श्रीराम-भरत संवाद, पादुका प्रदान, भरतजी की विदाई

अंतिम संवाद में भरतजी बार-बार श्रीरामजी से अयोध्या लौटने की प्रार्थना करते हैं, पर श्रीरामजी पितृवचन की मर्यादा निभाने पर अटल रहते हैं। अंततः वे अपनी पादुकाएँ भरतजी को प्रदान करते हैं, और भरतजी उन्हें राज्य की धरोहर मानकर विदा लेते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४८ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥ भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

[अगले छठे दिन] सबेरे स्नान करके भरतजी, भूमिसुर और तेरहुति राजू तथा सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करने के लिये अच्छा दिन है, यह मन में जानकर भी कृपालु श्रीरामजी कहने में सकुचा रहे हैं।

चौपाई

गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी॥ सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने गुरु वसिष्ठजी, राजा जनकजी, भरतजी और सारी सभा की ओर देखा, किन्तु फिर सकुचाकर दृष्टि फेरकर वे पृथ्वी की ओर ताकने लगे। सभा उनके शील की सराहना करके सोचती है कि श्रीरामचन्द्रजी के समान संकोची स्वामी कहीं नहीं हैं।

चौपाई

भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी॥ करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी॥ ३ ॥

अर्थ:

सुजान भरतजी श्रीरामचन्द्रजी का रुख देखकर प्रेमपूर्वक उठकर, विशेषरूप से धीरज धारण कर दण्डवत् करके हाथ जोड़कर कहने लगे--हे नाथ! आपने मेरी सभी रुचियाँ रखीं।

चौपाई

मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू॥ अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई॥ ४ ॥

अर्थ:

मेरे लिये सब लोगों ने सन्ताप सहा और आपने भी बहुत प्रकार से दुःख पाया। अब स्वामी मुझे आज्ञा दें। मैं जाकर अवध अवधि भर अवध का सेवन करूँ।

दोहा

जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल। सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल॥ ३१३ ॥

अर्थ:

हे दीनदयालु! जिस उपाय से यह दास फिर चरणों का दर्शन करे--हे कोसलाधीश! हे कृपालु! अवधि भर के लिये मुझे वही शिक्षा दीजिये।

दोहा 314 के अंतर्गत
चौपाई

पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं। सब सुचि सरस सनेहँ सगाईं॥ राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू॥ १ ॥

अर्थ:

हे गोसाई! आपके प्रेम और सम्बन्ध से अवधपुरवासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस (आनन्द) से युक्त हैं। आपके लिये भवदुःख (जन्म-मरण के दुःख) की ज्वाला में जलना भी अच्छा है और प्रभु (आप) के बिना परमपद (मोक्ष) का लाभ भी व्यर्थ है।

चौपाई

स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की॥ प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू॥ २ ॥

अर्थ:

हे स्वामी! आप सुजान हैं, सभी के हृदय की और मुझ सेवक के मन की रुचि, लालसा (अभिलाषा) और रहनी जानकर, हे प्रणतपाल! आप सब किसी का पालन करेंगे और हे देव! दोनों दिशाओं की ओर निबाहेंगे।

चौपाई

अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो॥ आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू॥ ३ ॥

अर्थ:

मुझे सब प्रकार से ऐसा बहुत बड़ा भरोसा है। विचार करने पर तिनके के बराबर (जरा-सा) भी सोच नहीं रह जाता। मेरी दीनता और स्वामी का स्नेह दोनों ने मिलकर मुझे जबर्दस्ती ढीठ बना दिया है।

चौपाई

यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी॥ भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी॥ ४ ॥

अर्थ:

हे स्वामी! इस बड़े दोष को दूर करके संकोच त्यागकर मुझ सेवक को शिक्षा दीजिये। दूध और जल को अलग-अलग करने में हंसिनी की-सी गतिवाली भरतजी की विनती सुनकर सब ने उसकी प्रशंसा की।

दोहा

दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन। देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन॥ ३१४ ॥

अर्थ:

दीनबन्धु और परम चतुर श्रीरामजी भाई भरतजी के दीन और छलरहित वचन सुनकर देश, काल और अवसर के अनुकूल वचन बोले--।

दोहा 315 के अंतर्गत
चौपाई

तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की॥ माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! तुम्हारी, मेरी, परिवार की, घर की और वन की सारी चिन्ता गुरु वसिष्ठजी और महाराज जनकजी को है। हमारे सिर पर जब गुरुजी, मुनि विश्वामित्रजी और मिथिलापति जनकजी हैं, तब हमें और तुम्हें सपने में भी क्लेश नहीं है।

चौपाई

मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु॥ पितु आयसु पालिहिं दुहु भाईं। लोक बेद भल भूप भलाईं॥ २ ॥

अर्थ:

मेरा और तुम्हारा तो परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ इसी में है कि हम दोनों भाई पिताजी की आज्ञा का पालन करें। राजा की भलाई (उनके व्रत की रक्षा) से ही लोक और वेद दोनों में भला है।

चौपाई

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें॥ अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई॥ ३ ॥

अर्थ:

गुरु, पिता, माता और स्वामी की शिक्षा (आज्ञा) का पालन करने से कुमार्ग पर भी चलने से पैर गड्ढे में नहीं पड़ता (पतन नहीं होता)। ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर अवध जाकर अवधि भर उसका पालन करो।

चौपाई

देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू॥ तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी॥ ४ ॥

अर्थ:

देश, कोष, कुटुम्ब, परिवार आदि सब की जिम्मेदारी तो गुरुजी की चरण-रज पर है। तुम तो मुनि वसिष्ठजी, माताओं और मन्त्रियों की शिक्षा मानकर तदनुसार पृथ्वी, प्रजा और राजधानी का पालन (रक्षा)-भर करते रहना।

दोहा

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥ ३१५ ॥

अर्थ:

तुलसीदासजी कहते हैं--[ श्रीरामजी ने कहा-- ] मुखिया मुख के समान होना चाहिये, जो खाने-पीने को तो एक (अकेला) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है।

दोहा 316 के अंतर्गत
चौपाई

राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई॥ बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती॥ १ ॥

अर्थ:

राजधर्म का सर्वस्व (सार) भी इतना ही है। जैसे मन के भीतर मनोरथ छिपा रहता है। श्रीरघुनाथजी ने भाई भरत को बहुत प्रकार से समझाया। परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना उनके मन में न संतोष हुआ, न शान्ति।

चौपाई

भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू॥ प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं॥ २ ॥

अर्थ:

इधर तो भरतजी का शील (प्रेम) और उधर गुरुजनों, मन्त्रियों तथा समाज की उपस्थिति! यह देखकर श्रीरघुनाथजी संकोच तथा स्नेह के विशेष वशीभूत हो गये। ( अर्थात् भरतजी के प्रेमवश उन्हें पाँवरी देना चाहते हैं, किन्तु साथ ही गुरु आदि का संकोच भी होता है।) आखिर [भरतजी के प्रेमवश] प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने कृपा कर खड़ाऊँ दे दीं और भरतजी ने उन्हें आदरपूर्वक सिर पर धारण कर लिया।

चौपाई

चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के॥ संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जनु जीव जतन के॥ ३ ॥

अर्थ:

करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजी के दोनों खड़ाऊँ प्रजा के प्राणों की रक्षा के लिये मानो दो पहरेदार हैं। भरतजी के प्रेमरूपी रत्न के लिये मानो डिब्बा है और जीव के साधन के लिये मानो राम-नाम के दो अक्षर हैं।

चौपाई

कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के॥ भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें॥ ४ ॥

अर्थ:

रघुकुल [की रक्षा] के लिये दो किवाड़ हैं। कुशल (श्रेष्ठ) कर्म करने के लिये दो हाथ की भाँति (सहायक) हैं। और सेवा रूपी श्रेष्ठ धर्म के सुझाने के लिये निर्मल नेत्र हैं। भरतजी इस अवलम्ब के मिल जाने से परम आनन्दित हैं। उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसा श्रीसीतारामजी के रहने से होता।

दोहा

मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ। लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ॥ ३१६ ॥

अर्थ:

भरतजी ने प्रणाम करके विदा माँगी, तब श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें हृदय से लगा लिया। इधर कुटिल इन्द्र ने बुरा मौका पाकर लोगों का उच्चाटन कर दिया।

दोहा 317 के अंतर्गत
चौपाई

सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की॥ नतरु लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा॥ १ ॥

अर्थ:

वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवध की आशा के समान ही वह जीवन के लिये संजीवनी हो गयी। नहीं तो (उच्चाटन न होता तो) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी के वियोगरूपी बुरे रोग से सब लोग घबड़ाकर (हाय-हाय करके) मर ही जाते।

चौपाई

रामकृपाँ। अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी॥ भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी की कृपा से। सारी उलझन सुधार दी। देवताओं की सेना जो लूटने आयी थी, वही गुणदायक (हितकारी) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओं में भरकर भाई भरत से मिल रहे हैं। श्रीरामजी के प्रेम का वह रस (आनन्द) कहते नहीं बनता।

चौपाई

तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा॥ बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी॥ ३ ॥

अर्थ:

तन, मन और वचन तीनों में प्रेम उमड़ पड़ा। धीरज की धुरी को धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजी ने भी धीरज त्याग दिया। वे कमलसदृश नेत्रों से [प्रेमाश्रुओं का] जल बहाने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवताओं की सभा दुःखी हो गयी।

चौपाई

मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से॥ जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी-सरीखे धीरधुरंधर जो अपने मनों को ज्ञानरूपी अग्नि में सोने के समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजी ने निर्लेप ही रचा और जो जगत रूपी जल में कमल के पत्ते की तरह ही (जगत में रहते हुए भी जगत से अनासक्त) पैदा हुए।

दोहा

तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार। भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार॥ ३१७ ॥

अर्थ:

वे भी श्रीरामजी और भरतजी के उपमारहित अपार प्रेम को देखकर वैराग्य और विवेक सहित तन, मन, वचन से उस प्रेम में मग्र हो गये।

दोहा 318 के अंतर्गत
चौपाई

जहाँ जनक गुर गति मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी॥ बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू॥ १ ॥

अर्थ:

जहाँ जनकजी और गुरु वसिष्ठजी की बुद्धि की गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेम को प्राकृत (लौकिक) कहने में बड़ा दोष है। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी के वियोग का वर्णन करते सुनकर लोग कवि को कठोरहृदय समझेंगे।

चौपाई

सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी॥ भेंटि भरतु रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए॥ २ ॥

अर्थ:

वह संकोच-रस अकथनीय है। अतएव कवि की सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेम को स्मरण करके सकुचा गयी। भरतजी को भेंटकर श्रीरघुनाथजी ने उनको समझाया। फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नजी को हृदय से लगा लिया।

चौपाई

सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई॥ सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा॥ ३ ॥

अर्थ:

सेवक और मन्त्री भरतजी का रुख पाकर सब अपने-अपने काम में जा लगे। यह सुनकर दोनों समाजों में दारुण दुःख छा गया। वे चलने की तैयारियाँ करने लगे।

चौपाई

प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई॥ मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

प्रभु के चरणकमलों की वन्दना करके तथा श्रीरामजी की आज्ञा को सिर पर रखकर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सब का बार-बार सम्मान करके उनकी विनती की।

दोहा

लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि। चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि॥ ३१८ ॥

अर्थ:

फिर लक्ष्मणजी को भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजी के चरणों की धूलि को सिर पर धारण करके और समस्त मंगलों के मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेम सहित चले।