श्रीराम-कौसल्या-संवाद

श्रीरामजी माता कौसल्या को वनवास का समाचार देकर धैर्य और धर्म का उपदेश देते हैं। मातृहृदय व्यथा से द्रवित होता है, फिर भी वह पुत्र की मर्यादा को पहचानती है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ८ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

रघुकुल तिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा॥ दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे॥ १ ॥

अर्थ:

रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी ने दोनों हाथ जोड़कर आनन्द के साथ माता के चरणों में सिर नवाया। माता ने आशीर्वाद दिया, अपने हृदय से लगा लिया और उन पर गहने तथा कपड़े निछावर किये।

चौपाई

बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता॥ गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्रवत प्रेमरस पयद सुहाए॥ २ ॥

अर्थ:

माता बार-बार श्रीरामचन्द्रजी का मुख चूम रही हैं। नेत्रों में प्रेम का जल भर आया है और सब अंग पुलकित हो गये हैं। श्रीराम को अपनी गोद में बैठाकर फिर हृदय से लगा लिया। सुन्दर स्तनों से प्रेमरस (दूध) बहने लगे।

चौपाई

प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई॥ सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी॥ ३ ॥

अर्थ:

उनका प्रेम और महान् आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगाल ने कुबेर का पद पा लिया हो। बड़े आदर के साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं--।

चौपाई

कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी॥ सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे तात! माता बलिहारी जाती है, कहो, वह आनन्द-मंगलकारी लग्न कब है, जो मेरे पुण्य, शील और सुख की सुन्दर सीमा है और जन्म लेने के लाभ की पूर्णतम अवधि है।

दोहा

जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति। जिमिचातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति॥ ५२ ॥

अर्थ:

तथा जिस (लग्न) को सभी स्त्री-पुरुष अत्यन्त व्याकुलता से इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्यासे चातक और चातकी शरद ऋतु के स्वाति नक्षत्र की वर्षा को चाहते हैं।

दोहा 53 के अंतर्गत
चौपाई

तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू॥ पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो। भैया! तब पिता के पास जाना। बहुत देर हो गयी है, माता बलिहारी जाती है।

चौपाई

मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला॥ सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवँरु न भूला॥ २ ॥

अर्थ:

माता के अत्यन्त अनुकूल वचन सुनकर--जो मानो स्नेहरूपी कल्पवृक्ष के फूल थे, जो सुखरूपी मकरंद (पुष्परस) से भरे थे और श्री (राजलक्ष्मी) के मूल थे--ऐसे वचनरूपी फूलों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी का मनरूपी भौंरा उन पर नहीं भूला।

चौपाई

धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥ पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥ ३ ॥

अर्थ:

धर्मधुरीण श्रीरामचन्द्रजी ने धर्म की गति को जानकर माता से अत्यन्त कोमल वाणी से कहा-हे माता! पिताजी ने मुझको वन का राज दिया है, जहाँ सब प्रकार से मेरा बड़ा काम बननेवाला है।

चौपाई

आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥ जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥ ४ ॥

अर्थ:

हे माता! तू प्रसन्न मन से मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वनयात्रा में आनन्द-मंगल हो। मेरे स्नेहवश भूलकर भी डरना नहीं। हे माता! तेरी कृपा से आनन्द ही होगा।

दोहा

बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान। आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान॥ ५३ ॥

अर्थ:

चौदह वर्ष वन में रहकर, पिताजी के वचन को प्रमाणित कर, फिर लौटकर तेरे चरणों का दर्शन करूँगा; तू मन को म्लान न कर।

दोहा 54 के अंतर्गत
चौपाई

बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके॥ सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी॥ १ ॥

अर्थ:

रघुकुल में श्रेष्ठ श्रीरामजी के ये बहुत ही नम्र और मीठे वचन माता के हृदय में बाण के समान लगे और कसकने लगे। उस शीतल वाणी को सुनकर कौसल्या वैसे ही सहमकर सूख गयीं जैसे बरसात का पानी पड़ने से जवासा सूख जाता है।

चौपाई

कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥ नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी॥ २ ॥

अर्थ:

हृदय का विषाद कुछ कहा नहीं जाता। मानो सिंह की गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गयी हो। नेत्रों में जल भर आया, शरीर थर-थर काँपने लगा। माजहि खाइ मीन जनु मापी॥

चौपाई

धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी॥ तात पितहि तुम्ह प्रान पिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे॥ ३ ॥

अर्थ:

धीरज धरकर, पुत्र का मुख देखकर माता गद्गद वचन कहने लगीं--हे तात! तुम तो पिताजी के प्राणों के समान प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रों को देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे।

चौपाई

राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा॥ तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू॥ ४ ॥

अर्थ:

राज्य देने के लिये उन्होंने ही शुभ दिन साधा था। फिर अब किस अपराध से वन जाने को कहा ? हे तात! मुझे इसका कारण सुनाओ ! सूर्यवंश [रूपी वन] को जलाने के लिये अग्नि कौन हो गया ?।

दोहा

निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ। सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ॥ ५४ ॥

अर्थ:

तब श्रीरामचन्द्रजी का रुख देखकर मन्त्री के पुत्र ने सब कारण समझाकर कहा। उस प्रसंग को सुनकर वे गूँगी-जैसी (चुप) रह गयीं, उनकी दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता।

दोहा 55 के अंतर्गत
चौपाई

राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू॥ लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू॥ १ ॥

अर्थ:

न रख ही सकती हैं, न यह कह सकती हैं कि वन चले जाओ। दोनों ही प्रकार से हृदय में बड़ा भारी संताप हो रहा है। [मन में सोचती हैं कि देखो--] विधाता की चाल सदा सब के लिये टेढ़ी होती है। लिखने लगे चन्द्रमा और लिख गया राहु !।

चौपाई

धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी॥ राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू॥ २ ॥

अर्थ:

धर्म और स्नेह दोनों ने कौसल्याजी की बुद्धि को घेर लिया। उनकी दशा साँप-छछूँदर की-सी हो गयी। वे सोचने लगीं कि यदि मैं अनुरोध (हठ) करके पुत्र को रख लेती हूँ तो धर्म जाता है और भाइयों में विरोध होता है;

चौपाई

कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी॥ बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी॥ ३ ॥

अर्थ:

और यदि वन जाने को कहती हूँ तो बड़ी हानि होती है। इस प्रकार के धर्म-संकट में पड़कर रानी विशेष रूप से सोच के वश हो गयीं। फिर बुद्धिमती कौसल्याजी स्त्री-धर्म (पातिब्रत-धर्म) को समझकर और राम तथा भरत दोनों पुत्रों को समान जानकर--।

चौपाई

सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी॥ तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका॥ ४ ॥

अर्थ:

सरल स्वभाववाली श्रीरामचन्द्रजी की माता बड़ा धीरज धरकर वचन बोलीं--हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया। पिताजी की आज्ञा का पालन करना ही सब धर्मों का शिरोमणि धर्म है।

दोहा

राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु। तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु॥ ५५ ॥

अर्थ:

राज्य देने को कहकर वन दे दिया, उसका मुझे लेशमात्र भी दुःख नहीं है। [दुःख तो इस बात का है कि] तुम्हारे बिना भरत को, भूपति को और प्रजा को बड़ा भारी क्लेश होगा।

दोहा 56 के अंतर्गत
चौपाई

जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता॥ जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौ कानन सत अवध समाना॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! यदि केवल पिताजी की ही आज्ञा हो, तो माता को [पिता से] बड़ी जानकर वन को मत जाओ। किन्तु यदि पिता-माता दोनों ने वन जाने को कहा हो, तो वन तुम्हारे लिये सैकड़ों अयोध्याओं के समान है।

चौपाई

पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी॥ अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू॥ २ ॥

अर्थ:

वन के देवता तुम्हारे पिता होंगे और वनदेवियाँ माता होंगी। वहाँ के पशु-पक्षी तुम्हारे चरण-कमलों के सेवक होंगे। राजाके लिये अन्तमें तो वनवास करना उचित ही है। केवल तुम्हारी [सुकुमार] अवस्था देखकर हृदय में दुःख होता है।

चौपाई

बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी॥ जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू॥ ३ ॥

अर्थ:

हे रघुवंश के तिलक! वन बड़ा भाग्यवान् है और यह अवध अभागी है, जिसे तुमने त्याग दिया। हे पुत्र! यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो तो तुम्हारे हृदय में सन्देह होगा [कि माता इसी बहाने मुझे रोकना चाहती हैं]।

चौपाई

पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के॥ ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ॥ ४ ॥

अर्थ:

हे पुत्र! तुम सभी के परम प्रिय हो। प्राणों के प्राण और जीवन के जीवन हो। वही (प्राणाधार) तुम कहते हो कि माता! मैं वन को जाऊँ और मैं तुम्हारे वचनों को सुनकर बैठी पछताऊँ।

दोहा

यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ। मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ॥ ५६ ॥

अर्थ:

यह सोचकर झूठा स्नेह बढ़ाकर मैं हठ नहीं करती। बेटा! मैं बलैया लेती हूँ, माता का नाता मानकर मेरी सुरति भूल न जाना।

दोहा 57 के अंतर्गत
चौपाई

देव पितर सब तुम्हहि गोसाईं। राखहुँ पलक नयन की नाईं॥ अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना॥ १ ॥

अर्थ:

हे गोसाईं! सब देव और पितर तुम्हारी वैसे ही रक्षा करें, जैसे पलकें आँखों की रक्षा करती हैं। तुम्हारे बनवास की अवधि (चौदह वर्ष) जल है, प्रियजन और कुटुम्बी मछली हैं। तुम दया की खान और धर्म की धुरी को धारण करनेवाले हो।

चौपाई

अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटहु आई॥ जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ॥ २ ॥

अर्थ:

ऐसा विचारकर वही उपाय करना जिसमें सबके जीते-जी तुम आ मिलो। मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम सेवकों, परिवारवालों और गाँव को अनाथ करके सुखपूर्वक वन को जाओ।

चौपाई

सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता॥ बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी॥ ३ ॥

अर्थ:

आज सबके पुण्यों का फल पूरा हो गया! कठिन काल हमारे विपरीत हो गया। [इस प्रकार] बहुत विलाप करके और अपने को परम अभागिनी जानकर माता श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में लिपट गयीं।

चौपाई

दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा॥ राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई॥ ४ ॥

अर्थ:

हृदय में भयानक दुःसह दाह छा गया। उस समय के बहुविध विलाप का वर्णन नहीं किया जा सकता। श्रीरामचन्द्रजी ने माता को उठाकर हृदय से लगा लिया और फिर कोमल वचन कहकर उन्हें समझाया।

दोहा

समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ। जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ॥ ५७ ॥

अर्थ:

उसी समय यह समाचार सुनकर सीताजी अकुला उठीं और सास के पास जाकर उनके दोनों चरणकमलों की वन्दना कर सिर नीचा करके बैठ गयीं।

दोहा 58 के अंतर्गत
चौपाई

दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी॥ बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता॥ १ ॥

अर्थ:

सास ने कोमल वाणी से आशीर्वाद दिया। वे सीताजी को अत्यन्त सुकुमारी देखकर व्याकुल हो उठीं। रूप की राशि और पति प्रेम में पवित्र सीताजी नीचा मुख किये बैठी सोच रही हैं।

चौपाई

चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू॥ की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना॥ २ ॥

अर्थ:

जीवननाथ (प्राणनाथ) वन को चलना चाहते हैं। देखें किस पुण्यवान से उनका साथ होगा-- शरीर और प्राण दोनों साथ जायँगे या केवल प्राण ही से उनका साथ होगा? विधाता की करनी कुछ जानी नहीं जाती।

चौपाई

चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी॥ मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

सीताजी अपने सुन्दर चरणों के नखों से धरती कुरेद रही हैं। ऐसा करते समय नूपुरों का जो मधुर शब्द हो रहा है, कवि उसका इस प्रकार वर्णन करते हैं कि मानो प्रेम के वश होकर नूपुर यह विनती कर रहे हैं कि सीताजी के चरण कभी हमारा त्याग न करें।

चौपाई

मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी॥ तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सास ससुर परिजनहि पिआरी॥ ४ ॥

अर्थ:

सीताजी सुन्दर नेत्रों से जल बहा रही हैं। उनकी यह दशा देखकर श्रीरामजी की माता कौसल्याजी बोलीं--हे तात! सुनो, सीता अत्यन्त ही सुकुमारी हैं तथा सास, ससुर और कुटुंबी सभी को प्यारी हैं।

दोहा

पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु। पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु॥ ५८ ॥

अर्थ:

इनके पिता जनकजी राजाओं के शिरोमणि हैं; ससुर सूर्यकुल के सूर्य हैं और पति सूर्यकुलरूपी कुमुदवन को खिलानेवाले चन्द्रमा तथा गुण और रूप के भण्डार हैं।

दोहा 59 के अंतर्गत
चौपाई

मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई॥ नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानकिहिं लाई॥ १ ॥

अर्थ:

फिर मैंने रूप की राशि, सुन्दर गुण और शीलवाली प्यारी पुत्रवधू पायी है। मैंने इन्हें आँखों की पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण जानकी में लगा रखे हैं।

चौपाई

कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली॥ फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा॥ २ ॥

अर्थ:

इन्हें कल्पलता के समान मैंने बहुत तरह से बड़े लाड़-चाव के साथ स्नेह-रूपी जल से सींचकर पाला है। अब इस लता के फूलने-फलने के समय विधाता वाम हो गये। कुछ जाना नहीं जाता कि इसका क्या परिणाम होगा।

चौपाई

पलँग पीठ तजि गोद हिंडोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा॥ जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ॥ ३ ॥

अर्थ:

सीताने पलंग की पीठ, गोद और हिंडोले को छोड़कर कठोर पृथ्वी पर कभी पैर नहीं रखा। मैं सदा संजीवनी जड़ी के समान [सावधानी से] इनकी रखवाली करती रही हूँ। कभी दीपक की बत्ती हटाने को भी नहीं कहती।

चौपाई

सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा॥ चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

वही सीता अब तुम्हारे साथ वन चलना चाहती है। हे रघुनाथ ! उसे क्या आज्ञा होती है ? चन्द्रमा की किरणों का रस चाहनेवाली चकोरी सूर्य की ओर आँखें किस तरह मिला सकती है।

दोहा

करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि। बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि॥ ५९ ॥

अर्थ:

हाथी, सिंह, राक्षस आदि अनेक दुष्ट जीव-जन्तु वन में विचरते रहते हैं। हे पुत्र! क्या विष की वाटिका में सुन्दर संजीवनी बूटी शोभा पा सकती है?

दोहा 60 के अंतर्गत
चौपाई

बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी॥ पाहनकृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ॥ १ ॥

अर्थ:

वन के लिये तो ब्रह्माजी ने विषय-सुख को न जाननेवाली कोल और भीलों की लड़कियों को रचा है, जिनका पत्थर के कीड़े जैसा कठोर स्वभाव है। उन्हें वन में कभी क्लेश नहीं होता।

चौपाई

कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू॥ सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती॥ २ ॥

अर्थ:

अथवा तपस्वियों की स्त्रियाँ वन में रहने योग्य हैं, जिन्होंने तपस्या के लिये सब भोग तज दिये हैं। हे पुत्र! जो तस्वीर के बन्दर को देखकर डर जाती हैं वे सीता वन में किस तरह रह सकेंगी?

चौपाई

सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी॥ अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई॥ ३ ॥

अर्थ:

देवसरोवर के सुगंधित कमलवन में विचरण करनेवाली हंसकुमारी क्या डाबरों में रहने के योग्य है? ऐसा विचारकर जैसी तुम्हारी आज्ञा हो, मैं जानकी को वैसी ही शिक्षा दूँ।

चौपाई

जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा॥ सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी॥ ४ ॥

अर्थ:

माता कहती हैं--यदि सीता घर में रहें तो मुझे बहुत सहारा हो जाय। श्रीरामचन्द्रजी ने माता की प्रिय वाणी सुनकर, जो मानो शील और स्नेह रूपी अमृत से सनी हुई थी।

दोहा

कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष। लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष॥ ६० ॥

अर्थ:

विवेकमय प्रिय वचन कहकर माता को सन्तुष्ट किया। फिर वन के गुण-दोष प्रकट करके वे जानकीजी को समझाने लगे।