दशरथ-सुमंत्र-संवाद और दशरथ मरण

सुमंत्र से समाचार सुनते हुए महाराज दशरथ का विरह और बढ़ जाता है। अंततः श्रीराम-वियोग सह न पाने के कारण वे प्राण त्याग देते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २४ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई॥ सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी॥ १ ॥

अर्थ:

राजा ने सुमन्त्र को हृदय से लगा लिया। मानो डूबते हुए को कुछ सहारा मिल गया हो। मन्त्री को स्नेह के साथ पास बैठाकर नेत्रों में जल भरकर राजा पूछने लगे—

चौपाई

राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही॥ आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए॥ २ ॥

अर्थ:

हे मेरे प्रेमी सखा! श्रीराम की कुशल कहो। बताओ, श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी कहाँ हैं? उन्हें लौटा लाये हो या वे वन को चले गये? यह सुनते ही मन्त्री के नेत्रों में जल भर आया।

चौपाई

सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू॥ राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

शोक से व्याकुल होकर राजा फिर पूछने लगे—सीता, राम और लक्ष्मण का सन्देशा तो कहो। श्रीरामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को याद कर-करके राजा हृदय में सोच करते हैं।

चौपाई

राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू॥ सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना॥ ४ ॥

अर्थ:

और कहते हैं—मैंने राजसिंहासन की बात सुनाकर वनवास दे दिया। यह सुनकर भी जिस (राम) के मन में हर्ष और विषाद नहीं हुआ, ऐसे पुत्र से बिछुड़ते समय भी मेरे प्राण नहीं गये; तब मेरे समान बड़ा पापी कौन होगा?

दोहा

सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ। नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ॥ १४९ ॥

अर्थ:

हे सखा! श्रीराम, सीता और लक्ष्मण जहाँ हैं, मुझे भी वहीं पहुँचा दो। नहीं तो मैं सत्य भाव से कहता हूँ कि अब मेरे प्राण चलना ही चाहते हैं।

दोहा 150 के अंतर्गत
चौपाई

पुनि पुनि पूँछत मंत्रिहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ॥ करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ॥ १ ॥

अर्थ:

राजा बार-बार मन्त्री से पूछते हैं—मेरे प्रियतम पुत्रों का सन्देशा सुनाओ। हे सखा! तुम तुरंत वही उपाय करो जिससे श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को मुझे आँखों से दिखा दो।

चौपाई

सचिव धीर धरि कह मृदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी॥ बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा॥ २ ॥

अर्थ:

मन्त्री धीरज धरकर कोमल वाणी बोले—महाराज! आप पण्डित और ज्ञानी हैं। हे देव! आप शूरवीर तथा उत्तम धैर्यवान् पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। आप सदा साधु समाज की सेवा करते रहे हैं।

चौपाई

जनम मरन सब दुख सुख भोगा। हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा॥ काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं॥ ३ ॥

अर्थ:

जन्म-मरण, सुख-दुःख के भोग, हानि-लाभ, प्रियजनों का मिलना-बिछुड़ना—ये सब, हे गोसाईं! काल और कर्म के वश रात-दिन की तरह बरबस होते रहते हैं।

चौपाई

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥ धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥ ४ ॥

अर्थ:

मूर्ख लोग सुख में हर्षित होते और दुःख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। धीरज धरिये, विवेक विचार कर शोक छोड़ दीजिये, जो सबके हितकारी है।

दोहा

प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर। न्हाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर॥ १५० ॥

अर्थ:

श्रीरामजी का पहला निवास तमसा के तट पर हुआ, दूसरा सुरसरि-तीर पर। सीताजी समेत दोनों भाई स्नान करके जलपान कर वहीं रहे।

दोहा 151 के अंतर्गत
चौपाई

केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई॥ होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा॥ १ ॥

अर्थ:

केवट ने बहुत सेवा की। वह रात सिंगरौर में ही बितायी। प्रातः होते ही बट-क्षीर मँगवाया और जटाओं का मुकुट अपने सिर पर बनाया।

चौपाई

राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई॥ लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई॥ २ ॥

अर्थ:

तब श्रीरामचन्द्रजी के सखा निषादराज ने नाव मँगवायी। पहले प्रिया सीताजी को उस पर चढ़ाकर फिर श्रीरघुनाथजी चढ़े। फिर लक्ष्मणजी ने धनुष-बाण सजाकर रखे और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े।

चौपाई

बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा॥ तात प्रनामु तात सन कहेहू। बार बार पद पंकज गहेहू॥ ३ ॥

अर्थ:

मुझे व्याकुल देखकर श्रीरामचन्द्रजी धीरज धरकर मधुर वचन बोले—हे तात! पिताजी से मेरा प्रणाम कहना और मेरी ओर से बार-बार उनके चरणकमल पकड़ना।

चौपाई

करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी॥ बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर पाँव पकड़कर विनती करना कि हे तात! आप मेरी चिन्ता न कीजिये। आपकी कृपा, अनुग्रह और पुण्य से वन में और मार्ग में हमारा कुशल-मंगल होगा।

छन्द

तुम्हरें अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं। प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं॥ जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी। तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी॥

अर्थ:

हे पिताजी! आपके अनुग्रह से मैं वन जाते हुए सब सुख पाऊँगा। आज्ञा का भलीभाँति पालन करके कुशलपूर्वक फिर लौट आऊँगा। सब माताओं को संतुष्ट करके, उनके पैरों पड़-पड़कर बहुत विनती करके—तुलसीदास कहते हैं—तुम वही प्रयत्न करना जिसमें कोसलपति पिताजी कुशल रहें।

सोरठा

गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि। करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति॥ १५१ ॥

अर्थ:

बार-बार चरणकमलों को पकड़कर गुरु से मेरा सन्देसा कहना कि वे वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें।

दोहा 152 के अंतर्गत
चौपाई

पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी॥ सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! सब पुरवासियों और कुटुम्बियों से निहोरा (अनुरोध) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकार से हितकारी है जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें।

चौपाई

कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ॥ पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी॥ २ ॥

अर्थ:

भरत के आने पर उनको मेरा संदेश कहना कि राजपद पा जाने पर नीति न छोड़ देना; कर्म, वचन और मन से प्रजा का पालन करना और सब माताओं को समान जानकर उनकी सेवा करना।

चौपाई

ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई॥ तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

और हे भाई! पिता, माता और स्वजनों की सेवा करके भाईपने को अन्त तक निबाहना। हे तात! राजा (पिताजी) को उसी प्रकार से रखना जिससे वे कभी (किसी तरह भी) मेरा सोच न करें।

चौपाई

लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा॥ बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई॥ ४ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी ने कुछ कठोर वचन कहे। किन्तु श्रीरामजी ने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार-बार अपनी सौगंध दिलायी [और कहा--] हे तात! लक्ष्मण का लड़कपन वहाँ न कहना।

दोहा

कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह। थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह॥ १५२ ॥

अर्थ:

प्रणाम कर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, परन्तु स्नेहवश वे शिथिल हो गयीं। उनकी वाणी रुक गयी, नेत्रों में जल भर आया और शरीर रोमाञ्च से व्याप्त हो गया।

दोहा 153 के अंतर्गत
चौपाई

तेहि अवसर रघुबर रुख पाई। केवट पारहि नाव चलाई॥ रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती॥ १ ॥

अर्थ:

उसी समय श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर केवट ने पार जाने के लिये नाव चला दी। इस प्रकार रघुवंशतिलक श्रीरामचन्द्रजी चल दिये और मैं छाती पर वज्र रखकर खड़ा-खड़ा देखता रहा।

चौपाई

मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू॥ अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ॥ २ ॥

अर्थ:

मैं अपने क्लेश को कैसे कहूँ, जो श्रीरामजी का यह संदेशा लेकर जीता ही लौट आया! ऐसा कहकर मन्त्री की वाणी रुक गयी (वे चुप हो गये) और वे हानि की ग्लानि और सोच के वश हो गये।

चौपाई

सूत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू॥ तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा॥ ३ ॥

अर्थ:

सारथी सुमन्त्र के वचन सुनते ही राजा पृथ्वी पर गिर पड़े, उनके हृदय में भयानक जलन होने लगी। वे तड़पने लगे, उनका मन भीषण मोह से व्याकुल हो गया। मानो मछली को माजा व्याप गया हो (पहली वर्षा का जल लग गया हो)।

चौपाई

करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी॥ सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा॥ ४ ॥

अर्थ:

सब रानियाँ विलाप करके रो रही हैं। उस महान् विपत्ति का कैसे वर्णन किया जाय? उस समय के विलाप को सुनकर दुःख को भी दुःख लगा और धीरज का भी धीरज भाग गया!

दोहा

भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु। बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु॥ १५३ ॥

अर्थ:

राज के रावले (रनिवास) में [रोने का] शोर सुनकर अवध में बड़ा भारी कोलाहल मच गया। [ऐसा जान पड़ता था] मानो पक्षियों के विशाल वन में रात के समय कठोर वज्र गिरा हो।

दोहा 154 के अंतर्गत
चौपाई

प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू॥ इंद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी॥ १ ॥

अर्थ:

राजा के प्राण कण्ठ में आ गये। मानो मणि के बिना साँप व्याकुल (मरणासन्न) हो गया हो। इन्द्रियाँ सब बहुत ही विकल हो गयीं, मानो बिना जल के सरोवर में कमलों का वन मुरझा गया हो।

चौपाई

कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना॥ उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी॥ २ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी ने राजा को बहुत दुखी देखकर अपने हृदय में जान लिया कि अब सूर्यकुल का सूर्य अस्त हो चला! तब श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्या हृदय में धीरज धरकर समय के अनुकूल वचन बोलीं--।

चौपाई

नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू॥ करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू॥ ३ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आप मन में समझकर विचार कीजिये कि श्रीरामचन्द्र का वियोग अपार समुद्र है। अयोध्या जहाज है और आप उसके कर्णधार (खेनेवाले) हैं। सब प्रियजन (कुटुम्बी और प्रजा) ही यात्रियों का समाज है जो इस जहाज पर चढ़ा हुआ है।

चौपाई

धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू॥ जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

आप धीरज धरियेगा तो सब पार पहुँच जायँगे। नहीं तो सारा परिवार डूब जायगा। हे प्रिय स्वामी! यदि मेरी विनती हृदय में धारण कीजियेगा तो श्रीराम, लक्ष्मण, सीता फिर आ मिलेंगे।

दोहा

प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि। तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि॥ १५४ ॥

अर्थ:

प्रिय पत्नी कौसल्या के कोमल वचन सुनते हुए राजा ने आँखें खोलकर देखा! मानो तड़पती हुई दीन मछली पर कोई शीतल जल छिड़क रहा हो।

दोहा 155 के अंतर्गत
चौपाई

धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू॥ कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही॥ १ ॥

अर्थ:

धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले--सुमन्त्र! कहो, कृपालु श्रीराम कहाँ हैं ? लक्ष्मण कहाँ हैं? स्नेही राम कहाँ हैं? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहाँ है ?

चौपाई

बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती॥ तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई॥ २ ॥

अर्थ:

राजा व्याकुल होकर बहुत प्रकार से विलाप कर रहे हैं। वह रात युग के समान बड़ी हो गयी, बीतती ही नहीं। राजा को अंधे तपस्वी (श्रवणकुमार के पिता) के शाप की याद आ गयी। उन्होंने सब कथा कौसल्याको कह सुनायी।

चौपाई

भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा॥ सो तनु राखि करब मैं काहा। जेहिं न प्रेम पनु मोर निबाहा॥ ३ ॥

अर्थ:

उस इतिहास का वर्णन करते-करते राजा व्याकुल हो गये और कहने लगे कि श्रीराम के बिना जीने की आशा को धिक्कार है। मैं उस शरीर को रखकर क्या करूँगा जिसने मेरा प्रेम-प्रण नहीं निबाहा?

चौपाई

हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते॥ हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर॥ ४ ॥

अर्थ:

हा रघुकुलको आनन्द देनेवाले मेरे प्राणप्यारे राम! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुवर ! हा पिताके चित्तरूपी चातकके हित करनेवाले मेघ !

दोहा

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥ १५५ ॥

अर्थ:

राम-राम कहकर, फिर राम कहकर, फिर राम-राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्रीराम के विरह में शरीर त्याग कर सुरलोक को सिधार गये।

दोहा 156 के अंतर्गत
चौपाई

जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा॥ जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा॥ १ ॥

अर्थ:

जीने और मरने का फल तो दशरथजी ने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेक ब्रह्माण्डों में छा गया। जीते-जी तो श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमा के समान मुख को देखा और श्रीराम के विरह को निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया।

चौपाई

सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥ करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहिं भूमितल बारहिं बारा॥ २ ॥

अर्थ:

सब रानियाँ शोक के मारे व्याकुल होकर रो रही हैं। वे राजा के रूप, शील, बल और तेज का बखान कर-करके अनेकों प्रकार से विलाप कर रही हैं और बार-बार धरती पर गिर-गिर पड़ती हैं।

चौपाई

बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी॥ अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू॥ ३ ॥

अर्थ:

दास-दासीगण व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं और नगरनिवासी घर-घर रो रहे हैं। कहते हैं कि आज धर्म की सीमा, गुण और रूप के भण्डार सूर्यकुल के सूर्य अस्त हो गये!

चौपाई

गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं॥ एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी॥ ४ ॥

अर्थ:

सब कैकेयी को गालियाँ देते हैं, जिसने संसार भर को बिना नेत्र का (अंधा) कर दिया! इस प्रकार विलाप करते रात बीत गयी। प्रातःकाल सब बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि आये।

दोहा

तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास। सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥ १५६ ॥

अर्थ:

तब वसिष्ठ मुनि ने समय के अनुकूल अनेक इतिहास कहकर अपने विज्ञान के प्रकाश से सबका शोक दूर किया।