श्रीराम, कौसल्या और सीता का संवाद

वनगमन से पूर्व श्रीरामजी, माता कौसल्या और सीताजी के बीच करुण और धर्ममय संवाद होता है। इस क्षण में परिवार का स्नेह, विरह और मर्यादा एक साथ प्रकट होते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण १० / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई॥ बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने प्रिय वचन कहकर प्रियतमा सीताजी को समझाया। फिर माता के पैरों लगकर आशीर्वाद प्राप्त किया। [माता ने कहा—] बेटा! जल्दी लौटकर प्रजा के दुःख को मिटाना और यह निठुर माता तुम्हें भूल न जाए!

चौपाई

फिरिहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी॥ सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि॥ ४ ॥

अर्थ:

हे विधाता! क्या मेरी दशा भी फिर पलटेगी? क्या अपने नेत्रों से मैं इस मनोहर जोड़ी को फिर देख पाऊँगी? हे पुत्र! वह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब होगी जब तुम्हारी जननी जीते-जी तुम्हारा चाँद-सा मुखड़ा फिर देखेगी!

दोहा

बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात। कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात॥ ६८ ॥

अर्थ:

हे तात! 'वत्स' कहकर, 'लाल' कहकर, 'रघुपति' कहकर, 'रघुवर' कहकर, मैं फिर कब तुम्हें बुलाकर हृदय से लगाऊँगी और हर्षित होकर तुम्हारे गातों को देखूँगी!

दोहा 69 के अंतर्गत
चौपाई

लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी॥ राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना॥ १ ॥

अर्थ:

यह देखकर कि माता स्नेह के मारे अधीर हो गयी हैं और इतनी अधिक व्याकुल हैं कि मुँह से वचन नहीं निकलता, श्रीरामचन्द्रजी ने अनेक प्रकार से उन्हें समझाया। वह समय और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता।

चौपाई

तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी॥ सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा॥ २ ॥

अर्थ:

तब जानकीजी सास के पाँव लगीं और बोलीं—हे माता! सुनिये, मैं बड़ी ही अभागिनी हूँ। आपकी सेवा करने के समय दैव ने मुझे वनवास दे दिया। मेरा मनोरथ सफल न किया।

चौपाई

तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू॥ सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी॥ ३ ॥

अर्थ:

आप क्षोभ का त्याग कर दें, परंतु कृपा न छोड़ियेगा। कर्म की गति कठिन है, मुझे भी कुछ दोष नहीं है। सीताजी के वचन सुनकर सास व्याकुल हो गयीं। उनकी दशा को मैं किस प्रकार बखानकर कहूँ!

चौपाई

बारहिं बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही॥ अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्होंने सीताजी को बार-बार हृदय से लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जब तक गंगा और यमुना में जल की धारा बहे, तब तक तुम्हारा सुहाग अचल रहे।

दोहा

सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार। चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार॥ ६९ ॥

अर्थ:

सीताजी को सास ने अनेक प्रकार से आशीर्वाद और शिक्षाएँ दीं और वे बड़े ही प्रेम से बार-बार चरणकमलों में सिर नवाकर चलीं।