श्रीवसिष्ठजी का भाषण

चित्रकूट की सभा में श्रीवसिष्ठजी धर्म, मर्यादा और कुल परंपरा के अनुसार सबको उचित मार्ग बताते हैं। उनका वचन शोकग्रस्त जनों के लिए मार्गदर्शक और संतुलन देने वाला बनता है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४० / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना॥ धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू॥ १ ॥

अर्थ:

श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले--हे सभासदो! हे सुजान भरत! सुनो। सूर्यकुल के सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्र धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान् हैं।

चौपाई

सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू॥ गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी॥ २ ॥

अर्थ:

वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेद की मर्यादा के रक्षक हैं। श्रीराम का अवतार ही जगत् के कल्याण के लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माता के वचनों के अनुसार चलनेवाले हैं। दुष्टों के दल का नाश करनेवाले और देवताओं के हितकारी हैं।

चौपाई

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥ बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला॥ ३ ॥

अर्थ:

नीति, प्रीति, परमार्थ और स्वार्थ को श्रीरामजी के समान यथार्थ रूप से कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, कर्म और काल।

चौपाई

अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई॥ करि बिचार जियँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें॥ ४ ॥

अर्थ:

शेषजी और [पृथ्वी एवं पातालके अन्यान्य] राजा आदि जहाँतक प्रभुता है, और योगकी सिद्धियाँ, जो वेद और शास्त्रोंमें गायी गयी हैं, हृदयमें अच्छी तरह विचार कर देखो, [तो यह स्पष्ट दिखायी देगा कि] श्रीरामजीकी आज्ञा इन सभीके सिरपर है (अर्थात् श्रीरामजी ही सबके एकमात्र महान् महेश्वर हैं)।

दोहा

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ। समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ॥ २५४ ॥

अर्थ:

अतः श्रीरामजी की आज्ञा और रुख रखनेमें ही हम सबका हित होगा। [इस तत्त्व और रहस्यको समझकर] अब तुम सयाने लोग जो सबको सम्मत हो, वही मिलकर करो।

दोहा 255 के अंतर्गत
चौपाई

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू॥ केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी का राज्याभिषेक सबके लिये सुखदायक है। मंगल और आनन्द का मूल यही एक मार्ग है। [अब] श्रीरघुनाथजी अयोध्या किस प्रकार चलें? विचार करके कहो, वही उपाय किया जाय।

चौपाई

सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी॥ उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे॥ २ ॥

अर्थ:

मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी की नीति, परमार्थ और स्वार्थ (लौकिक हित) में सनी हुई वाणी सब ने आदरपूर्वक सुनी। पर किसी को कोई उत्तर नहीं आता, सब लोग भोले (विचारशक्ति से रहित) हो गये। तब भरत ने सिर नवाकर हाथ जोड़े।

चौपाई

भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे॥ जनम हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता॥ ३ ॥

अर्थ:

सूर्यवंश में एक-से-एक अधिक बड़े बहुत-से राजा हो गये हैं। सभी के जन्म के कारण पिता-माता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मों का फल विधाता देता है।

चौपाई

दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना॥ सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी॥ ४ ॥

अर्थ:

आपकी आशिष ही एक ऐसी है जो दुःखों का दमन करके, समस्त कल्याणों को सजा देती है; यह जगत् जानता है। हे स्वामी! आप वही हैं जिन्होंने विधाता की गति को भी रोक दिया। आपने जो टेक टेक दी उसे कौन टाल सकता है ?

दोहा

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु। सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु॥ २५५ ॥

अर्थ:

अब आप मुझ से उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है। भरतजी के स्नेहमय वचनों को सुनकर गुरुजी के हृदय में अनुराग उमड़ आया।

दोहा 256 के अंतर्गत
चौपाई

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥ सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! बात सत्य है, पर है रामजी की कृपा से ही। रामविमुख को तो स्वप्न में भी सिद्धि नहीं मिलती। हे तात! मैं एक बात कहने में सकुचाता हूँ। बुद्धिमान् लोग सर्वस्व जाता देखकर [आधे की रक्षाके लिये] आधा छोड़ दिया करते हैं।

चौपाई

तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई॥ सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता॥ २ ॥

अर्थ:

अतः तुम दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) वन को जाओ और लक्ष्मण, सीता और रघुराई को लौटा दिया जाय। ये सुन्दर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गये। उनके सारे अंग परमानन्द से परिपूर्ण हो गये।

चौपाई

मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा॥ बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी॥ ३ ॥

अर्थ:

उनके मन प्रसन्न हो गये। शरीर में तेज सुशोभित हो गया। मानो राजा दशरथ जी उठे हों और श्रीरामचन्द्रजी राजा हो गये हों! अन्य लोगों को तो इसमें लाभ अधिक और हानि कम प्रतीत हुई। परन्तु रानियों को दुःख-सुख समान ही थे; यह समझकर वे सब रोने लगीं।

चौपाई

कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे॥ कानन करउँ जनम भरि बासू। एहि तें अधिक न मोर सुपासू॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी कहने लगे--मुनि ने जो कहा, वह करने से जगत् भर के जीवों को उनकी अभिमत वस्तु देने का फल होगा। मैं जन्मभर वन में वास करूँगा। मेरे लिये इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है।

दोहा

अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान। जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान॥ २५६ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी हृदय की जाननेवाले हैं और आप सर्वज्ञ तथा सुजान हैं। यदि आप यह सत्य कह रहे हैं तो हे नाथ! अपने वचनों को प्रमाण कीजिये (उनके अनुसार व्यवस्था कीजिये)।

दोहा 257 के अंतर्गत
चौपाई

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥ भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी के वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्ठजी विदेह हो गये (किसी को अपने देह की सुधि न रही)। भरतजी की महान्‌ महिमा समुद्र है, मुनि की बुद्धि उसके तट पर अबला स्त्री के समान खड़ी है।

चौपाई

गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा॥ औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई॥ २ ॥

अर्थ:

वह [उस समुद्र के] पार जाना चाहती है, इसके लिये उसने हृदय में उपाय भी ढूँढ़े! पर [उसे पार करने का साधन] नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती। भरतजी की बड़ाई और कौन करेगा? तलैया की सीपी में भी कहीं समुद्र समा सकता है?

चौपाई

भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए॥ प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु॥ ३ ॥

अर्थ:

मुनि वसिष्ठजी के अन्तरात्मा को भरतजी बहुत अच्छे लगे और वे समाज सहित श्रीरामजी के पास आये। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने प्रणाम कर उत्तम आसन दिया। सब लोग मुनि की आज्ञा सुनकर बैठ गये।

चौपाई

बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी॥ सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसर के अनुसार विचार करके वचन बोले-हे सर्वज्ञ! हे सुजान! हे धर्म, नीति, गुण और ज्ञान के भण्डार राम! सुनिये—।

दोहा

सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ। पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ॥ २५७ ॥

अर्थ:

आप सबके हृदय के भीतर बसते हैं और सब के भले-बुरे भाव को जानते हैं। जिसमें पुरवासियों का, माताओं का और भरत का हित हो, वही उपाय बतलाइये।

दोहा 258 के अंतर्गत
चौपाई

आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जुआरिहि आपन दाऊ॥ सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥ १ ॥

अर्थ:

आर्त (दुखी) लोग कभी विचार कर नहीं कहते। जुआरी को अपना ही दाँव सूझता है। मुनि के वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे—हे नाथ! उपाय तो आप ही के हाथ है।

चौपाई

सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें॥ प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौं सिख सोई॥ २ ॥

अर्थ:

आपका रुख रखने में और आपकी आज्ञा को सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करने में ही सबका हित है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षा को माथे पर चढ़ाकर करूँ।

चौपाई

पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं॥ कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर हे गोसाई! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरह से सेवामें घट जायगा (आज्ञापालन करेगा)। मुनि वसिष्ठजी कहने लगे—हे राम! तुमने सच कहा। पर भरत के स्नेह ने विचार को नहीं रहने दिया।

चौपाई

तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी॥ मोरें जान भरत रुचि राखी। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी॥ ४ ॥

अर्थ:

इसी लिये मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरत की भक्ति के वश हो गयी है। मेरी समझ में तो भरत की रुचि रखकर जो कुछ किया जायगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा।

दोहा

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥ २५८ ॥

अर्थ:

पहले भरत की विनती आदरपूर्वक सुन लीजिये, फिर उस पर विचार कीजिये। तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदों का निचोड़ निकालकर वैसा ही (उसी के अनुसार) कीजिये।

दोहा 259 के अंतर्गत
चौपाई

गुर अनुरागु भरत पर देखी। राम हृदयँ आनंदु बिसेषी॥ भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी पर गुरुजी का स्नेह देखकर श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में विशेष आनन्द हुआ। भरतजी को धर्मधुरन्धर और तन, मन, वचन से अपना सेवक जानकर—।

चौपाई

बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला॥ नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी गुरु की आज्ञा के अनुकूल मनोहर, कोमल और कल्याण के मूल वचन बोले—हे नाथ! आपकी सौगन्ध और पिताजी के चरणों की दुहाई है (मैं सत्य कहता हूँ कि) विश्व भर में भरत के समान भाई कोई हुआ ही नहीं।

चौपाई

जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी॥ राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू॥ ३ ॥

अर्थ:

जो लोग गुरु के चरणकमलों के अनुरागी हैं, वे लोक में (लौकिक दृष्टि से) भी और वेद में (पारमार्थिक दृष्टि से) भी बड़भागी होते हैं! [फिर] जिस पर आप (गुरु) का ऐसा स्नेह है, उस भरत के भाग्य को कौन कह सकता है ?।

चौपाई

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई॥ भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई॥ ४ ॥

अर्थ:

छोटा भाई जानकर भरत के मुँह पर उसकी बड़ाई करने में मेरी बुद्धि सकुचाती है। (फिर भी मैं तो यही कहूँगा कि) भरत जो कुछ कहें, वही करने में भलाई है। ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी चुप हो रहे।

दोहा

तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात। कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात॥ २५९ ॥

अर्थ:

तब मुनि भरतजी से बोले—हे तात! सब संकोच त्यागकर कृपा के समुद्र अपने प्यारे भाई से अपने हृदय की बात कहो।