श्रीसीताजी का स्वप्न, श्रीरामजी को कोल-किरातों द्वारा भरतजी के आगमन की सूचना, रामजी का शोक, लक्ष्मणजी का क्रोध

श्रीसीताजी एक अशुभ संकेत वाला स्वप्न देखती हैं, और तभी कोल-किरात आकर भरतजी के आगमन का समाचार देते हैं। श्रीरामजी परिवार की पीड़ा से द्रवित होते हैं, जबकि लक्ष्मणजी रक्षक भाव से उद्विग्न और क्रोधित हो उठते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३६ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें॥ जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें॥ १ ॥

अर्थ:

सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम के मारे शिथिल होने के कारण सूर्यास्त होने तक (दिनभर में) दो ही कोस चल पाये और जल-स्थल का सुवास देखकर रात को वहीं [बिना खाये-पीये ही] रह गये। रात बीतने पर श्रीरघुनाथजी के प्रेम से आगे गमन किया।

चौपाई

उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा॥ सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए॥ २ ॥

अर्थ:

उधर श्रीरामचन्द्रजी रात शेष रहते ही जागे। रात में सीताजी ने ऐसा स्वप्न देखा [जिसे वे श्रीरामजी को सुनाने लगीं] मानो समाज सहित भरतजी यहाँ आये हैं। प्रभु के वियोग की अग्नि से उनका शरीर संतप्त है।

चौपाई

सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी॥ सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन॥ ३ ॥

अर्थ:

सभी लोग मन में उदास, दीन और दुःखी हैं। सासुओं को दूसरी ही सूरत में देखा। सीताजी का स्वप्न सुनकर श्रीरामचन्द्रजी के नेत्रों में जल भर आया और सबको सोच से छुड़ा देनेवाले प्रभु स्वयं [लीलासे ] सोच के वश हो गये।

चौपाई

लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई॥ अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने॥ ४ ॥

अर्थ:

[और बोले--] लक्ष्मण ! यह स्वप्न अच्छा नहीं है। कोई भीषण कुसमाचार (बहुत ही बुरी खबर) सुनायेगा। ऐसा कहकर उन्होंने भाई सहित स्नान किया और त्रिपुरारि महादेवजी का पूजन करके साधुओं का सम्मान किया।

छन्द

सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उतर दिसि देखत भए। नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए॥ तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे। सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे॥

अर्थ:

देवताओं का सम्मान (पूजन) और मुनियों की वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजी बैठ गये और उत्तर दिशा की ओर देखने लगे। आकाश में धूल छा रही है; बहुत-से पक्षी और पशु व्याकुल होकर भागे हुए प्रभु के आश्रमको आ रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी यह देखकर उठे और सोचने लगे कि क्या कारण है? वे चित्त में आश्चर्ययुक्त हो गये। उसी समय कोल-भीलोंने आकर सब समाचार कहे॥

सोरठा

सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर। सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल॥ २२६ ॥

अर्थ:

तुलसीदासजी कहते हैं कि सुन्दर मंगल वचन सुनते ही श्रीरामजी के मन में बड़ा आनन्द हुआ। शरीर में पुलकावली छा गयी, और शरद्-ऋतु के कमल के समान नेत्र प्रेमाश्रुओं से भर गये।

दोहा 227 के अंतर्गत
चौपाई

बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू॥ एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी॥ १ ॥

अर्थ:

सीतापति श्रीरामचन्द्रजी पुनः सोच के वश हो गये कि भरत के आने का क्या कारण है? फिर एक ने आकर ऐसा कहा कि उनके साथ में बड़ी भारी चतुरंगिणी सेना भी है।

चौपाई

सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू॥ भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को अत्यन्त सोच हुआ। इधर तो पिता के वचन और इधर भाई भरतजी का संकोच ! भरतजी के स्वभाव को मन में समझकर तो प्रभु श्रीरामचन्द्रजी चित्त को ठहराने के लिये कोई स्थान ही नहीं पाते हैं।

चौपाई

समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने॥ लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू॥ ३ ॥

अर्थ:

तब यह जानकर समाधान हो गया कि भरत साधु और सयाने हैं तथा मेरे कहने में (आज्ञाकारी) हैं। लक्ष्मणजी ने देखा कि प्रभु श्रीरामजी के हृदय में चिन्ता है तो वे समय के अनुसार अपना नीतियुक्त विचार कहने लगे--।

चौपाई

बिनु पूछें कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाईं॥ तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी॥ ४ ॥

अर्थ:

हे स्वामी ! आपके बिना ही पूछे मैं कुछ कहता हूँ; सेवक समय पर ढिठाई करने से ढीठ नहीं समझा जाता (अर्थात् आप पूछें तब मैं कहूँ, ऐसा अवसर नहीं है; इसीलिये यह मेरा कहना ढिठाई नहीं होगा)। हे स्वामी ! आप सर्वज्ञों में शिरोमणि हैं (सब जानते ही हैं)। मैं सेवक तो अपनी समझ की बात कहता हूँ।

दोहा

नाथ सुहृद सुठि सरल चित सील सनेह निधान। सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान॥ २२७ ॥

अर्थ:

हे नाथ ! आप परम सुहृद् (बिना ही कारण परम हित करनेवाले), सरलहृदय तथा शील और स्नेह के भण्डार हैं, आपका सभी पर प्रेम और विश्वास है और अपने हृदय में सबको अपने ही समान जानते हैं।

दोहा 228 के अंतर्गत
चौपाई

बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई॥ भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेमु सकल जगु जाना॥ १ ॥

अर्थ:

परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोहवश अपने असली स्वरूप को प्रकट कर देते हैं। भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु (आप) के चरणों में उनका प्रेम है, इस बात को सारा जगत् जानता है।

चौपाई

तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई॥ कुटिल कुबंधु कुअवसरु ताकी। जानि राम बनबास एकाकी॥ २ ॥

अर्थ:

वे भरत भी आज श्रीरामजी (आप) का पद (सिंहासन या अधिकार) पाकर धर्म की मर्यादा मिटाकर चले हैं। कुटिल खोटे भाई भरत कुसमय देखकर और यह जानकर कि रामजी (आप) वनवास में अकेले (असहाय) हैं, आये हैं।

चौपाई

करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू॥ कोटि प्रकार कलपि कुटिलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई॥ ३ ॥

अर्थ:

अपने मन में बुरा विचार करके, समाज जोड़कर राज्य को निष्कण्टक करने के लिये यहाँ आये हैं। करोड़ों (अनेकों) प्रकार की कुटिलताएँ रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आये हैं।

चौपाई

जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली॥ भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ॥ ४ ॥

अर्थ:

यदि इनके हृदय में कपट और कुचाल न होती, तो रथ, घोड़े और हाथियों की कतार [ऐसे समय] किसे सुहाती? परन्तु भरत को ही व्यर्थ कौन दोष दे? राजपद पा जाने पर सारा जगत् ही पागल (मतवाला) हो जाता है।

दोहा

ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान। लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान॥ २२८ ॥

अर्थ:

चन्द्रमा गुरुपत्नीगामी हुआ, राजा नहुष ब्राह्मणों की पालकी पर चढ़ा। और राजा वेन के समान नीच तो कोई नहीं होगा, जो लोक और वेद दोनों से विमुख हो गया।

दोहा 229 के अंतर्गत
चौपाई

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू॥ भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ॥ १ ॥

अर्थ:

सहस्रबाहु, देवराज इन्द्र और त्रिशंकु आदि किसको राजमद ने कलंक नहीं दिया? भरत ने यह उपाय उचित ही किया है। क्योंकि शत्रु और ऋण को कभी रंच भी शेष नहीं रखना चाहिए।

चौपाई

एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई॥ समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी॥ २ ॥

अर्थ:

हाँ, भरत ने एक बात अच्छी नहीं की, जो रामजी (आप) को असहाय जानकर उनका निरादर किया! पर आज संग्राम में श्रीरामजी (आप) का क्रोधपूर्ण मुख देखकर यह बात भी उनकी समझ में विशेष रूप से आ जायगी (अर्थात् इस निरादर का फल भी वे अच्छी तरह पा जायेंगे)।

चौपाई

एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला॥ प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी॥ ३ ॥

अर्थ:

इतना कहते ही लक्ष्मणजी नीतिरस भूल गये और युद्धरसरूपी वृक्ष पुलकावली के बहाने से फूल उठा (अर्थात् नीतिकी बात कहते-कहते उनके शरीर में वीर-रस छा गया)। वे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणों की वन्दना करके, चरण-रज को सिर पर रखकर सच्चा और स्वाभाविक बल कहते हुए बोले।

चौपाई

अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा॥ कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें॥ ४ ॥

अर्थ:

हे नाथ ! मेरा कहना अनुचित न मानियेगा। भरत ने हमारे साथ छोटा व्यवहार नहीं किया है। आखिर कहाँतक सहा जाय और मन मारे रहा जाय, जब स्वामी हमारे साथ हैं और धनुष हमारे हाथ में है।

दोहा

छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान। लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान॥ २२९ ॥

अर्थ:

क्षत्रिय जाति, रघुकुल में जन्म और फिर मैं श्रीरामजी (आप) का अनुगामी (सेवक) हूँ, यह जगत् जानता है। [फिर भला कैसे सहा जाय?] धूल के समान नीच कौन है, परन्तु वह भी लात मारने पर सिर ही चढ़ती है।

दोहा 230 के अंतर्गत
चौपाई

उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा॥ बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा॥ १ ॥

अर्थ:

यों कहकर लक्ष्मणजी ने उठकर, हाथ जोड़कर आज्ञा माँगी। मानो वीररस सोते से जाग उठा हो। सिर पर जटा बाँधकर कमर में तरकस कस लिया और धनुष को सजाकर तथा बाण को हाथ में लेकर कहा--

चौपाई

आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ॥ राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई॥ २ ॥

अर्थ:

आज मैं श्रीराम (आप) का सेवक होने का यश लूँ और भरत को संग्राम में शिक्षा दूँ। श्रीरामचन्द्रजी (आप) के निरादर का फल पाकर दोनों भाई रणशय्या पर सोवें!

चौपाई

आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू॥ जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू॥ ३ ॥

अर्थ:

अच्छा हुआ जो सारा समाज आकर एकत्र हो गया। आज मैं पिछला सब क्रोध प्रकट करूँगा। जैसे सिंह हाथियों के झुंड को कुचल डालता है और बाज जैसे लवे को लपेट में ले लेता है।

चौपाई

तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता॥ जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई॥ ४ ॥

अर्थ:

वैसे ही भरत को सेना समेत और छोटे भाई सहित तिरस्कार करके मैदान में पछाड़ूँगा। यदि शंकरजी भी आकर उनकी सहायता करें, तो भी, मुझे रामजी की सौगन्ध है, मैं उन्हें युद्ध में [अवश्य] मार डालूँगा (छोड़ूँगा नहीं)।

दोहा

अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान। सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान॥ २३० ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी को अत्यन्त क्रोध से तमतमाया हुआ देखकर और उनकी प्रामाणिक (सत्य) सौगन्ध सुनकर सब लोग भयभीत हो जाते हैं और लोकपाल घबड़ाकर भागना चाहते हैं।