चित्रकूट में निवास, कोल भीलों द्वारा सेवा

श्रीरामजी चित्रकूट में निवास स्थिर करते हैं। वहाँ के कोल और भील अत्यंत प्रेम से सेवा कर अपने जीवन को पवित्र मानते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २२ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥ लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा--लक्ष्मण! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहीं कहीं ठहरने की व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजी ने पयस्विनी नदी के उत्तर के ऊँचे किनारे को देखा [और कहा कि--] इसके चारों ओर धनुष के जैसा एक नाला फिरा हुआ है।

चौपाई

नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना॥ चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी॥ २ ॥

अर्थ:

नदी (मन्दाकिनी) उस धनुष की प्रत्यंचा (डोरी) है और शम, दम, दान बाण हैं। कलियुग के समस्त पाप उसके अनेकों हिंसक पशु [रूप निशाने] हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामने से मारता है।

चौपाई

अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा॥ रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना॥ ३ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर लक्ष्मणजी ने स्थान दिखलाया। स्थान को देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने सुख पाया। जब देवताओं ने जाना कि श्रीरामचन्द्रजी का मन यहाँ रम गया तब वे देवताओं के प्रधान स्थपति (मकान बनानेवाले) विश्वकर्मा को साथ लेकर चले।

चौपाई

कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए॥ बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला॥ ४ ॥

अर्थ:

सब देवता कोल-भीलों के वेष में आये और उन्होंने [दिव्य] पत्तों और घासों के सुन्दर घर बना दिये। दो ऐसी सुन्दर कुटियाँ बनायीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें एक बड़ी सुन्दर छोटी-सी थी और दूसरी बड़ी थी।

दोहा

लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत। सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत॥ १३३ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी और जानकीजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर घास-पत्तों के घर में शोभायमान हैं। मानो कामदेव मुनि का वेष धारण करके रति और वसन्त-ऋतु के साथ सुशोभित हो।

दोहा 134 के अंतर्गत
चौपाई

अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला॥ राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू॥ १ ॥

अर्थ:

उस समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूट में आये और श्रीरामचन्द्रजी ने सब किसी को प्रणाम किया। देवता नेत्रों का लाभ पाकर आनन्दित हुए।

चौपाई

बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू॥ करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए॥ २ ॥

अर्थ:

फूलों की वर्षा करके देवसमाज ने कहा--हे नाथ! आज [आपका दर्शन पाकर] हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने अपने दुःसह दुःख सुनाये और [दुःखों के नाश का आश्वासन पाकर] हर्षित होकर अपने-अपने स्थानों को चले गये।

चौपाई

चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए॥ आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी चित्रकूट में आ बसे हैं, यह समाचार सुन-सुनकर बहुत-से मुनि आये। रघुकुल के चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी ने मुदित हुई मुनिमण्डली को आते देखकर दण्डवत् प्रणाम किया।

चौपाई

मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं॥ सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनिगण श्रीरामजी को हृदय से लगा लेते हैं और सफल होने के लिये आशीर्वाद देते हैं। वे सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजी की छबि देखते हैं और अपने सारे साधनों को सफल हुआ समझते हैं।

दोहा

जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद। करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद॥ १३४ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने यथायोग्य सम्मान करके मुनिमण्डली को विदा किया। [श्रीरामचन्द्रजी के आ जाने से] वे सब अपने-अपने आश्रमों में अब स्वतन्त्रता के साथ योग, जप, यज्ञ और तप करने लगे।

दोहा 135 के अंतर्गत
चौपाई

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई॥ कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना॥ १ ॥

अर्थ:

यह (श्रीरामजी के आगमन का) समाचार जब कोल-भीलों ने पाया, तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो नवों निधियाँ उनके घर ही पर आ गयी हों। वे दोनों में कन्द, मूल, फल भर-भरकर चले। मानो दरिद्र सोना लूटने चले हों।

चौपाई

तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहिं मगु जाता॥ कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई॥ २ ॥

अर्थ:

उनमें से जो दोनों भाइयों को [पहले] देख चुके थे, उनसे दूसरे लोग रास्ते में जाते हुए पूछते हैं। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दरता कहते-सुनते सबने आकर श्रीरघुनाथजी के दर्शन किये।

चौपाई

करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे॥ चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े॥ ३ ॥

अर्थ:

भेंट आगे रखकर वे लोग जोहार करते हैं और अत्यन्त अनुराग के साथ प्रभु को देखते हैं। वे मुग्ध हुए जहाँ-के-तहाँ मानो चित्रलिखे-से खड़े हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और नेत्रों में प्रेमाश्रुओं के जल की बाढ़ आ रही है।

चौपाई

राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने॥ प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी ने उन सबको प्रेम में मग्र जाना, और प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान किया। वे बार-बार प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को जोहार करते हुए हाथ जोड़कर विनीत वचन कहते हैं--।

दोहा

अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय। भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय॥ १३५ ॥

अर्थ:

हे नाथ! प्रभु के चरणों का दर्शन पाकर अब हम सब सनाथ हो गये। हे कोसलराज! हमारे ही भाग्य से आपका यहाँ शुभागमन हुआ है।

दोहा 136 के अंतर्गत
चौपाई

धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा॥ धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी॥ १ ॥

अर्थ:

हे नाथ! जहाँ-जहाँ आपने अपने चरण रखे हैं, वे पृथ्वी, वन, मार्ग और पहाड़ धन्य हैं, वे वन में विचरनेवाले पक्षी और पशु धन्य हैं, जो आपको देखकर सफलजन्म हो गये।

चौपाई

हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा॥ कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी॥ २ ॥

अर्थ:

हम सब भी अपने परिवारसहित धन्य हैं, जिन्होंने नेत्र भरकर आपका दर्शन किया। आपने बड़ी अच्छी जगह विचारकर निवास किया है। यहाँ सभी ऋतुओं में आप सुखी रहियेगा।

चौपाई

हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई॥ बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा॥ ३ ॥

अर्थ:

हम लोग सब प्रकार से हाथी, सिंह, सर्प और बाघों से बचाकर आपकी सेवा करेंगे। हे प्रभो! यहाँ के बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएँ और खोह (दर्रे) सब पग-पग हमारे देखे हुए हैं।

चौपाई

तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब॥ हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता॥ ४ ॥

अर्थ:

हम वहाँ-वहाँ (उन-उन स्थानों में) आपको शिकार खिलावेंगे और तालाब, झरने आदि जलाशयों को दिखावेंगे। हम कुटुम्बसमेत आपके सेवक हैं। हे नाथ! इसलिये हमें आज्ञा देने में संकोच न कीजियेगा।

दोहा

बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन॥ १३६ ॥

अर्थ:

जो वेदों के वचन और मुनियों के मन को भी अगम हैं, वे करुणा के धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलों के वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकों के वचन सुनता है।

दोहा 137 के अंतर्गत
चौपाई

रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा॥ राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी को केवल प्रेम प्यारा है; जो जाननेवाला हो, वह जान ले। तब श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम से परिपुष्ट हुए कोमल वचन कहकर उन सब बन में विचरनेवालों को संतुष्ट किया।

चौपाई

बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए॥ एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई॥ २ ॥

अर्थ:

फिर उनको विदा किया। वे सिर नवाकर चले और प्रभु के गुण कहते-सुनते घर आये। इस प्रकार देवता और मुनियों को सुख देनेवाले दोनों भाई सीताजी समेत वन में निवास करने लगे।

चौपाई

जब तें आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु॥ फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना। मंजु बलित बर बेलि बिताना॥ ३ ॥

अर्थ:

जबसे श्रीरघुनाथजी वन में आकर रहे तबसे वन मंगलदायक हो गया। अनेकों प्रकार के वृक्ष फूलते और फलते हैं और उनपर लिपटी हुई सुन्दर बेलों के मण्डप तने हैं।

चौपाई

सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए॥ गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी॥ ४ ॥

अर्थ:

वे कल्पवृक्ष के समान स्वाभाविक ही सुन्दर हैं। मानो वे देवताओं के वन (नन्दनवन) को छोड़कर आये हों। भौंरों की पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर गुंजार करती हैं और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है।

दोहा

नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर। भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर॥ १३७ ॥

अर्थ:

नीलकण्ठ, कोयल, तोते, पपीहे, चकवे और चकोर आदि पक्षी कानों को सुख देनेवाली और चित्त को चुरानेवाली तरह-तरह की बोलियाँ बोलते हैं।

दोहा 138 के अंतर्गत
चौपाई

करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा॥ फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबृंद बिसेषी॥ १ ॥

अर्थ:

हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन-ये सब वैर छोड़कर साथ-साथ विचरते हैं। शिकार के लिये फिरते हुए श्रीरामचन्द्रजी की छबि को देखकर पशुओं के समूह विशेष आनन्दित होते हैं।

चौपाई

बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि रामबनु सकल सिहाहीं॥ सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या॥ २ ॥

अर्थ:

जगत् में जहाँ तक देवताओं के वन हैं, सब रामवन को देखकर सिहाते हैं। गंगा, सरस्वती, सूर्यकुमारी यमुना, मेकलसुता नर्मदा, गोदावरी आदि धन्य (पुण्यमयी) नदियाँ।

चौपाई

सब सर सिंधु नदीं नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना॥ उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू॥ ३ ॥

अर्थ:

सारे सर, समुद्र, नदी और अनेकों नदियाँ सब मन्दाकिनी की बड़ाई करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मंदर और मेरु आदि सब देवताओं के निवास-स्थान हैं।

चौपाई

सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते॥ बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

और हिमाचल आदि जितने पर्वत हैं, सभी चित्रकूट का यश गाते हैं। विंध्याचल बड़ा आनन्दित है, उसके मन में सुख समाता नहीं; क्योंकि उसने बिना परिश्रम ही बहुत बड़ी बड़ाई पा ली है।

दोहा

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति। पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति॥ १३८ ॥

अर्थ:

चित्रकूट के पक्षी, मृग, बेल, वृक्ष, तृण-आदि सभी जातियाँ पुण्य की राशि हैं और धन्य हैं—देवता दिन-रात ऐसा कहते हैं।

दोहा 139 के अंतर्गत
चौपाई

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी॥ परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी॥ १ ॥

अर्थ:

आँखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजी को देखकर जन्म का फल पाकर शोक रहित हो जाते हैं, और अचर (पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि) भगवान् की चरण-रज का स्पर्श पाकर सुखी होते हैं। यूँ सभी परमपद (मोक्ष) के अधिकारी हो गये।

चौपाई

सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन॥ महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू॥ २ ॥

अर्थ:

वह वन और पर्वत स्वभाव से सुहावने, मंगलमय और अत्यन्त पावन हैं। उसकी महिमा किस प्रकार कही जाय, जहाँ सुख-सागर ने निवास किया है।

चौपाई

पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई॥ कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होहिं सहसानन॥ ३ ॥

अर्थ:

क्षीरसागर को त्यागकर और अयोध्या को छोड़कर जहाँ सीता, लक्ष्मण और राम आकर रहे, उस वन जैसी परम शोभा को यदि हजार मुखवाले शेषजी भी हों तो भी नहीं कह सकते।

चौपाई

सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं॥ सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी॥ ४ ॥

अर्थ:

उसे भला, मैं किस प्रकार से वर्णन करके कह सकता हूँ। कहीं पोखरे का [क्षुद्र] कछुआ भी मन्दराचल उठा सकता है? लक्ष्मणजी मन, वचन और कर्म से श्रीरामचन्द्रजी की सेवा करते हैं। उनके शील और स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता।

दोहा

छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु। करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु॥ १३९ ॥

अर्थ:

क्षण-क्षण पर श्रीसीतारामजी के चरणों को देखकर और अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर लक्ष्मणजी स्वप्न में भी भाइयों, माता-पिता और घर की याद नहीं करते।

दोहा 140 के अंतर्गत
चौपाई

राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी॥ छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के साथ सीताजी अयोध्यापुरी, कुटुम्ब के लोग और घर की याद भूलकर बहुत ही सुखी रहती हैं। क्षण-क्षण पर पति श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमाके समान मुख को देखकर वे वैसे ही परम प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोरी चन्द्रमा को देखकर!

चौपाई

नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी॥ सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥ २ ॥

अर्थ:

स्वामी का प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हर्षित रहती हैं जैसे दिन में चकवी! सीताजी का मन श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक्त है; इससे उनको वन हजारों अवध के समान प्रिय लगता है।

चौपाई

परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा॥ सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रियतम (श्रीरामचन्द्रजी) के साथ पर्णकुटी प्यारी लगती है। मृग और पक्षी प्यारे कुटुम्बियों के समान लगते हैं। मुनियों की स्त्रियाँ सास के समान, श्रेष्ठ मुनि ससुर के समान और कन्द-मूल-फलों का आहार उनको अमृत के समान लगता है।

चौपाई

नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई॥ लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू॥ ४ ॥

अर्थ:

स्वामी के साथ सुन्दर साथरी (कुश और पत्तों की सेज) सैकड़ों कामदेव की सेजों के समान सुख देनेवाली है। जिनके [कृपापूर्वक] देखनेमात्र से जीव लोकपाल हो जाते हैं, उनको कहीं भोग-विलास मोहित कर सकते हैं!।

दोहा

सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु। रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु॥ १४० ॥

अर्थ:

जिन श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करनेसे ही भक्तजन तमाम भोग-विलास को तिनके के समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजी की प्रिय पत्नी और जगत् की माता सीताजी के लिये यह [भोग-विलास का त्याग] कुछ भी आश्चर्य नहीं है।

दोहा 141 के अंतर्गत
चौपाई

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं॥ कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी॥ १ ॥

अर्थ:

सीताजी और लक्ष्मणजी को जिस प्रकार सुख मिले, श्रीरघुनाथजी वही करते और वही कहते हैं। भगवान् प्राचीन कथाएँ और कहानियाँ कहते हैं और लक्ष्मणजी तथा सीताजी अत्यन्त सुख मानकर सुनते हैं।

चौपाई

जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं॥ सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई॥ २ ॥

अर्थ:

जब-जब श्रीरामचन्द्रजी अयोध्या की याद करते हैं, तब-तब उनके नेत्रों में जल भर आता है। माता-पिता, कुटुम्बियों और भाइयों तथा भरत के प्रेम, शील और सेवाभाव को याद करके—

चौपाई

कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी॥ लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

कृपा के समुद्र प्रभु श्रीरामचन्द्रजी दुःखी हो जाते हैं, किन्तु फिर कुसमय समझकर धीरज धारण कर लेते हैं। श्रीरामचन्द्रजी को दुखी देखकर सीताजी और लक्ष्मणजी भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी मनुष्य की परछाईं उस मनुष्य के समान ही चेष्टा करती है।

चौपाई

प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु॥ लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता॥ ४ ॥

अर्थ:

तब धीर, कृपालु और भक्तों के हृदयों को शीतल करने के लिये चन्दन-रूप रघुनंदन प्रिय पत्नी और भाई लक्ष्मण की दशा देखकर कुछ पवित्र कथाएँ कहने लगते हैं, जिन्हें सुनकर लक्ष्मणजी और सीताजी सुख प्राप्त करते हैं।

दोहा

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत॥ १४१ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी और सीताजी सहित श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हैं जैसे अमरावती में इन्द्र अपनी पत्नी शची और पुत्र जयन्त सहित बसता है।

दोहा 142 के अंतर्गत
चौपाई

जोगवहिं प्रभु सिय लखनहि कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥ सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजी की कैसी सँभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रों के गोलकों की। इधर लक्ष्मणजी श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी की [अथवा लक्ष्मणजी और सीताजी श्रीरामचन्द्रजी की] ऐसी सेवा करते हैं जैसे अज्ञानी मनुष्य शरीर की करते हैं।

चौपाई

एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी॥ कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा॥ २ ॥

अर्थ:

पक्षी, मृग, देवता और तपस्वियों के हितकारी प्रभु इस प्रकार सुखपूर्वक वन में निवास कर रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—मैंने श्रीरामचन्द्रजी का सुन्दर वन-गमन कहा। अब जिस तरह सुमन्त्र अयोध्या में आये वह [कथा] सुनो।

चौपाई

फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई॥ मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को पहुँचाकर जब निषादराज लौटा, तब आकर उसने मंत्री (सुमन्त्र) सहित रथ को देखा। मन्त्री को व्याकुल देखकर निषाद को जैसा दुःख हुआ, वह कहा नहीं जाता।

चौपाई

राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी॥ देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

[निषाद को अकेले आया देखकर] सुमन्त्र हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! पुकारते हुए, बहुत व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़े। [रथ के] घोड़े दक्षिण दिशा की ओर [जिधर श्रीरामचन्द्रजी गये थे] देख-देखकर हिनहिनाते हैं। मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हो रहे हों।

दोहा

नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि। ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि॥ १४२ ॥

अर्थ:

वे न तो घास चरते हैं, न पानी पीते हैं। केवल आँखों से जल बहा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी के घोड़ों को इस दशा में देखकर सब निषाद व्याकुल हो गये।