वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली का सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप

वनवासी भरतजी और उनके साथियों का प्रेमपूर्वक आदर करते हैं। दूसरी ओर कैकेयी अपने कर्मों को स्मरण कर गहन पश्चाताप से भर उठती हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३९ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥ भरि भरि परन पुटीं रचि रूरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी॥ १ ॥

अर्थ:

कोल, किरात और भील आदि वन के रहनेवाले लोग पवित्र, सुन्दर एवं अमृत के समान स्वादिष्ट मधु (शहद) को सुन्दर दोने बनाकर और उनमें भर-भरकर तथा कंद, मूल, फल और अंकुर आदि की जूड़ियों को।

चौपाई

सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा॥ देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं॥ २ ॥

अर्थ:

सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजों के अलग-अलग स्वाद, भेद (प्रकार), गुण और नाम बता-बताकर देते हैं। लोग उनका बहुत दाम देते हैं, पर वे नहीं लेते और लौटा देने में श्रीरामजी की दुहाई देते हैं।

चौपाई

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी॥ तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रेम में मग्न होकर वे कोमल वाणी से कहते हैं कि साधु लोग प्रेम को पहचानकर उसका सम्मान करते हैं (अर्थात् आप साधु हैं, आप हमारे प्रेम को देखिये, दाम देकर या वस्तुएँ लौटाकर हमारे प्रेम का तिरस्कार न कीजिये)। आप तो पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं। श्रीरामजी की कृपा से ही हमने आप लोगों के दर्शन पाये हैं।

चौपाई

हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा॥ राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा॥ ४ ॥

अर्थ:

हम लोगों को आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमि के लिये गंगाजी की धारा दुर्लभ है! [देखिये, ] कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने निषाद पर कैसी कृपा की है। जैसे राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजा को भी होना चाहिये।

दोहा

यह जियँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु। हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु॥ २५० ॥

अर्थ:

हृदय में ऐसा जानकर संकोच छोड़कर और हमारा प्रेम देखकर कृपा कीजिये और हमको कृतार्थ करने के लिये ही फल, तृण और अंकुर लीजिये।

दोहा 251 के अंतर्गत
चौपाई

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे॥ देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईंधनु पात किरात मिताई॥ १ ॥

अर्थ:

आप प्रिय पाहुने वन में पधारे हैं। आपकी सेवा करने के योग्य हमारे भाग्य नहीं हैं। हे स्वामी! हम आपको क्या देंगे? भीलों की मित्रता तो बस, ईंधन (लकड़ी) और पत्तों ही तक है।

चौपाई

यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई॥ हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती॥ २ ॥

अर्थ:

हमारी तो यही बड़ी भारी सेवा है कि हम आपके कपड़े और बर्तन नहीं चुरा लेते। हम जड़ जीव हैं, जीवों की हिंसा करनेवाले हैं, कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और कुजाति हैं।

चौपाई

पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं॥ सपनेहुँ धरमबुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

हमारे दिन-रात पाप करते ही बीतते हैं। तो भी न तो हमारी कमर में कपड़ा है और न पेट ही भरता है। हममें स्वप्न में भी कभी धर्मबुद्धि कैसी? यह सब तो श्रीरघुनन्दन के दर्शन का प्रभाव है।

चौपाई

जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे॥ बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे॥ ४ ॥

अर्थ:

जब से प्रभु के चरणकमल देखे, तब से हमारे दुःसह दुःख और दोष मिट गये। वनवासियों के वचन सुनकर अयोध्या के लोग प्रेम में भर गये और उनके भाग्य की सराहना करने लगे।

छन्द

लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं। बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं॥ नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा। तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा॥

अर्थ:

सब उनके भाग्य की सराहना करने लगे और प्रेम के वचन सुनाने लगे। उनके बोलने और मिलने का ढंग तथा श्रीसीतारामजी के चरणों में उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे हैं। उन कोल-भीलों की वाणी सुनकर सभी नर-नारी अपने प्रेम का निरादर करते हैं (उसे धिक्कार देते हैं)। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी की कृपा है कि लोहा नौका को अपने ऊपर लेकर तैर गया॥

सोरठा

बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब। जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम॥ २५१ ॥

अर्थ:

सब लोग प्रतिदिन प्रमुदित होकर वन में चारों ओर विचरते हैं, जैसे पहली वर्षा के जल से मेढक और मोर मोटे हो जाते हैं (प्रसन्न होकर नाचते-कूदते हैं)।

दोहा 252 के अंतर्गत
चौपाई

पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती॥ सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई॥ १ ॥

अर्थ:

अयोध्यापुरी के पुरुष और स्त्रियाँ सभी प्रेम में अत्यन्त मग्र हो रहे हैं। उनके दिन पलके समान बीत जाते हैं। जितनी सासुएँ थीं, उतने ही वेष (रूप) बनाकर सीताजी सब सासुओं की आदरपूर्वक एक-सी सेवा करती हैं।

चौपाई

लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ॥ सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के सिवा इस भेद को और किसी ने नहीं जाना। सब मायाएँ [पराशक्ति महामाया] श्रीसीताजी की माया में ही हैं। सीताजी ने सासुओं को सेवा से वश में कर लिया। उन्होंने सुख पाकर सीख और आशीष दीं।

चौपाई

लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई॥ अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई॥ ३ ॥

अर्थ:

सीताजी समेत दोनों भाइयों (श्रीराम-लक्ष्मण) को सरल स्वभाव देखकर कुटिल रानी कैकेयी भरपेट पछतायी। वह पृथ्वी तथा यमराज से याचना करती है, किन्तु धरती बीच (फटकर समा जाने के लिये रास्ता) नहीं देती और विधाता मृत्यु नहीं देता।

चौपाई

लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं॥ यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

लोक और वेद में प्रसिद्ध है और कवि (ज्ञानी) भी कहते हैं कि जो श्रीरामजी से विमुख हैं उन्हें नरक में भी ठौर नहीं मिलता। सब के मन में यह सन्देह हो रहा था कि हे विधाता! श्रीरामचन्द्रजी का अयोध्या जाना होगा या नहीं।

दोहा

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच। नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच॥ २५२ ॥

अर्थ:

भरतजी को न तो रात को नींद आती है, न दिन में भूख ही लगती है। वे पवित्र सोच में ऐसे विकल हैं, जैसे नीचे की कीचड़ में डूबी हुई मछली जल के संकोच से व्याकुल होती है।

दोहा 253 के अंतर्गत
चौपाई

कीन्हि मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली॥ केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥ १ ॥

अर्थ:

माता के मिस से काल ने कुचाल की है। जैसे धान के पकते समय ईति की भाँति भय आ उपस्थित हो। अब श्रीरामचन्द्रजी का राज्याभिषेक किस प्रकार हो, मुझे तो एक भी उपाय नहीं सूझ पड़ता।

चौपाई

अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी॥ मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ॥ २ ॥

अर्थ:

गुरुजी की आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्या को लौट चलेंगे। परन्तु मुनि पुनः राम की रुचि जानकर ही कहेंगे। माता के कहने से भी श्रीरघुराज लौट सकते हैं; पर भला, राम की जननी क्या कभी हठ करेगी?

चौपाई

मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता॥ जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू॥ ३ ॥

अर्थ:

मुझ सेवक की तो बात ही कितनी है? उसमें भी समय खराब है और विधाता प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म होगा, क्योंकि सेवक का धर्म हरिगिरि से भी भारी है।

चौपाई

एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी॥ प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई॥ ४ ॥

अर्थ:

एक भी युक्ति भरतजी के मन में न ठहरी। सोचते-ही-सोचते रात बीत गयी। भरतजी प्रातःकाल स्नान करके और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वसिष्ठजी ने उनको बुलवा भेजा।

दोहा

गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ। बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ॥ २५३ ॥

अर्थ:

भरतजी गुरु के चरणकमलों में प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गये। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मन्त्री आदि सभी सभासद आकर जुट गये।