वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली का सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप
वनवासी भरतजी और उनके साथियों का प्रेमपूर्वक आदर करते हैं। दूसरी ओर कैकेयी अपने कर्मों को स्मरण कर गहन पश्चाताप से भर उठती हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३९ / ४९
प्रकरण पाठ
सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा॥ देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं॥ २ ॥
अर्थ:
सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजों के अलग-अलग स्वाद, भेद (प्रकार), गुण और नाम बता-बताकर देते हैं। लोग उनका बहुत दाम देते हैं, पर वे नहीं लेते और लौटा देने में श्रीरामजी की दुहाई देते हैं।
कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी॥ तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा॥ ३ ॥
अर्थ:
प्रेम में मग्न होकर वे कोमल वाणी से कहते हैं कि साधु लोग प्रेम को पहचानकर उसका सम्मान करते हैं (अर्थात् आप साधु हैं, आप हमारे प्रेम को देखिये, दाम देकर या वस्तुएँ लौटाकर हमारे प्रेम का तिरस्कार न कीजिये)। आप तो पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं। श्रीरामजी की कृपा से ही हमने आप लोगों के दर्शन पाये हैं।
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा॥ राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा॥ ४ ॥
अर्थ:
हम लोगों को आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमि के लिये गंगाजी की धारा दुर्लभ है! [देखिये, ] कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने निषाद पर कैसी कृपा की है। जैसे राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजा को भी होना चाहिये।
लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं। बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं॥ नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा। तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा॥
अर्थ:
सब उनके भाग्य की सराहना करने लगे और प्रेम के वचन सुनाने लगे। उनके बोलने और मिलने का ढंग तथा श्रीसीतारामजी के चरणों में उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे हैं। उन कोल-भीलों की वाणी सुनकर सभी नर-नारी अपने प्रेम का निरादर करते हैं (उसे धिक्कार देते हैं)। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी की कृपा है कि लोहा नौका को अपने ऊपर लेकर तैर गया॥
पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती॥ सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई॥ १ ॥
अर्थ:
अयोध्यापुरी के पुरुष और स्त्रियाँ सभी प्रेम में अत्यन्त मग्र हो रहे हैं। उनके दिन पलके समान बीत जाते हैं। जितनी सासुएँ थीं, उतने ही वेष (रूप) बनाकर सीताजी सब सासुओं की आदरपूर्वक एक-सी सेवा करती हैं।
लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ॥ सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी के सिवा इस भेद को और किसी ने नहीं जाना। सब मायाएँ [पराशक्ति महामाया] श्रीसीताजी की माया में ही हैं। सीताजी ने सासुओं को सेवा से वश में कर लिया। उन्होंने सुख पाकर सीख और आशीष दीं।
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई॥ अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई॥ ३ ॥
अर्थ:
सीताजी समेत दोनों भाइयों (श्रीराम-लक्ष्मण) को सरल स्वभाव देखकर कुटिल रानी कैकेयी भरपेट पछतायी। वह पृथ्वी तथा यमराज से याचना करती है, किन्तु धरती बीच (फटकर समा जाने के लिये रास्ता) नहीं देती और विधाता मृत्यु नहीं देता।
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं॥ यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
लोक और वेद में प्रसिद्ध है और कवि (ज्ञानी) भी कहते हैं कि जो श्रीरामजी से विमुख हैं उन्हें नरक में भी ठौर नहीं मिलता। सब के मन में यह सन्देह हो रहा था कि हे विधाता! श्रीरामचन्द्रजी का अयोध्या जाना होगा या नहीं।
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी॥ मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ॥ २ ॥
अर्थ:
गुरुजी की आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्या को लौट चलेंगे। परन्तु मुनि पुनः राम की रुचि जानकर ही कहेंगे। माता के कहने से भी श्रीरघुराज लौट सकते हैं; पर भला, राम की जननी क्या कभी हठ करेगी?