सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना, कैकेयी-मंथरा-संवाद

देवताओं की प्रार्थना से सरस्वती मंथरा की बुद्धि फेर देती हैं। मंथरा कैकेयी के मन में संशय और रोष भरकर उसे वरदान माँगने के लिए उकसाती है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३ / ४९

प्रकरण पाठ

दोहा

नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि। अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि॥ १२ ॥

अर्थ:

मन्थरा नाम की कैकेयी की एक मंदबुद्धि दासी थी, उसे अपयश की पिटारी बनाकर सरस्वती उसकी बुद्धि फेरकर चली गयीं।

दोहा 13 के अंतर्गत
चौपाई

दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा॥ पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू॥ १ ॥

अर्थ:

मन्थरा ने देखा कि नगर सजाया हुआ है। सुन्दर, मंगलमय बधावे बज रहे हैं। उसने लोगों से पूछा कि कैसा उत्सव है? [उनसे] श्रीरामचन्द्रजी के राजतिलक की बात सुनते ही उसका हृदय जल उठा।

चौपाई

करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती॥ देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती॥ २ ॥

अर्थ:

वह दुर्बुद्धि, नीच जातिवाली दासी विचार करने लगी कि किस प्रकार से यह काम रात-ही-रात में बिगड़ जाय, जैसे कोई कुटिल भीलनी शहद का छत्ता लगा देखकर घात लगाती है कि इसको किस तरह से उखाड़ लूँ।

चौपाई

भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी॥ ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू॥ ३ ॥

अर्थ:

वह उदास होकर भरतजी की माता कैकेयी के पास गयी। रानी कैकेयी ने हँसकर कहा—तू उदास क्यों है? मन्थरा कुछ उत्तर नहीं देती, केवल लंबी साँस ले रही है और त्रियाचरित्र करके आँसू ढरका रही है।

चौपाई

हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें॥ तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि॥ ४ ॥

अर्थ:

रानी हँसकर कहने लगी कि तेरे बड़े गाल हैं (तू बहुत बढ़-बढ़कर बोलने वाली है)। मेरा मन कहता है कि लक्ष्मण ने तुझे कुछ सीख दी है (दण्ड दिया है)। तब भी वह महापापिनी दासी कुछ भी नहीं बोलती। ऐसी लंबी साँस छोड़ रही है, मानो काली नागिन [फुफकार छोड़ रही] हो।

दोहा

सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु। लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु॥ १३ ॥

अर्थ:

तब रानी ने डरकर कहा—अरी! कहती क्यों नहीं? श्रीरामचन्द्र, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न कुशल से तो हैं? यह सुनकर कुबरी मन्थरा के हृदय में बड़ी ही पीड़ा हुई।

दोहा 14 के अंतर्गत
चौपाई

कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई॥ रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू॥ १ ॥

अर्थ:

कोई हमें क्यों सीख देगा, हे माई! और मैं किसका बल पाकर गाल करूँगी (बढ़-बढ़कर बोलूँगी)। रामचन्द्र को छोड़कर आज और किसकी कुशल है, जिसे राजा युवराज-पद दे रहे हैं।

चौपाई

भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन॥ देखहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा॥ २ ॥

अर्थ:

आज कौसल्या को विधाता बहुत ही दाहिने (अनुकूल) हुए हैं; यह देखकर उनके हृदय में गर्व समाता नहीं। तुम स्वयं जाकर सब शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरे मन में क्षोभ हुआ है।

चौपाई

पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें॥ नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई॥ ३ ॥

अर्थ:

तुम्हारा पुत्र विदेश में है, तुम्हें कुछ सोच नहीं। जानती हो कि स्वामी हमारे वश में है। तुम्हें तो सजे हुए पलंग पर पड़े-पड़े नींद लेना ही बहुत प्यारा लगता है, राजा की कपटभरी चतुराई तुम नहीं देखतीं।

चौपाई

सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी॥ पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

मन्थरा के प्रिय वचन सुनकर, किंतु उसके मन की मैल जानकर रानी झुककर बोली—बस, अब चुप रह, घरफोड़ी कहीं की! जो फिर कभी ऐसा कहा तो तेरी जीभ पकड़कर निकलवा लूँगी।

दोहा

काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि। तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि॥ १४ ॥

अर्थ:

कानों, लँगड़ों और कुबड़ों को कुटिल और कुचाली जानना चाहिए। उनमें भी स्त्री, और खासकर दासी! इतना कहकर भरतजी की माता कैकेयी मुसकरा दीं।

दोहा 15 के अंतर्गत
चौपाई

प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही॥ सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई॥ १ ॥

अर्थ:

और फिर बोलीं-- हे प्रिय वचन कहनेवाली मन्थरा! मैंने तुझको यह सीख दी है (शिक्षा के लिए इतनी बात कही है)। मुझे तुझपर स्वप्न में भी क्रोध नहीं है। सुन्दर मंगलदायक शुभ दिन वही होगा जिस दिन तेरा कहना सत्य होगा (अर्थात् श्रीराम का राज्यतिलक होगा)।

चौपाई

जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई॥ राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली॥ २ ॥

अर्थ:

बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता है। यह सूर्यवंश की सुहावनी रीति ही है। यदि सचमुच कल ही श्रीराम का तिलक है, तो हे सखी! तेरे मन को अच्छी लगे वही वस्तु माँग ले, मैं दूँगी।

चौपाई

कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी॥ मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी॥ ३ ॥

अर्थ:

राम को सहज स्वभाव से सब माताएँ कौसल्या के समान ही प्यारी हैं। मुझ पर तो वे विशेष प्रेम करते हैं। मैंने उनकी प्रीति की परीक्षा करके देख ली है।

चौपाई

जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू॥ प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें॥ ४ ॥

अर्थ:

जो विधाता कृपा करके जन्म दें तो [यह भी दें कि] श्रीरामचन्द्र पुत्र और सीता बहू हों। श्रीराम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। उनके तिलक से (उनके तिलक की बात सुनकर) तुझे क्षोभ कैसा?

दोहा

भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ। हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ॥ १५ ॥

अर्थ:

तुझे भरत की सौगन्ध है, छल-कपट छोड़कर सच-सच कह। तू हर्ष के समय विषाद कर रही है, मुझे इसका कारण सुना।

दोहा 16 के अंतर्गत
चौपाई

एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी॥ फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा॥ १ ॥

अर्थ:

सारी आशाएँ तो एक ही बार कहने में पूरी हो गयीं। अब तो दूसरी जीभ लगाकर कुछ कहूँगी। मेरा अभागा कपाल तो फोड़ने ही योग्य है, जो अच्छी बात कहने पर भी आपको दुःख होता है।

चौपाई

कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई॥ हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती॥ २ ॥

अर्थ:

जो झूठी-सच्ची बातें बनाकर कहते हैं, हे माई! वे ही तुम्हें प्रिय हैं और मैं कड़वी लगती हूँ! अब मैं भी ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कहा करूँगी। नहीं तो दिन-रात चुप रहूँगी।

चौपाई

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा॥ कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥ ३ ॥

अर्थ:

विधाता ने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [दूसरे को क्या दोष] जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ। कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है? दासी छोड़कर अब क्या मैं रानी होऊँगी।

चौपाई

जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा॥ तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी॥ ४ ॥

अर्थ:

हमारा स्वभाव तो जलाने ही योग्य है। क्योंकि तुम्हारा अहित मुझसे देखा नहीं जाता। इसीलिये कुछ बात चलायी थी। किन्तु हे देवि! हमारी बड़ी भूल हुई, क्षमा करो।

दोहा

गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि। सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि॥ १६ ॥

अर्थ:

अधरबुद्धि रानी कैकेयी ने देवताओं की माया के वश होकर रहस्ययुक्त कपटभरे प्रिय वचनों को सुनकर बैरिन मन्थरा को अपनी सुहृद् (अहैतुक हित करनेवाली) जानकर उसका विश्वास कर लिया।

दोहा 17 के अंतर्गत
चौपाई

सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही॥ तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी॥ १ ॥

अर्थ:

बार-बार रानी उससे आदर के साथ पूछ रही हैं, मानो भीलनी के गान से हिरनी मोहित हो गयी हो। जैसी भावी (होनहार) है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गयी। दासी अपना दाँव लगा जानकर हर्षित हुई।

चौपाई

तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ॥ सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली॥ २ ॥

अर्थ:

तुम पूछती हो, किंतु मैं कहते डरती हूँ। क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। बहुत तरह से गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्या की साढ़साती बोली--।

चौपाई

प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी॥ रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिरीते॥ ३ ॥

अर्थ:

हे रानी! तुमने जो कहा कि मुझे सीता-राम प्रिय हैं और राम को तुम प्रिय हो, सो यह बात सच्ची है। परन्तु यह बात पहले थी, वे दिन अब बीत गये। समय फिर जाने पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं।

चौपाई

भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा॥ जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी॥ ४ ॥

अर्थ:

सूर्य कमल के कुल का पालन करनेवाला है, पर बिना जल के वही सूर्य उनको (कमलों को) जलाकर भस्म कर देता है। सौत कौसल्या तुम्हारी जड़ उखाड़ना चाहती है। अतः उपायरूपी श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) लगाकर उसे रूँध दो (सुरक्षित कर दो)।

दोहा

तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ। मन मलीन मुह मीठ नृपु राउर सरल सुभाउ॥ १७ ॥

अर्थ:

तुमको अपने सुहाग के [झूठे] बल पर कुछ भी सोच नहीं है; राजाको अपने वश में जानती हो। किन्तु राजा मन के मैले और मुँह के मीठे हैं! और आपका सीधा स्वभाव है (आप कपट-चतुराई जानती ही नहीं)।

दोहा 18 के अंतर्गत
चौपाई

चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी॥ पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानब रउरें॥ १ ॥

अर्थ:

राम की माता (कौसल्या) बड़ी चतुर और गम्भीर है (उसकी थाह कोई नहीं पाता)। उसने मौका पाकर अपनी बात बना ली। राजाने जो भरत को ननिहाल भेज दिया, उसमें आप बस राम की माता की ही सलाह समझिये।

चौपाई

सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें॥ सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई॥ २ ॥

अर्थ:

[कौसल्या समझती है कि] और सब सौतें तो मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरत की माँ पति के बल पर गर्वित रहती है! इसी से हे माई! कौसल्या को तुम बहुत ही साल (खटक) रही हो। किन्तु वह कपट करने में चतुर है; अतः उसके हृदय का भाव जानने में नहीं आता (वह उसे चतुराई से छिपाए रखती है)।

चौपाई

राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी॥ रचि प्रपंचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा का तुम पर विशेष प्रेम है। कौसल्या सौत के स्वभाव से उसे देख नहीं सकती। इसीलिये उसने जाल रचकर राजाको अपने वश में करके [भरत की अनुपस्थितिमें] राम के राजतिलक के लिये लग्न निश्चय करा लिया।

चौपाई

यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका॥ आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही॥ ४ ॥

अर्थ:

राम को तिलक हो, यह रघुकुल के उचित ही है और यह बात सभी को सुहाती है; और मुझे तो बहुत ही अच्छी लगती है। परन्तु मुझे तो आगे की बात सोचकर डर लगता है। दैव उलटकर इसका फल उसी (कौसल्या) को दे।

दोहा

रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु। कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु॥ १८ ॥

अर्थ:

इस तरह करोड़ों कुटिलपन की बातें गढ़-छोलकर मन्थरा ने कैकेयी को उलटा-सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतों की कहानियाँ इस प्रकार [बना-बनाकर] कहीं जिस प्रकार विरोध बढ़े।

दोहा 19 के अंतर्गत
चौपाई

भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई॥ का पूँछहु तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना॥ १ ॥

अर्थ:

होनहार वश कैकेयी के मन में विश्वास हो गया। रानी फिर सौगन्ध दिलाकर पूछने लगी। [मन्थरा बोली--] क्या पूछती हो? अरे, तुमने अब भी नहीं समझा? अपने भले-बुरे को (अथवा मित्र-शत्रु को) तो पशु भी पहचान लेते हैं।

चौपाई

भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू॥ खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें॥ २ ॥

अर्थ:

पूरा पखवाड़ा बीत गया सामान सजते और तुमने खबर पायी है आज मुझसे! मैं तुम्हारे राज में खाती-पहनती हूँ, इसलिये सच कहने में मुझे कोई दोष नहीं है।

चौपाई

जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई॥ रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि मैं कुछ बनाकर झूठ कहती होऊँगी तो विधाता मुझे दण्ड देगा। यदि कल राम को राजतिलक हो गया तो [समझ रखना कि] तुम्हारे लिये विधाता ने विपत्ति का बीज बो दिया।

चौपाई

रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी॥ जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं यह बात लकीर खींचकर बलपूर्वक कहती हूँ, हे भामिनी! तुम तो अब दूध की मक्खी हो गयी! (जैसे दूध में पड़ी हुई मक्खी को लोग निकालकर फेंक देते हैं, वैसे ही तुम्हें भी लोग घर से निकाल बाहर करेंगे) जो पुत्रसहित [कौसल्या की] चाकरी बजाओगी तो घर में रह सकोगी; [अन्यथा घर में रहने का] दूसरा उपाय नहीं।

दोहा

कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब। भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब॥ १९ ॥

अर्थ:

कद्रू ने विनता को दुःख दिया था, तुम्हें कौसल्या देगी। भरत कारागार का सेवन करेंगे (जेल की हवा खायेंगे) और लक्ष्मण राम के नायब (सहकारी) होंगे।

दोहा 20 के अंतर्गत
चौपाई

कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी॥ तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी॥ १ ॥

अर्थ:

कैकेयी मंथरा की कड़वी वाणी सुनते ही डरकर सूख गयी, कुछ बोल नहीं सकती। शरीर में पसीना आ गया और वह केले की तरह काँपने लगी। तब कुबरी (मंथरा) ने अपनी जीभ दाँतों तले दबायी (उसे भय हुआ कि कहीं भविष्य का अत्यन्त डरावना चित्र सुनकर कैकेयी के हृदय की गति न रुक जाय; जिससे उलटा सारा काम ही बिगड़ जाय)।

चौपाई

कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी॥ फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली॥ २ ॥

अर्थ:

फिर कपट की करोड़ों कहानियाँ कह-कहकर उसने रानी को खूब समझाया कि धीरज रखो! कैकेयी का भाग्य पलट गया, उसे कुचाल प्यारी लगी। वह बगुली को हंसिनी मानकर (वैरिण को हित मानकर) उसकी सराहना करने लगी।

चौपाई

सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी॥ दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने॥ ३ ॥

अर्थ:

कैकेयी ने कहा--मंथरा! सुन, तेरी बात सत्य है। मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़का करती है। मैं प्रतिदिन रात को बुरे स्वप्न देखती हूँ; किन्तु अपने मोहवश तुझसे कहती नहीं।

चौपाई

काह करौं सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

सखी! क्या करूँ, मेरा तो सीधा स्वभाव है। मैं दायाँ-बायाँ कुछ भी नहीं जानती।

दोहा

अपनें चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह। केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह॥ २० ॥

अर्थ:

[कैकेयी ने कहा--] अपने चलते जहाँ तक मेरा वश चला, मैंने आज तक कभी किसी का बुरा नहीं किया। फिर न जाने किस पाप से दैव ने मुझे एक ही साथ यह दुःसह दुःख दिया।

दोहा 21 के अंतर्गत
चौपाई

नैहर जनमु भरब बरु जाई। जिअत न करबि सवति सेवकाई॥ अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही॥ १ ॥

अर्थ:

मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूँगी; पर जीते-जी सौत की चाकरी नहीं करूँगी। दैव जिसको शत्रु के वश में रखकर जिलाता है, उसके लिए तो जीने की अपेक्षा मरना ही अच्छा है।

चौपाई

दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी॥ अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना॥ २ ॥

अर्थ:

रानी ने बहुत प्रकार के दीन वचन कहे। उन्हें सुनकर कुबरी ने स्त्री-माया ठानी। [वह बोली--] तुम मन में ग्लानि मानकर ऐसा क्यों कह रही हो, तुम्हारा सुख-सुहाग दिन-दिन दूना होगा।

चौपाई

जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका॥ जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नीद न जामिनि॥ ३ ॥

अर्थ:

जिसने तुम्हारी बुराई चाही है, वही परिणाम में यह फल पायेगा। हे स्वामिनि! मैंने जब से यह कुमत सुना है, तब से मुझे न तो दिन में कुछ भूख लगती है और न रात में नींद ही आती है।

चौपाई

पूँछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची॥ भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

मैंने ज्योतिषियों से पूछा, तो उन्होंने रेखा खींचकर (गणित करके अथवा निश्चयपूर्वक) कहा कि भरत राजा होंगे, यह सत्य बात है। हे भामिनि! तुम करो, तो उपाय मैं बताऊँ। राजा तुम्हारी सेवा के वश में हैं ही।

दोहा

परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि। कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि॥ २१ ॥

अर्थ:

[कैकेयी ने कहा--] मैं तेरे कहने से कुएँ में गिर सकती हूँ, पुत्र और पति को भी छोड़ सकती हूँ। जब तू मेरा बड़ा भारी दुःख देखकर कुछ कहती है, तो भला मैं अपने हित के लिए उसे क्यों न करूँगी?

दोहा 22 के अंतर्गत
चौपाई

कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई॥ लखइ न रानि निकट दुखु कैसें। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें॥ १ ॥

अर्थ:

कुबरी ने कैकेयी को [सब तरह से] कबूल करवाकर (अर्थात् बलिपशु बनाकर) कपटरूप छुरी को अपने [कठोर] हृदयरूपी पत्थर पर टेई (उसकी धार को तेज किया)। रानी कैकेयी अपने निकट के (शीघ्र आने वाले) दुःख को कैसे नहीं देखती, जैसे बलि का पशु हरी-हरी घास चरता है [पर यह नहीं जानता कि मौत सिर पर नाच रही है]।

चौपाई

सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी॥ कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाहीं। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

मंथरा की बातें सुनने में तो कोमल हैं, पर परिणाम में कठोर (भयानक) हैं। मानो वह शहद में घोलकर ज़हर पिला रही हो। दासी कहती है--हे स्वामिनि! तुमने मुझको एक कथा कही थी, उसकी याद है कि नहीं ?

चौपाई

दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती॥ सुतहि राजु रामहि बनबासू। देहु लेहु सब सवति हुलासू॥ ३ ॥

अर्थ:

तुम्हारे दो वरदान राजा के पास धरोहर हैं। आज उन्हें राजा से माँगकर अपनी छाती ठंढी करो। पुत्र को राज्य और राम को वनवास दो और सौत का सारा आनन्द तुम ले लो।

चौपाई

भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई॥ होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें॥ ४ ॥

अर्थ:

जब राजा राम की सौगंध खा लें, तब वर माँगना, जिससे वचन न टलने पावे। आज की रात बीत गयी, तो काम बिगड़ जायगा। मेरी बात को हृदय से प्रिय [या प्राणों से भी प्यारी] समझना।

दोहा

बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु। काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु॥ २२ ॥

अर्थ:

पापिनी मंथरा ने बड़ी बुरी घात लगाकर कहा--कोपभवन में जाओ। सब काम बड़ी सावधानी से बनाना, राजा पर सहसा विश्वास न कर लेना (उनकी बातों में न आ जाना)।