सीताजी की रक्षा के लिए रावण को निर्भीक होकर ललकारते हैं। धर्म की रक्षा में लड़े इस युद्ध में वे गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं।
श्रीरामजी का विलाप, जटायु का प्रसंग
सीताजी के वियोग में श्रीराम वन-वन खोजते हुए व्याकुल हो उठते हैं। उन्हें जटायु मिलता है, जो अंतिम क्षणों में रावण का समाचार देकर प्रभु की कृपा से उत्तम गति पाता है।
कबंध उद्धार
वन में भयंकर कबंध श्रीराम और लक्ष्मणजी का मार्ग रोकता है। प्रभु उसके उद्धार का कारण बनते हैं, और शापमुक्त होकर वह अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त करता है।
शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पंपासर की ओर प्रस्थान
शबरी अपनी सरल, निष्कपट भक्ति से श्रीराम का स्वागत करती हैं। प्रभु उन्हें नवधा भक्ति का उपदेश देकर कृतार्थ करते हैं और फिर पंपासर की ओर प्रस्थान करते हैं।
नारद-राम संवाद
देवर्षि नारद श्रीराम के सम्मुख भक्ति और प्रभु-कृपा के गूढ़ तत्त्वों पर प्रश्न उठाते हैं। संवाद के माध्यम से नाम, प्रेम और ईश्वर की अनुकंपा का महत्त्व प्रकट होता है।
संतों के लक्षण और सत्संग भजन के लिए प्रेरणा
श्रीराम संतों के स्वभाव, विनय, दया और समत्व के लक्षण बताते हैं। साथ ही वे सत्संग और भजन को भवसागर से पार ले जाने वाला श्रेष्ठ साधन ठहराते हैं।