जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा
जनक और सुनयना भरतजी के त्याग, विनय और अप्रतिम भ्रातृभक्ति की चर्चा करते हैं। उनके वचनों में भरतजी के चरित्र की ऊँचाई और आध्यात्मिक महिमा प्रकट होती है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४४ / ४९
प्रकरण पाठ
सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥ मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन॥ १ ॥
अर्थ:
सोने में सुगंध और [समुद्र से निकली हुई] सुधा में चन्द्रमा के सार अमृत के समान भरतजी का व्यवहार सुनकर राजा ने [प्रेमविह्वल होकर] अपने [प्रेमाश्रुओं] के जल से भरे नेत्रों को मूँद लिया (वे भरतजी के प्रेम में मानो ध्यानस्थ हो गये)। वे शरीर से पुलकित हो गये और मन में आनन्दित होकर भरतजी के सुन्दर यश की सराहना करने लगे।
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥ धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू॥ २ ॥
अर्थ:
[वे बोले--] हे सुमुखि! हे सुनयनी! सावधान होकर सुनो। भरतजी की कथा संसार के बन्धन से छुड़ाने वाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार--इन तीनों विषयों में अपनी बुद्धि के अनुसार मेरी [थोड़ी-बहुत] गति है (अर्थात् इनके सम्बन्ध में मैं कुछ जानता हूँ)।
सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही॥ बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद॥ ३ ॥
अर्थ:
वह (धर्म, राजनीति और ब्रह्मज्ञान में प्रवेश रखनेवाली) मेरी बुद्धि भरतजी की महिमा का वर्णन तो क्या करे, छल करके भी उसकी छाया तक को नहीं छू पाती! ब्रह्माजी, गणेशजी, शेषजी, महादेवजी, सरस्वतीजी, कवि, ज्ञानी, पण्डित और बुद्धिमान्--।
भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती॥ समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू॥ ४ ॥
अर्थ:
सब किसी को भरतजी के चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य समझने में और सुनने में सुख देने वाले हैं और पवित्रता में गंगाजी का तथा स्वाद (मधुरता) में अमृत का भी तिरस्कार करने वाले हैं।
निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि। कहिअसुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि॥ २८८ ॥
अर्थ:
भरतजी असीम गुणसम्पन्न और उपमारहित पुरुष हैं। भरतजी के समान बस, भरतजी ही हैं, ऐसा जानो। सुमेरु पर्वत को क्या सेर के बराबर कह सकते हैं ? इसलिये (उन्हें किसी पुरुष के साथ उपमा देने में) कवि समाज की बुद्धि भी सकुचा गयी !।
अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी॥ भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी॥ १ ॥
अर्थ:
हे श्रेष्ठ वर्णाली! भरतजी की महिमा का वर्णन करना सभी के लिये वैसे ही अगम है जैसे जलरहित पृथ्वी पर मछली का चलना। हे रानी! सुनो, भरतजी की अपरिमित महिमा को एक श्रीरामचन्द्रजी ही जानते हैं; किन्तु वे भी उसका वर्णन नहीं कर सकते।
देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी॥ भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की॥ ३ ॥
अर्थ:
परन्तु हे देवि! भरतजी और श्रीरामचन्द्रजी का प्रेम और एक-दूसरे पर विश्वास, बुद्धि और विचार की सीमा में नहीं आ सकता। यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी समता की सीमा हैं, तथापि भरतजी प्रेम और ममता की सीमा हैं।
परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥ साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू॥ ४ ॥
अर्थ:
[श्रीरामचन्द्रजी के प्रति अनन्य प्रेम को छोड़कर] भरतजी ने समस्त परमार्थ, स्वार्थ और सुखों की ओर स्वप्न में भी मन से भी नहीं ताका है। श्रीरामजी के चरणों का प्रेम ही उनका साधन है और वही सिद्धि है। मुझे तो भरतजी का बस, यही एकमात्र सिद्धान्त जान पड़ता है।
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ॥ तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा॥ ४ ॥
अर्थ:
ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी अत्यन्त ही सकुचा गये। उनका शील-स्वभाव देखकर [प्रेम और आनन्द से] मुनि वसिष्ठजी पुलकित हो गये। [उन्होंने खुलकर कहा-] हे राम! तुम्हारे बिना [घर-बार आदि] सम्पूर्ण सुखों के साज दोनों राजसमाजों को नरक के समान हैं।
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं॥ राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें॥ २ ॥
अर्थ:
तुम्हारे बिना सब दुखी हैं और जो सुखी हैं वे तुम्हीं से सुखी हैं। जिस किसी के जी में जो कुछ है, तुम सब जानते हो। आपकी आज्ञा सभी के सिर पर है। कृपालु (आप) को सभी की स्थिति अच्छी तरह मालूम है।