चित्रकूट में निवास, कोल भीलों द्वारा सेवा
श्रीरामजी चित्रकूट में निवास स्थिर करते हैं। वहाँ के कोल और भील अत्यंत प्रेम से सेवा कर अपने जीवन को पवित्र मानते हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २२ / ४९
प्रकरण पाठ
रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥ लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा--लक्ष्मण! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहीं कहीं ठहरने की व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजी ने पयस्विनी नदी के उत्तर के ऊँचे किनारे को देखा [और कहा कि--] इसके चारों ओर धनुष के जैसा एक नाला फिरा हुआ है।
नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना॥ चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी॥ २ ॥
अर्थ:
नदी (मन्दाकिनी) उस धनुष की प्रत्यंचा (डोरी) है और शम, दम, दान बाण हैं। कलियुग के समस्त पाप उसके अनेकों हिंसक पशु [रूप निशाने] हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामने से मारता है।
अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा॥ रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना॥ ३ ॥
अर्थ:
ऐसा कहकर लक्ष्मणजी ने स्थान दिखलाया। स्थान को देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने सुख पाया। जब देवताओं ने जाना कि श्रीरामचन्द्रजी का मन यहाँ रम गया तब वे देवताओं के प्रधान स्थपति (मकान बनानेवाले) विश्वकर्मा को साथ लेकर चले।
कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए॥ बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला॥ ४ ॥
अर्थ:
सब देवता कोल-भीलों के वेष में आये और उन्होंने [दिव्य] पत्तों और घासों के सुन्दर घर बना दिये। दो ऐसी सुन्दर कुटियाँ बनायीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें एक बड़ी सुन्दर छोटी-सी थी और दूसरी बड़ी थी।
बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू॥ करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए॥ २ ॥
अर्थ:
फूलों की वर्षा करके देवसमाज ने कहा--हे नाथ! आज [आपका दर्शन पाकर] हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने अपने दुःसह दुःख सुनाये और [दुःखों के नाश का आश्वासन पाकर] हर्षित होकर अपने-अपने स्थानों को चले गये।
यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई॥ कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना॥ १ ॥
अर्थ:
यह (श्रीरामजी के आगमन का) समाचार जब कोल-भीलों ने पाया, तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो नवों निधियाँ उनके घर ही पर आ गयी हों। वे दोनों में कन्द, मूल, फल भर-भरकर चले। मानो दरिद्र सोना लूटने चले हों।
तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहिं मगु जाता॥ कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई॥ २ ॥
अर्थ:
उनमें से जो दोनों भाइयों को [पहले] देख चुके थे, उनसे दूसरे लोग रास्ते में जाते हुए पूछते हैं। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दरता कहते-सुनते सबने आकर श्रीरघुनाथजी के दर्शन किये।
करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे॥ चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े॥ ३ ॥
अर्थ:
भेंट आगे रखकर वे लोग जोहार करते हैं और अत्यन्त अनुराग के साथ प्रभु को देखते हैं। वे मुग्ध हुए जहाँ-के-तहाँ मानो चित्रलिखे-से खड़े हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और नेत्रों में प्रेमाश्रुओं के जल की बाढ़ आ रही है।
सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए॥ गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी॥ ४ ॥
अर्थ:
वे कल्पवृक्ष के समान स्वाभाविक ही सुन्दर हैं। मानो वे देवताओं के वन (नन्दनवन) को छोड़कर आये हों। भौंरों की पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर गुंजार करती हैं और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है।
नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी॥ परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी॥ १ ॥
अर्थ:
आँखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजी को देखकर जन्म का फल पाकर शोक रहित हो जाते हैं, और अचर (पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि) भगवान् की चरण-रज का स्पर्श पाकर सुखी होते हैं। यूँ सभी परमपद (मोक्ष) के अधिकारी हो गये।
सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं॥ सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी॥ ४ ॥
अर्थ:
उसे भला, मैं किस प्रकार से वर्णन करके कह सकता हूँ। कहीं पोखरे का [क्षुद्र] कछुआ भी मन्दराचल उठा सकता है? लक्ष्मणजी मन, वचन और कर्म से श्रीरामचन्द्रजी की सेवा करते हैं। उनके शील और स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता।
राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी॥ छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी के साथ सीताजी अयोध्यापुरी, कुटुम्ब के लोग और घर की याद भूलकर बहुत ही सुखी रहती हैं। क्षण-क्षण पर पति श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमाके समान मुख को देखकर वे वैसे ही परम प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोरी चन्द्रमा को देखकर!
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी॥ सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥ २ ॥
अर्थ:
स्वामी का प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हर्षित रहती हैं जैसे दिन में चकवी! सीताजी का मन श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक्त है; इससे उनको वन हजारों अवध के समान प्रिय लगता है।
परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा॥ सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर॥ ३ ॥
अर्थ:
प्रियतम (श्रीरामचन्द्रजी) के साथ पर्णकुटी प्यारी लगती है। मृग और पक्षी प्यारे कुटुम्बियों के समान लगते हैं। मुनियों की स्त्रियाँ सास के समान, श्रेष्ठ मुनि ससुर के समान और कन्द-मूल-फलों का आहार उनको अमृत के समान लगता है।
नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई॥ लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू॥ ४ ॥
अर्थ:
स्वामी के साथ सुन्दर साथरी (कुश और पत्तों की सेज) सैकड़ों कामदेव की सेजों के समान सुख देनेवाली है। जिनके [कृपापूर्वक] देखनेमात्र से जीव लोकपाल हो जाते हैं, उनको कहीं भोग-विलास मोहित कर सकते हैं!।
सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु। रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु॥ १४० ॥
अर्थ:
जिन श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करनेसे ही भक्तजन तमाम भोग-विलास को तिनके के समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजी की प्रिय पत्नी और जगत् की माता सीताजी के लिये यह [भोग-विलास का त्याग] कुछ भी आश्चर्य नहीं है।
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं॥ कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी॥ १ ॥
अर्थ:
सीताजी और लक्ष्मणजी को जिस प्रकार सुख मिले, श्रीरघुनाथजी वही करते और वही कहते हैं। भगवान् प्राचीन कथाएँ और कहानियाँ कहते हैं और लक्ष्मणजी तथा सीताजी अत्यन्त सुख मानकर सुनते हैं।
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी॥ लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
कृपा के समुद्र प्रभु श्रीरामचन्द्रजी दुःखी हो जाते हैं, किन्तु फिर कुसमय समझकर धीरज धारण कर लेते हैं। श्रीरामचन्द्रजी को दुखी देखकर सीताजी और लक्ष्मणजी भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी मनुष्य की परछाईं उस मनुष्य के समान ही चेष्टा करती है।
प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु॥ लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता॥ ४ ॥
अर्थ:
तब धीर, कृपालु और भक्तों के हृदयों को शीतल करने के लिये चन्दन-रूप रघुनंदन प्रिय पत्नी और भाई लक्ष्मण की दशा देखकर कुछ पवित्र कथाएँ कहने लगते हैं, जिन्हें सुनकर लक्ष्मणजी और सीताजी सुख प्राप्त करते हैं।
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहि कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥ सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥ १ ॥
अर्थ:
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजी की कैसी सँभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रों के गोलकों की। इधर लक्ष्मणजी श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी की [अथवा लक्ष्मणजी और सीताजी श्रीरामचन्द्रजी की] ऐसी सेवा करते हैं जैसे अज्ञानी मनुष्य शरीर की करते हैं।
एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी॥ कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा॥ २ ॥
अर्थ:
पक्षी, मृग, देवता और तपस्वियों के हितकारी प्रभु इस प्रकार सुखपूर्वक वन में निवास कर रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—मैंने श्रीरामचन्द्रजी का सुन्दर वन-गमन कहा। अब जिस तरह सुमन्त्र अयोध्या में आये वह [कथा] सुनो।
राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी॥ देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
[निषाद को अकेले आया देखकर] सुमन्त्र हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! पुकारते हुए, बहुत व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़े। [रथ के] घोड़े दक्षिण दिशा की ओर [जिधर श्रीरामचन्द्रजी गये थे] देख-देखकर हिनहिनाते हैं। मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हो रहे हों।