भरत-निषाद मिलन और संवाद तथा भरतजी और नगरवासियों का प्रेम
जब निषादराज भरतजी के निर्मल हृदय और श्रीरामजी के प्रति उनके प्रेम को पहचानते हैं, तब दोनों का अत्यंत भावपूर्ण मिलन होता है। भरतजी का प्रेम देखकर साथ चले नगरवासी भी करुणा और भक्ति में डूब जाते हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३१ / ४९
प्रकरण पाठ
देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू॥ जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा॥ ३ ॥
अर्थ:
निषादराज ने मुनिराज वसिष्ठजी को देखकर अपना नाम बतलाकर दूर ही से दण्डवत्-प्रणाम किया। मुनीश्वर वसिष्ठजी ने उसको राम का प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरतजी को समझाकर कहा [कि यह श्रीरामजी का मित्र है]।
भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती॥ धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला॥ १ ॥
अर्थ:
भरतजी गुह को अत्यन्त प्रेम से गले लगा रहे हैं। प्रेम की रीति को सब लोग सिहा रहे हैं (ईर्ष्यापूर्वक प्रशंसा कर रहे हैं), मंगल की मूल 'धन्य-धन्य' की ध्वनि करके देवता उसकी सराहना करते हुए फूल बरसा रहे हैं।
लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा॥ तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता॥ २ ॥
अर्थ:
जो लोक और वेद दोनों में सब प्रकार से नीचा माना जाता है, जिसकी छाया के छू जाने से भी स्नान करना होता है, उसी निषाद से आँकवार भरकर (हृदय से चिपटाकर) श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई भरतजी [आनन्द और प्रेमवश] शरीर में पुलकावली से परिपूर्ण हो मिल रहे हैं।
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥ यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा॥ ३ ॥
अर्थ:
जो लोग राम-राम कहकर जँभाई लेते हैं (अर्थात् आलस्य से भी जिनके मुँह से रामनाम का उच्चारण हो जाता है), पापों के समूह (कोई भी पाप) उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुह को तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजी ने हृदय से लगा लिया और कुल समेत इसे जगत्पावन (जगत् को पवित्र करनेवाला) बना दिया।
नहि अचिरिजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई॥ राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं॥ १ ॥
अर्थ:
इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, युग-युगान्तर से यही रीति चली आ रही है। श्रीरघुनाथजी ने किसको बड़ाई नहीं दी? इस प्रकार देवता रामनाम की महिमा कह रहे हैं और उसे सुन-सुनकर अवध के लोग सुख पा रहे हैं।
समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ। जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ॥ १९५ ॥
अर्थ:
मेरी करतूत और कुल को समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की महिमा को मन में देख (विचार) कर (अर्थात् कहाँ तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करने वाला जीव, और कहाँ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी! पर उन्होंने मुझ-जैसे नीच को भी अपनी अहैतुकी कृपा वश अपना लिया--यह समझकर) जो रघुवीर श्रीरामजी के चरणों का भजन नहीं करता, वह जगत में विधाता के द्वारा वंचित है।
देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई॥ कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं॥ २ ॥
अर्थ:
निषादराज की प्रीति को देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजी के छोटे भाई शत्रुघ्नजी उससे मिले। फिर निषाद ने अपना नाम ले-लेकर सुन्दर (नम्र और मधुर) वाणी से सब रानियों को आदरपूर्वक जोहार की।
कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू॥ सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई॥ ४ ॥
अर्थ:
सब कहते हैं कि जीवन का लाभ तो इसी ने पाया है, जिसे कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजी ने भुजाओं में बाँधकर गले लगाया है। निषाद अपने भाग्य की बड़ाई सुनकर मन में परम आनन्दित हो सबको अपने साथ लिवा ले चला।
एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा॥ रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू॥ २ ॥
अर्थ:
इस प्रकार भरतजी ने सब सेना को साथ में लिये हुए जगत को पवित्र करने वाली गंगा जी के दर्शन किये। रामघाट को [जहाँ श्रीरामजी ने स्नान-सन्ध्या की थी] प्रणाम किया। उनका मन इतना आनन्दमग्न हो गया, मानो उन्हें स्वयं श्रीरामजी मिल गये हों।
करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी॥ करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी॥ ३ ॥
अर्थ:
नगर के नर-नारी प्रणाम कर रहे हैं और गंगा जी के ब्रह्मरूप जल को देख-देखकर आनन्दित हो रहे हैं। गंगा जी में स्नान कर हाथ जोड़कर सब यही वर माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में हमारा प्रेम कम न हो (अर्थात् बहुत अधिक हो)।
जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा॥ सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई॥ १ ॥
अर्थ:
लोगों ने जहाँ-तहाँ डेरा डाला। भरतजी ने सभी का पता लगाया [कि सब लोग आकर आराम से टिक गये हैं या नहीं]। फिर देवपूजन करके आज्ञा पाकर दोनों भाई श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी के पास गये।
चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीरु सनेह न थोरें॥ पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
सखा निषादराज के हाथ से हाथ मिलाये हुए भरतजी चले। प्रेम कुछ थोड़ा नहीं है (अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है), जिससे उनका शरीर शिथिल हो रहा है। भरतजी सखा से पूछते हैं कि मुझे वह स्थान दिखलाओ--और नेत्र और मन की जलन कुछ ठंडी करो--।
जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए॥ भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू॥ ४ ॥
अर्थ:
जहाँ सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मण रात को सोये थे। ऐसा कहते ही उनके नेत्रों के कोरों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया। भरतजी के वचन सुनकर निषाद को बड़ा विषाद हुआ। वह तुरंत ही उन्हें वहाँ ले गया--।
कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे॥ सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी॥ २ ॥
अर्थ:
भरतजी ने दो-चार स्वर्ण-बिंदु (सोने के कण या तारे आदि जो सीताजी के गहने-कपड़ों से गिर पड़े थे) देखे तो उनको सीताजी के समान समझकर सिर पर रख लिया। उनके नेत्र [प्रेमाश्रुओं से] जल से भरे हैं और हृदय में ग्लानि भरी है। वे सखा से सुन्दर वाणी में ये वचन बोले--।
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना॥ पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही॥ ३ ॥
अर्थ:
ये स्वर्ण के कण या तारे भी सीताजी के विरह से ऐसे श्रीहत (शोभाहीन) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं, जैसे [रामवियोग में] अयोध्या के नर-नारी विलीन (शोक के कारण क्षीण) हो रहे हैं। जिन सीताजी के पिता राजा जनक हैं, इस जगत् में भोग और योग दोनों ही जिनकी मुट्ठी में हैं, उन जनकजी को मैं किसकी उपमा दूँ?
ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू॥ प्राननाथु रघुनाथ गोसाईं। जो बड़ होत सो राम बड़ाईं॥ ४ ॥
अर्थ:
सूर्यकुल के सूर्य राजा दशरथजी जिनके ससुर हैं, जिनको अमरावती के स्वामी इन्द्र भी सिहाते थे (ईर्ष्यापूर्वक उनके-जैसा ऐश्वर्य और प्रताप पाना चाहते थे); और प्रभु श्रीरघुनाथजी जिनके प्राणनाथ हैं, जो इतने बड़े हैं कि जो कोई भी बड़ा होता है, वह श्रीरामचन्द्रजी की [दी हुई] बड़ाई से ही होता है।
लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने॥ पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबीरहि प्रानपिआरे॥ १ ॥
अर्थ:
मेरे छोटे भाई लक्ष्मण बहुत ही सुन्दर और प्यार करने योग्य हैं। ऐसे भाई न तो किसी के हुए, न हैं, न होने के ही हैं। जो लक्ष्मण अवध के लोगों को प्यारे, माता-पिता के दुलारे और श्रीसीतारामजी के प्राणप्यारे हैं।
मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ॥ ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती॥ २ ॥
अर्थ:
जिनकी कोमल मूर्ति और सुकुमार स्वभाव है, जिनके शरीर में कभी हवा भी नहीं लगी, वे वन में सब प्रकार की विपत्तियाँ सह रहे हैं। [हाय!] इस मेरी छाती ने [कठोरता में] करोड़ों वज्रों का भी निरादर कर दिया [नहीं तो यह कभी की फट गयी होती]।
राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर॥ पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता॥ ३ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी ने जन्म (अवतार) लेकर जगत् को प्रकाशित कर दिया। वे रूप, शील, सुख और समस्त गुणों के समुद्र हैं। पुरवासी, कुटुम्बी, गुरु, पिता-माता सभी को श्रीरामजी का स्वभाव सुख देने वाला है।
बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं॥ सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा॥ ४ ॥
अर्थ:
शत्रु भी श्रीरामजी की बड़ाई करते हैं। बोल-चाल, मिलने के ढंग और विनय से वे मन को हर लेते हैं। करोड़ों सरस्वती और करोड़ों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के गुणसमूहों की गिनती नहीं कर सकते।
राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ॥ पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी ने कानों से भी कभी दुःख का नाम नहीं सुना। महाराज स्वयं जीवन-वृक्ष की तरह उनकी सार-सँभाल किया करते थे। सब माताएँ भी रात-दिन उनकी ऐसी सार-सँभाल करती थीं, जैसे पलक नेत्रों की और साँप अपनी मणि की करते हैं।
सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू॥ राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि॥ ४ ॥
अर्थ:
यह सुनकर निषादराज प्रेमपूर्वक समझाने लगा—हे नाथ! आप व्यर्थ विषाद क्यों करते हैं? श्रीरामचन्द्रजी आपको प्यारे हैं और आप श्रीरामचन्द्रजी को प्यारे हैं। यही निचोड़ (निश्चित सिद्धान्त) है, दोष तो प्रतिकूल विधाता को है।
बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी। तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी॥ तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौंहें किएँ। परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ॥
अर्थ:
प्रतिकूल विधाता की करनी बड़ी कठोर है, जिसने माता कैकेयी को बावरी बना दिया। उस रात फिर-फिर प्रभु आदरपूर्वक आपकी सराहना करते थे। तुलसीदास कहते हैं—[निषादराज कहते हैं—] श्रीरामचन्द्रजी के समान प्रिय और कोई नहीं है, मैं सौगंध खाकर कहता हूँ। परिणाम मंगल होगा, यह जानकर अपने हृदय में धैर्य धारण कीजिए।
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा॥ यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी॥ १ ॥
अर्थ:
सखा के वचन सुनकर, हृदय में धीरज धरकर श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करते हुए भरतजी डेरे को चले। नगर के सारे स्त्री-पुरुष यह (श्रीरामजी के ठहरने के स्थान का) समाचार पाकर बड़े आतुर होकर उस स्थान को देखने चले।