श्रीरामजी का लक्ष्मणजी को समझाना एवं भरतजी की महिमा कहना
श्रीरामजी लक्ष्मणजी के आवेश को शांत करते हैं और भरतजी के निष्कलुष प्रेम, विनय और धर्मनिष्ठा का गान करते हैं। वे बताते हैं कि भरतजी के हृदय में किसी प्रकार का स्वार्थ या कपट नहीं है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३७ / ४९
प्रकरण पाठ
अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ॥ सहसा करि पाछें पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥ २ ॥
अर्थ:
परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं। वेद और विद्वान् कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दी में किसी काम को करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं।
जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई॥ सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा॥ ४ ॥
अर्थ:
जिन्होंने साधुओं की सभा का सेवन (सत्संग) नहीं किया, वे ही राजा राजमदरूपी मदिरा का आचमन करते ही (पीते ही) मतवाले हो जाते हैं। हे लक्ष्मण ! सुनो, भरत-सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्मा की सृष्टि में न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है।
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥ १ ॥
अर्थ:
अन्धकार चाहे तरुण (मध्याह्नके) सूर्य को निगल जाय। आकाश चाहे बादलों में समाकर मिल जाय। गौ के खुर-इतने जल में अगस्त्यजी डूब जायँ और पृथ्वी चाहे अपनी स्वाभाविक क्षमा (सहनशीलता) को छोड़ दे।
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥ २ ॥
अर्थ:
मच्छर की फूँक से चाहे सुमेरु उड़ जाय। परन्तु हे भाई ! भरत को राजमद कभी नहीं हो सकता। हे लक्ष्मण ! मैं तुम्हारी शपथ और पिताजी की सौगन्ध खाकर कहता हूँ, भरत के समान पवित्र और उत्तम भाई संसार में नहीं है।
सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥ ३ ॥
अर्थ:
हे तात! गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी जल को मिलाकर विधाता इस दृश्य-प्रपञ्च (जगत्) को रचता है। परन्तु भरत ने सूर्यवंशरूपी तालाब में हंसरूप जन्म लेकर गुण और दोष का विभाग कर दिया (दोनों को अलग-अलग कर दिया)।