भरत-निषाद मिलन और संवाद तथा भरतजी और नगरवासियों का प्रेम

जब निषादराज भरतजी के निर्मल हृदय और श्रीरामजी के प्रति उनके प्रेम को पहचानते हैं, तब दोनों का अत्यंत भावपूर्ण मिलन होता है। भरतजी का प्रेम देखकर साथ चले नगरवासी भी करुणा और भक्ति में डूब जाते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३१ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

लखब सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ॥ अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे॥ १ ॥

अर्थ:

उनके सुन्दर स्वभाव से मैं उनके स्नेह को पहचान लूँगा। बैर और प्रेम छिपाने से नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंट का सामान सजाने लगा। उसने कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाये।

चौपाई

मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने॥ मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए॥ २ ॥

अर्थ:

कहार लोग पुरानी और मोटी पाठीन नामक मछलियों के भार भर-भरकर लाये। भेंट का सामान सजाकर मिलने के लिये चले तो मंगलदायक शुभ शकुन मिले।

चौपाई

देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू॥ जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा॥ ३ ॥

अर्थ:

निषादराज ने मुनिराज वसिष्ठजी को देखकर अपना नाम बतलाकर दूर ही से दण्डवत्-प्रणाम किया। मुनीश्वर वसिष्ठजी ने उसको राम का प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरतजी को समझाकर कहा [कि यह श्रीरामजी का मित्र है]।

चौपाई

राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा॥ गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई॥ ४ ॥

अर्थ:

यह श्रीराम का मित्र है, इतना सुनते ही भरतजी ने रथ त्याग दिया। वे रथ से उतरकर प्रेम में उमंगते हुए चले। निषादराज गुह ने अपना गाँव, जाति और नाम सुनाकर पृथ्वी पर माथा टेककर जोहार की।

दोहा

करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ॥ १९३ ॥

अर्थ:

दण्डवत् करते देखकर भरतजी ने उठाकर उसको छाती से लगा लिया। हृदय में प्रेम समाता नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मणजी से भेंट हो गयी हो।

दोहा 194 के अंतर्गत
चौपाई

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती॥ धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी गुह को अत्यन्त प्रेम से गले लगा रहे हैं। प्रेम की रीति को सब लोग सिहा रहे हैं (ईर्ष्यापूर्वक प्रशंसा कर रहे हैं), मंगल की मूल 'धन्य-धन्य' की ध्वनि करके देवता उसकी सराहना करते हुए फूल बरसा रहे हैं।

चौपाई

लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा॥ तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता॥ २ ॥

अर्थ:

जो लोक और वेद दोनों में सब प्रकार से नीचा माना जाता है, जिसकी छाया के छू जाने से भी स्नान करना होता है, उसी निषाद से आँकवार भरकर (हृदय से चिपटाकर) श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई भरतजी [आनन्द और प्रेमवश] शरीर में पुलकावली से परिपूर्ण हो मिल रहे हैं।

चौपाई

राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥ यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा॥ ३ ॥

अर्थ:

जो लोग राम-राम कहकर जँभाई लेते हैं (अर्थात्‌ आलस्य से भी जिनके मुँह से रामनाम का उच्चारण हो जाता है), पापों के समूह (कोई भी पाप) उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुह को तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजी ने हृदय से लगा लिया और कुल समेत इसे जगत्पावन (जगत्‌ को पवित्र करनेवाला) बना दिया।

चौपाई

करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई॥ उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥ ४ ॥

अर्थ:

कर्मनाशा नदी का जल गंगाजी में पड़ जाता है (मिल जाता है), तब कहिये, उसे कौन सिर पर धारण नहीं करता? जगत्‌ जानता है कि उलटा नाम जपते-जपते वाल्मीकि जी ब्रह्म के समान हो गये।

दोहा

स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात। रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात॥ १९४ ॥

अर्थ:

मूर्ख और पामर चाण्डाल, शबर, खस, यवन, जड़, पावँर, कोल और किरात भी राम नाम कहते ही परम पवित्र और त्रिभुवन में विख्यात हो जाते हैं।

दोहा 195 के अंतर्गत
चौपाई

नहि अचिरिजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई॥ राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं॥ १ ॥

अर्थ:

इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, युग-युगान्तर से यही रीति चली आ रही है। श्रीरघुनाथजी ने किसको बड़ाई नहीं दी? इस प्रकार देवता रामनाम की महिमा कह रहे हैं और उसे सुन-सुनकर अवध के लोग सुख पा रहे हैं।

चौपाई

रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा॥ देखि भरत कर सीलु सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू॥ २ ॥

अर्थ:

रामसखा निषादराज से प्रेम के साथ मिलकर भरतजी ने कुशल, मंगल और क्षेम पूछी। भरतजी का शील और प्रेम देखकर निषाद उस समय विदेह हो गया (प्रेममुग्ध होकर देह की सुध भूल गया)।

चौपाई

सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा॥ धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी॥ ३ ॥

अर्थ:

उसके मन में संकोच, प्रेम और आनन्द इतना बढ़ गया कि वह खड़ा-खड़ा टकटकी लगाये भरतजी को देखता रहा। फिर धीरज धरकर भरतजी के चरणों की वन्दना करके प्रेम के साथ हाथ जोड़कर विनती करने लगा--।

चौपाई

कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी॥ अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें॥ ४ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! कुशल के मूल आपके चरणकमलों के दर्शन कर मैंने तीनों कालों में अपना कुशल जान लिया। अब आपके परम अनुग्रह से करोड़ों कुलों (पीढ़ियों) सहित मेरा मंगल (कल्याण) हो गया।

दोहा

समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ। जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ॥ १९५ ॥

अर्थ:

मेरी करतूत और कुल को समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की महिमा को मन में देख (विचार) कर (अर्थात् कहाँ तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करने वाला जीव, और कहाँ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी! पर उन्होंने मुझ-जैसे नीच को भी अपनी अहैतुकी कृपा वश अपना लिया--यह समझकर) जो रघुवीर श्रीरामजी के चरणों का भजन नहीं करता, वह जगत में विधाता के द्वारा वंचित है।

दोहा 196 के अंतर्गत
चौपाई

कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती॥ राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें॥ १ ॥

अर्थ:

मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूँ और लोक-वेद दोनों से सब प्रकार से बाहर हूँ। पर जब से श्रीरामचन्द्रजी ने मुझे अपनाया है, तभी से मैं भुवन भूषण हो गया।

चौपाई

देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई॥ कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं॥ २ ॥

अर्थ:

निषादराज की प्रीति को देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजी के छोटे भाई शत्रुघ्नजी उससे मिले। फिर निषाद ने अपना नाम ले-लेकर सुन्दर (नम्र और मधुर) वाणी से सब रानियों को आदरपूर्वक जोहार की।

चौपाई

जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा॥ निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी॥ ३ ॥

अर्थ:

रानियाँ उसे लक्ष्मणजी के समान समझकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम सौ लाख वर्षों तक सुखपूर्वक जिओ। नगर के स्त्री-पुरुष निषाद को देखकर ऐसे सुखी हुए, मानो लक्ष्मणजी को देख रहे हों।

चौपाई

कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू॥ सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई॥ ४ ॥

अर्थ:

सब कहते हैं कि जीवन का लाभ तो इसी ने पाया है, जिसे कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजी ने भुजाओं में बाँधकर गले लगाया है। निषाद अपने भाग्य की बड़ाई सुनकर मन में परम आनन्दित हो सबको अपने साथ लिवा ले चला।

दोहा

सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ। घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ॥ १९६ ॥

अर्थ:

उसने अपने सब सेवकों को इशारे से कह दिया। वे स्वामी का रुख पाकर चले और उन्होंने घरों में, वृक्षों के नीचे, तालाबों पर तथा बागों और जंगलों में ठहरने के लिये स्थान बना दिये।

दोहा 197 के अंतर्गत
चौपाई

सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब॥ सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी ने जब श्रृंगवेरपुर को देखा, तब उनके सब अंग प्रेम के कारण शिथिल हो गये। वे निषाद को लगाये हुए ऐसे शोभा दे रहे हैं, मानो विनय और प्रेम शरीर धारण किये हुए हों।

चौपाई

एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा॥ रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू॥ २ ॥

अर्थ:

इस प्रकार भरतजी ने सब सेना को साथ में लिये हुए जगत को पवित्र करने वाली गंगा जी के दर्शन किये। रामघाट को [जहाँ श्रीरामजी ने स्नान-सन्ध्या की थी] प्रणाम किया। उनका मन इतना आनन्दमग्न हो गया, मानो उन्हें स्वयं श्रीरामजी मिल गये हों।

चौपाई

करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी॥ करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी॥ ३ ॥

अर्थ:

नगर के नर-नारी प्रणाम कर रहे हैं और गंगा जी के ब्रह्मरूप जल को देख-देखकर आनन्दित हो रहे हैं। गंगा जी में स्नान कर हाथ जोड़कर सब यही वर माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में हमारा प्रेम कम न हो (अर्थात् बहुत अधिक हो)।

चौपाई

भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू॥ जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी ने कहा-हे सुरसरि! आपकी रज सबको सुख देने वाली तथा सेवक के लिये तो कामधेनु ही है। मैं हाथ जोड़कर यही वरदान माँगता हूँ कि श्रीसीतारामजी के चरणों में मेरा स्वाभाविक प्रेम हो।

दोहा

एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ। मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ॥ १९७ ॥

अर्थ:

इस प्रकार भरतजी स्नान कर और गुरुजी की आज्ञा पाकर तथा यह जानकर कि सब माताएँ स्नान कर चुकी हैं, डेरा उठा ले चले।

दोहा 198 के अंतर्गत
चौपाई

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा॥ सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई॥ १ ॥

अर्थ:

लोगों ने जहाँ-तहाँ डेरा डाला। भरतजी ने सभी का पता लगाया [कि सब लोग आकर आराम से टिक गये हैं या नहीं]। फिर देवपूजन करके आज्ञा पाकर दोनों भाई श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी के पास गये।

चौपाई

चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी॥ भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई॥ २ ॥

अर्थ:

चरण दबाकर और कोमल वचन कह-कहकर भरतजी ने सब माताओं का सत्कार किया। फिर भाई शत्रुघ्न को माताओं की सेवा सौंपकर आपने निषाद को बुला लिया।

चौपाई

चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीरु सनेह न थोरें॥ पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

सखा निषादराज के हाथ से हाथ मिलाये हुए भरतजी चले। प्रेम कुछ थोड़ा नहीं है (अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है), जिससे उनका शरीर शिथिल हो रहा है। भरतजी सखा से पूछते हैं कि मुझे वह स्थान दिखलाओ--और नेत्र और मन की जलन कुछ ठंडी करो--।

चौपाई

जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए॥ भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू॥ ४ ॥

अर्थ:

जहाँ सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मण रात को सोये थे। ऐसा कहते ही उनके नेत्रों के कोरों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया। भरतजी के वचन सुनकर निषाद को बड़ा विषाद हुआ। वह तुरंत ही उन्हें वहाँ ले गया--।

दोहा

जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु। अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु॥ १९८ ॥

अर्थ:

जहाँ पवित्र शिंशपा तरु के नीचे श्रीरामजी ने विश्राम किया था। भरतजी ने वहाँ अत्यन्त प्रेम से आदरपूर्वक दण्डवत्-प्रणाम किया।

दोहा 199 के अंतर्गत
चौपाई

कुस साँथरी निहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई॥ चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई॥ १ ॥

अर्थ:

कुशों की सुन्दर साथरी देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजी के चरण-चिह्नों की रज आँखों में लगायी। [उस समय के] प्रेम की अधिकता कहते नहीं बनती।

चौपाई

कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे॥ सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी॥ २ ॥

अर्थ:

भरतजी ने दो-चार स्वर्ण-बिंदु (सोने के कण या तारे आदि जो सीताजी के गहने-कपड़ों से गिर पड़े थे) देखे तो उनको सीताजी के समान समझकर सिर पर रख लिया। उनके नेत्र [प्रेमाश्रुओं से] जल से भरे हैं और हृदय में ग्लानि भरी है। वे सखा से सुन्दर वाणी में ये वचन बोले--।

चौपाई

श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना॥ पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही॥ ३ ॥

अर्थ:

ये स्वर्ण के कण या तारे भी सीताजी के विरह से ऐसे श्रीहत (शोभाहीन) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं, जैसे [रामवियोग में] अयोध्या के नर-नारी विलीन (शोक के कारण क्षीण) हो रहे हैं। जिन सीताजी के पिता राजा जनक हैं, इस जगत् में भोग और योग दोनों ही जिनकी मुट्ठी में हैं, उन जनकजी को मैं किसकी उपमा दूँ?

चौपाई

ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू॥ प्राननाथु रघुनाथ गोसाईं। जो बड़ होत सो राम बड़ाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

सूर्यकुल के सूर्य राजा दशरथजी जिनके ससुर हैं, जिनको अमरावती के स्वामी इन्द्र भी सिहाते थे (ईर्ष्यापूर्वक उनके-जैसा ऐश्वर्य और प्रताप पाना चाहते थे); और प्रभु श्रीरघुनाथजी जिनके प्राणनाथ हैं, जो इतने बड़े हैं कि जो कोई भी बड़ा होता है, वह श्रीरामचन्द्रजी की [दी हुई] बड़ाई से ही होता है।

दोहा

पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि। बिहरत हृदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि॥ १९९ ॥

अर्थ:

उन श्रेष्ठ पतिव्रता स्त्रियों में शिरोमणि सीताजी की साथरी (कुशशय्या) देखकर मेरा हृदय हहराकर (दहलकर) फट नहीं जाता; हे शम्भो! यह वज्र से भी अधिक कठोर है!

दोहा 200 के अंतर्गत
चौपाई

लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने॥ पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबीरहि प्रानपिआरे॥ १ ॥

अर्थ:

मेरे छोटे भाई लक्ष्मण बहुत ही सुन्दर और प्यार करने योग्य हैं। ऐसे भाई न तो किसी के हुए, न हैं, न होने के ही हैं। जो लक्ष्मण अवध के लोगों को प्यारे, माता-पिता के दुलारे और श्रीसीतारामजी के प्राणप्यारे हैं।

चौपाई

मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ॥ ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती॥ २ ॥

अर्थ:

जिनकी कोमल मूर्ति और सुकुमार स्वभाव है, जिनके शरीर में कभी हवा भी नहीं लगी, वे वन में सब प्रकार की विपत्तियाँ सह रहे हैं। [हाय!] इस मेरी छाती ने [कठोरता में] करोड़ों वज्रों का भी निरादर कर दिया [नहीं तो यह कभी की फट गयी होती]।

चौपाई

राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर॥ पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने जन्म (अवतार) लेकर जगत् को प्रकाशित कर दिया। वे रूप, शील, सुख और समस्त गुणों के समुद्र हैं। पुरवासी, कुटुम्बी, गुरु, पिता-माता सभी को श्रीरामजी का स्वभाव सुख देने वाला है।

चौपाई

बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं॥ सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा॥ ४ ॥

अर्थ:

शत्रु भी श्रीरामजी की बड़ाई करते हैं। बोल-चाल, मिलने के ढंग और विनय से वे मन को हर लेते हैं। करोड़ों सरस्वती और करोड़ों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के गुणसमूहों की गिनती नहीं कर सकते।

दोहा

सुखस्वरूप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान। तेसोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान॥ २०० ॥

अर्थ:

जो सुखस्वरूप रघुवंशमणि, मंगल और मोद के निधान श्रीरामचन्द्रजी कुशा बिछाकर पृथ्वी पर सोते हैं। विधाता की गति बड़ी ही बलवान् है।

दोहा 201 के अंतर्गत
चौपाई

राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ॥ पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने कानों से भी कभी दुःख का नाम नहीं सुना। महाराज स्वयं जीवन-वृक्ष की तरह उनकी सार-सँभाल किया करते थे। सब माताएँ भी रात-दिन उनकी ऐसी सार-सँभाल करती थीं, जैसे पलक नेत्रों की और साँप अपनी मणि की करते हैं।

चौपाई

ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी॥ धिग कैकई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला॥ २ ॥

अर्थ:

वही श्रीरामचन्द्रजी अब जंगलों में पैदल फिरते हैं और कन्द-मूल तथा फल-फूलों का भोजन करते हैं। अमंगल की मूल कैकेयी को धिक्कार है, जो अपने प्राणप्रियतम के प्रतिकूल हो गयी।

चौपाई

मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी॥ कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ॥ ३ ॥

अर्थ:

मैं पापों के समुद्र और अभागी को धिक्कार है, धिक्कार है, जिसके कारण ये सब उत्पात हुए। विधाता ने मुझे कुल का कलंक बनाकर पैदा किया और कुमाता ने मुझे स्वामिद्रोही बना दिया।

चौपाई

सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू॥ राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि॥ ४ ॥

अर्थ:

यह सुनकर निषादराज प्रेमपूर्वक समझाने लगा—हे नाथ! आप व्यर्थ विषाद क्यों करते हैं? श्रीरामचन्द्रजी आपको प्यारे हैं और आप श्रीरामचन्द्रजी को प्यारे हैं। यही निचोड़ (निश्चित सिद्धान्त) है, दोष तो प्रतिकूल विधाता को है।

छन्द

बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी। तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी॥ तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौंहें किएँ। परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ॥

अर्थ:

प्रतिकूल विधाता की करनी बड़ी कठोर है, जिसने माता कैकेयी को बावरी बना दिया। उस रात फिर-फिर प्रभु आदरपूर्वक आपकी सराहना करते थे। तुलसीदास कहते हैं—[निषादराज कहते हैं—] श्रीरामचन्द्रजी के समान प्रिय और कोई नहीं है, मैं सौगंध खाकर कहता हूँ। परिणाम मंगल होगा, यह जानकर अपने हृदय में धैर्य धारण कीजिए।

सोरठा

अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन। चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन॥ २०१ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्यामी तथा संकोच, प्रेम और कृपा के धाम हैं, यह विचारकर और मन में दृढ़ता लाकर चलिए और विश्राम कीजिये।

दोहा 202 के अंतर्गत
चौपाई

सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा॥ यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी॥ १ ॥

अर्थ:

सखा के वचन सुनकर, हृदय में धीरज धरकर श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करते हुए भरतजी डेरे को चले। नगर के सारे स्त्री-पुरुष यह (श्रीरामजी के ठहरने के स्थान का) समाचार पाकर बड़े आतुर होकर उस स्थान को देखने चले।

चौपाई

परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा॥ भरि भरि बारि बिलोचन लेहीं। बाम बिधातहि दूषन देहीं॥ २ ॥

अर्थ:

वे उस स्थान की परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं और कैकेयी को बहुत दोष देते हैं। नेत्रों में जल भर-भर लेते हैं और प्रतिकूल विधाता को दूषण देते हैं।

चौपाई

एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू॥ निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि॥ ३ ॥

अर्थ:

कोई भरतजी के स्नेह की सराहना करते हैं और कोई कहते हैं कि राजा ने अपना प्रेम खूब निभाया। सब अपनी निन्दा करके निषाद की प्रशंसा करते हैं। उस समय के विमोह और विषाद को कौन कह सकता है?

चौपाई

एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा॥ गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

इस प्रकार रात भर सब लोग जागते रहे। सबेरा होते ही खेवा लगा। सुन्दर नाव पर गुरुजी को चढ़ाकर फिर नयी नाव पर सब माताओं को चढ़ाया।

चौपाई

दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा॥ ५ ॥

अर्थ:

चार घड़ी में सब पार हो गया। उतरकर भरतजी ने तब सबको सँभाला।

दोहा

प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ। आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ॥ २०२ ॥

अर्थ:

प्रातःकाल की क्रियाएँ करके माता के चरणों की वन्दना कर और गुरुजी को सिर नवाकर भरतजी ने निषादगणों को आगे कर दिया और सेना चला दी।