श्रीराम-भरत संवाद

श्रीरामजी भरतजी को पितृ आज्ञा, लोकमर्यादा और राजधर्म का मर्म समझाते हैं। भरतजी अत्यंत विनय से सब सुनते हैं, पर उनके हृदय में श्रीरामजी के प्रति सेवा और समर्पण ही प्रधान रहता है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४६ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी॥ कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी ने सभाको संकोच के वश देखा। रामबन्धु (भरतजी) ने बड़ा भारी धीरज धरकर और कुसमय देखकर अपने [उमड़ते हुए] प्रेमको सँभाला, जैसे बढ़ते हुए विन्ध्याचलको अगस्त्यजीने रोका था।

चौपाई

सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी॥ भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला॥ २ ॥

अर्थ:

शोक रूपी हिरण्याक्ष ने [सारी सभा की] बुद्धि रूपी पृथ्वी को हर लिया जो विमल गुणसमूह रूपी जगत् की योनि (उत्पन्न करनेवाली) थी। भरतजी के विवेक रूपी विशाल वराह (वराहरूपधारी भगवान्) ने [शोक रूपी हिरण्याक्ष को नष्ट कर] बिना ही परिश्रम उसका उद्धार कर दिया!।

चौपाई

करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे॥ छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा॥ ३ ॥

अर्थ:

भरतजी ने प्रणाम करके सबके प्रति हाथ जोड़े तथा श्रीरामचन्द्रजी, राजा जनकजी, गुरु वसिष्ठजी और साधु-संत सबसे विनती की और कहा--आज मेरे इस अत्यन्त अनुचित बर्ताव को क्षमा कीजियेगा। मैं कोमल (छोटे) मुख से कठोर (धृष्टतापूर्ण) वचन कह रहा हूँ।

चौपाई

हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई॥ बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर उन्होंने हृदय में सुहावनी सरस्वतीजी का स्मरण किया। वे मानस से (उनके मनरूपी मानसरोवर से) उनके मुखारविन्द पर आ विराजीं। निर्मल विवेक, धर्म और नीति से युक्त भरतजी की वाणी सुन्दर हंसिनी [के समान गुण-दोष का विवेचन करनेवाली] है।

दोहा

निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु। करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु॥ २९७ ॥

अर्थ:

विवेक के नेत्रों से सारे समाज को प्रेम से शिथिल देख, सबको प्रणाम कर, श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करके भरतजी बोले--।

दोहा 298 के अंतर्गत
चौपाई

प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अंतरजामी॥ सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू॥ १ ॥

अर्थ:

हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहृद् (मित्र), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं। सरल हृदय, श्रेष्ठ मालिक, शील के भण्डार, शरणागत की रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुजान,

चौपाई

समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी॥ स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाईं। मोहि समान मैं साइँ दोहाईं॥ २ ॥

अर्थ:

समर्थ, शरणागत का हित करनेवाले, गुणों का आदर करनेवाले और अवगुणों तथा पापों को हरनेवाले हैं। हे गोसाईं! आप-सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामी के साथ द्रोह करने में मेरे समान मैं ही हूँ।

चौपाई

प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली॥ जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू॥ ३ ॥

अर्थ:

मैं मोहवश प्रभु (आप) के और पिताजी के वचनों का उल्लंघन कर और समाज बटोरकर यहाँ आया हूँ। जगत् में भले-बुरे, ऊँचे और नीचे, अमृत और अमरपद (देवताओं का पद), विष और मृत्यु आदि--।

चौपाई

राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं॥ सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई॥ ४ ॥

अर्थ:

किसी को भी कहीं ऐसा नहीं देखा-सुना जो मन में भी श्रीरामचन्द्रजी (आप) की आज्ञा को मेट दे। मैंने सब प्रकार से वही ढिठाई की, परन्तु प्रभु ने उस ढिठाई को स्नेह और सेवा मान लिया!।

दोहा

कृपाँ भलाईं आपनी नाथ कीन्ह भल मोर। दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर॥ २९८ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया, जिससे मेरा दूषण (दोष) भी भूषण (गुण) के समान हो गये और चारों ओर मेरा सुन्दर यश छा गया।

दोहा 299 के अंतर्गत
चौपाई

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥ कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी॥ १ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभाव की बड़ाई जगत् में प्रसिद्ध है, और वेद-शास्त्रों ने गायी है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी (नास्तिक) और निःशंक (निडर) हैं।

चौपाई

तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥ देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने॥ २ ॥

अर्थ:

उन्हें भी आपने शरण में सम्मुख आया सुनकर एक बार प्रणाम करने पर ही अपना लिया। उन (शरणागतों) के दोषों को देखकर भी आप कभी हृदय में नहीं लाये और उनके गुणों को सुनकर साधुओं के समाज में उनका बखान किया।

चौपाई

को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी॥ निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें॥ ३ ॥

अर्थ:

ऐसा सेवक पर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवक का सारा साज-सामान सज दे (उसकी सारी आवश्यकताओं को पूर्ण कर दे) और स्वप्न में भी अपनी कोई करनी न समझकर (अर्थात् मैंने सेवक के लिये कुछ किया है ऐसा न जानकर) उलटा सेवक को संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदय में रखे!।

चौपाई

सो गोसाइँ नहिं दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी॥ पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर (बड़े जोर के साथ) कहता हूँ, ऐसा स्वामी आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। [बंदर आदि] पशु नाचते और तोते [सीखे हुए] पाठ में प्रवीण हो जाते हैं। परन्तु तोते का [पाठप्रवीणतारूप] गुण और पशु के नाचने की गति [क्रमशः] पढ़ानेवाले और नचानेवाले के अधीन है।

दोहा

यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर। को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर॥ २९९ ॥

अर्थ:

इस प्रकार अपने सेवकों की (बिगड़ी) बात सुधारकर और सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओं का शिरोमणि बना दिया। कृपालु (आप) के सिवा अपनी विरदावली का और कौन जबर्दस्ती (हठपूर्वक) पालन करेगा ?।

दोहा 300 के अंतर्गत
चौपाई

सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ॥ तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा॥ १ ॥

अर्थ:

मैं शोक से या स्नेह से या बालक स्वभाव से आज्ञा को बायें लाकर (न मानकर) चला आया, तो भी कृपालु स्वामी (आप) ने अपनी ओर देखकर सभी प्रकार से मेरा भला ही माना (मेरे इस अनुचित कार्य को अच्छा ही समझा)।

चौपाई

देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला॥ बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू॥ २ ॥

अर्थ:

मैंने सुन्दर मंगलों के मूल आपके चरणों का दर्शन किया, और यह जान लिया कि स्वामी मुझ पर स्वभाव से ही अनुकूल हैं। इस बड़े समाज में अपने भाग्य को देखा कि इतनी बड़ी चूक होने पर भी स्वामी का मुझ पर कितना अनुराग है!।

चौपाई

कृपा अनुग्रहु अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई॥ राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं॥ ३ ॥

अर्थ:

कृपानिधान ने मुझ पर पर्याप्त कृपा और अनुग्रह, सब अधिक ही किये हैं (अर्थात् मैं जिसके जरा भी लायक नहीं था उतनी अधिक सर्वांशपूर्ण कृपा आपने मुझ पर की है)। हे गोसाईं! आपने अपने शील, स्वभाव और भलाई से मेरा दुलार रखा।

चौपाई

नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई॥ अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी॥ ४ ॥

अर्थ:

हे नाथ! मैंने स्वामी और समाज के संकोच को छोड़कर अविनय या विनयभरी जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढिठाई की है। हे देव! मेरे आर्तभाव (आतुरता) को जानकर आप क्षमा करेंगे।

दोहा

सुहृद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि। आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि॥ ३०० ॥

अर्थ:

सुहृद् (बिना ही हेतु के हित करनेवाले), बुद्धिमान् और श्रेष्ठ मालिक से बहुत कहना बड़ा अपराध है। इसलिये हे देव! अब मुझे आज्ञा दीजिये, आपने मेरी सभी बात सुधार दी।

दोहा 301 के अंतर्गत
चौपाई

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई॥ सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु (आप) के चरणकमलों की रज, जो सत्य, सुकृत (पुण्य) और सुख की सुहावनी सीमा (अवधि) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदय की जागते, सोते और स्वप्न में भी बनी रहनेवाली रुचि (इच्छा) कहता हूँ।

चौपाई

सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥ अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा॥ २ ॥

अर्थ:

वह रुचि है--कपट, स्वार्थ और [अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप] चारों फलों को छोड़कर स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा करना। और आज्ञापालन के समान श्रेष्ठ स्वामी की और कोई सेवा नहीं है। हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवक को मिल जाय।

चौपाई

अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी॥ प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई॥ ३ ॥

अर्थ:

भरतजी ऐसा कहकर प्रेम के बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं] का जल भर आया। अकुलाकर (व्याकुल होकर) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमल पकड़ लिये। उस समय को और स्नेह को कहा नहीं जा सकता।

चौपाई

कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी॥ भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजी ने सुन्दर वाणी से भरतजी का सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया। भरतजी की विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुराऊ स्नेह से शिथिल हो गये।

सोरठा

देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब। मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत॥ ३०१ ॥

अर्थ:

दोनों समाजों के सभी नर-नारियों को दीन और दुखी देखकर महामलिन-मन इन्द्र मरे हुओं को मारकर अपना मंगल चाहता है।

दोहा 302 के अंतर्गत
चौपाई

कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू॥ काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती॥ १ ॥

अर्थ:

देवराज इन्द्र कपट और कुचाल की सीमा है। उसे परायी हानि और अपना लाभ ही प्रिय है। इन्द्र की रीति कौए के समान है। वह छली और मलिन-मन है, उसका कहीं किसी पर विश्वास नहीं है।

चौपाई

प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला॥ सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे॥ २ ॥

अर्थ:

पहले तो कुमत (बुरा विचार) करके कपट को बटोरा (अनेक प्रकार के कपट का साज सजा)। फिर वह (कपटजनित) उचाट सब के सिर पर डाल दिया। फिर देवमाया से सब लोगों को विशेषरूप से मोहित कर दिया। किन्तु श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम से उनका अत्यन्त बिछोह नहीं हुआ (अर्थात्‌ उनका श्रीरामजी के प्रति प्रेम कुछ तो बना ही रहा)।

चौपाई

भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं॥ दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी॥ ३ ॥

अर्थ:

भय और उचाट के वश किसी का मन स्थिर नहीं है। क्षण में उनकी वन में रहने की रुचि होती है और क्षण में उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं। मन की इस प्रकार की दुविधामयी स्थिति से प्रजा दुखी है। मानो नदी और समुद्र के संगम का जल क्षुब्ध हो रहा हो। (जैसे नदी और समुद्र के संगम का जल स्थिर नहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकार की दशा प्रजा के मन की हो गयी)।

चौपाई

दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं॥ लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥ ४ ॥

अर्थ:

चित्त दोतरफा हो जाने से वे कहीं संतोष नहीं पाते और एक-दूसरे से अपना मर्म भी नहीं कहते। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी यह दशा देखकर हृदय में हँसकर कहने लगे—कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक (कामी पुरुष) एक-सरीखे (एक ही स्वभाव के) हैं। [पाणिनीय व्याकरण के अनुसार श्वन्‌, युवन्‌ और मघवन्‌ शब्दों के रूप भी एक-सरीखे होते हैं]।

दोहा

भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ। लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ॥ ३०२ ॥

अर्थ:

भरतजी, जनकजी, मुनिजन, मन्त्री और साधु-संतों को छोड़कर अन्य सभी पर जिस मनुष्य को जिस योग्य (जिस प्रकृति और जिस स्थिति का) पाया, उस पर वैसे ही देवमाया लग गयी।

दोहा 303 के अंतर्गत
चौपाई

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥ सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री॥ १ ॥

अर्थ:

कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजी ने लोगों को अपने स्नेह और देवराज इन्द्र के भारी छल से दुखी देखा। सभा, राजा, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री आदि सभी की बुद्धि भरतजी की भक्ति से जंत्री हो गयी।

चौपाई

रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से॥ भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥ २ ॥

अर्थ:

सब लोग चित्रलिखे-से श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख रहे हैं। सकुचाते हुए सिखाये हुए-से वचन बोलते हैं। भरतजी की प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुनने में सुख देनेवाली है, पर उसके वर्णन करने में कठिनाई है।

चौपाई

जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥ महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी॥ ३ ॥

अर्थ:

जिनकी भक्ति का लवलेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेम में मग्र हो गये, उन भरतजी की महिमा तुलसीदास कैसे कहे? उनकी भक्ति और सुन्दर भाव से [कवि के] हृदय में सुबुद्धि हुलस रही है (विकसित हो रही है)।

चौपाई

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी॥ कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई॥ ४ ॥

अर्थ:

परन्तु वह बुद्धि अपने को छोटी और भरतजी की महिमा को बड़ी जानकर कविकुल की मर्यादा मानकर सकुचा गयी (उसका वर्णन करने का साहस नहीं कर सकी)। उसकी गुणों में रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धि की गति बालक के वचनों की तरह हो गयी (वह कुण्ठित हो गयी)।

दोहा

भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि। उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि॥ ३०३ ॥

अर्थ:

भरतजी का निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है और सुमति चकोरकुमारी है, जो भक्तों के हृदयरूपी निर्मल आकाश में उस चन्द्रमाको उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाये देखती ही रह गयी है [तब उसका वर्णन कौन करे?]।

दोहा 304 के अंतर्गत
चौपाई

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥ कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिये भी सुगम नहीं है। [अतः] मेरी तुच्छ बुद्धि की चञ्चलता को कविलोग क्षमा करें! भरतजी के सद्भाव को कहते-सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजी के चरणों में अनुरक्त न हो जायगा।

चौपाई

सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभु तेहि सरिस बाम को॥ देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की॥ २ ॥

अर्थ:

भरतजी का स्मरण करने से जिसको श्रीरामजी का प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम (अभागा) और कौन होगा? दयालु और सुजान श्रीरामजी ने सभी की दशा देखकर और भक्त (भरतजी) के हृदय की स्थिति जानकर,

चौपाई

धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर॥ देसु कालु लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू॥ ३ ॥

अर्थ:

धर्मधुरीन, धीर, नय-नागर; सत्य, स्नेह, शील और सुख के सागर; नीति और प्रीति के पालन करनेवाले श्रीरघुनाथजी देश, काल, अवसर और समाज को देखकर,

चौपाई

बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥ तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥ ४ ॥

अर्थ:

[तदनुसार] ऐसे वचन बोले जो मानो वाणी के सर्वस्व ही थे, परिणाम में हितकारी थे और सुनने में चन्द्रमा के रस (अमृत)-सरीखे थे। [उन्होंने कहा--] हे तात भरत! तुम धर्म की धुरी को धारण करनेवाले हो, लोक और वेद दोनों के जाननेवाले और प्रेम में प्रवीण हो।

दोहा

करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात। गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात॥ ३०४ ॥

अर्थ:

हे तात! कर्म से, वचन से और मन से निर्मल तुम्हारे समान तुम ही हो। गुरुजनों के समाज में और ऐसे कुसमय में छोटे भाई के गुण किस तरह कहे जा सकते हैं?

दोहा 305 के अंतर्गत
चौपाई

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती॥ समउ समाजु लाज गुरजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! तुम सूर्यकुल की रीति को, सत्यप्रतिज्ञ पिताजी की कीर्ति और प्रीति को, समय, समाज और गुरुजनों की लाज (मर्यादा) को तथा उदासीन, हित और अनहित सबके मन की बात को जानते हो।

चौपाई

तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू॥ मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा॥ २ ॥

अर्थ:

तुम को सब के कर्मों (कर्तव्यों) का और अपने तथा मेरे परम हितकारी धर्म का पता है। यद्यपि मुझे तुम्हारा सब प्रकार से भरोसा है, तथापि मैं समय के अनुसार कुछ कहता हूँ।

चौपाई

तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरकुल कृपाँ सँभारी॥ नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू॥ ३ ॥

अर्थ:

है तात! पिताजी के बिना हमारी बात केवल गुरुकुल की कृपा से ही सँभाली है; नहीं तो हमारे समेत प्रजा, परिजन, परिवार सभी बर्बाद हो जाते।

चौपाई

जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥ तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

यदि बिना समय के (संध्या से पूर्व ही) सूर्य अस्त हो जाय तो कहो जगत्‌ में किसको क्लेश न होगा? हे तात! उसी प्रकार का उत्पात विधाता ने यह (पिता की असामयिक मृत्यु) किया है। पर मुनि महाराज ने तथा मिथिलेश्वर ने सब को बचा लिया।

दोहा

राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम। गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम॥ ३०५ ॥

अर्थ:

राज-काज, सब लाज, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन, धाम—इन सभी का पालन (रक्षण) गुरुजी का प्रभाव (सामर्थ्य) करेगा और परिणाम शुभ होगा।

दोहा 306 के अंतर्गत
चौपाई

सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥ मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू॥ १ ॥

अर्थ:

गुरुजी का प्रसाद (अनुग्रह) ही घर में और वन में समाज सहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है। माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा [का पालन] समस्त धर्मरूपी पृथ्वी को धारण करने में शेषजी के समान है।

चौपाई

सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू॥ साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी॥ २ ॥

अर्थ:

हे तात! तुम वही करो और मुझसे भी कराओ तथा सूर्यकुल के रक्षक बनो। साधक के लिये यह एक ही (आज्ञापालनरूपी साधना) सम्पूर्ण सिद्धियों की देनेवाली, कीर्तिमयी, सुगतिमयी और ऐश्वर्यमयी त्रिवेणी है।

चौपाई

सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी॥ बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई॥ ३ ॥

अर्थ:

इसे विचारकर भारी संकट सहकर भी प्रजा और परिवार को सुखी करो। हे भाई ! मेरी विपत्ति सभी ने बाँट ली है, परन्तु तुमको तो अवधि भर बड़ी कठिनाई है (सबसे अधिक दुःख है)।

चौपाई

जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा॥ होहिं कुठायँ सुबंधु सहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए॥ ४ ॥

अर्थ:

तुमको कोमल जानकर भी मैं कठोर (वियोग की बात) कह रहा हूँ। हे तात! बुरे समय में मेरे लिये यह कोई अनुचित बात नहीं है। कुठायँ (कुअवसर) में श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं। वज्र के आघात भी हाथ से ही रोके जाते हैं।

दोहा

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ। तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ॥ ३०६ ॥

अर्थ:

सेवक हाथ, पैर और नेत्रों के समान और स्वामी मुख के समान होना चाहिये। तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक-स्वामी की ऐसी प्रीति की रीति सुनकर सुकवि उसकी सराहना करते हैं।

दोहा 307 के अंतर्गत
चौपाई

सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअँ जनु सानी॥ सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी की वाणी सुनकर, जो मानो प्रेमरूपी समुद्र के [मंथन से निकले हुए] अमृत में सनी हुई थी, सारा समाज शिथिल हो गया; सबको प्रेम समाधि लग गयी। यह दशा देखकर सरस्वती ने चुप साध ली।

चौपाई

भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥ मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥ २ ॥

अर्थ:

भरतजी को परम सन्तोष हुआ। स्वामी के सम्मुख (अनुकूल) होते ही उनके दुःख और दोषों ने मुँह मोड़ लिया (वे उन्हें छोड़कर भाग गये)। उनका मुख प्रसन्न हो गया और मन का विषाद मिट गया। मानो गूँगे पर सरस्वती की कृपा हो गयी हो।

चौपाई

कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी॥ नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को॥ ३ ॥

अर्थ:

उन्होंने फिर प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और करकमलों को जोड़कर वे बोले--हे नाथ! मुझे आपके साथ जाने का सुख प्राप्त हो गया और मैंने जगत् में जन्म लेने का लाभ भी पा लिया।

चौपाई

अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई॥ सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे कृपालु! अब जैसी आज्ञा हो, उसी को मैं सिर पर धरकर आदरपूर्वक करूँ! परन्तु देव! आप मुझे वह अवलम्बन (कोई सहारा) दें जिसकी सेवा कर मैं अवधि का पार पा जाऊँ।

दोहा

देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ॥ ३०७ ॥

अर्थ:

हे देव! स्वामी (आप) के अभिषेक के लिये गुरुजी की आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थों का जल लेता आया हूँ; उसके लिये क्या आज्ञा होती है ?

दोहा 308 के अंतर्गत
चौपाई

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं॥ कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई॥ १ ॥

अर्थ:

मेरे मन में एक और बड़ा मनोरथ है, जो भय और संकोच के कारण कहा नहीं जाता। [श्रीरामचन्द्रजी ने कहा--] हे भाई! कहो। तब प्रभु की आज्ञा पाकर भरतजी स्नेहपूर्ण सुन्दर वाणी बोले--।

चौपाई

चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन॥ प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी॥ २ ॥

अर्थ:

आज्ञा हो तो चित्रकूट के पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पक्षी-पशु, तालाब-नदी, झरने और पर्वतों के समूह तथा विशेषकर प्रभु (आप) के चरणचिह्नों से अंकित भूमि को देख आऊँ।

चौपाई

अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू॥ मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता॥ ३ ॥

अर्थ:

[श्रीरघुनाथजी बोले--] अवश्य ही अत्रि ऋषि की आज्ञा को सिर पर धारण करो (उनसे पूछकर वे जैसा कहें वैसा करो) और निर्भय होकर वन में विचरो। हे भाई! अत्रि मुनि के प्रसाद से वन मंगलों का देने वाला, परम पवित्र और अत्यन्त सुन्दर है--।

चौपाई

रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं॥ सुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा॥ ४ ॥

अर्थ:

और ऋषियों के प्रमुख अत्रिजी जहाँ आज्ञा दें, वहीं [लाया हुआ] तीर्थों का जल स्थापित कर देना। प्रभु के वचन सुनकर भरतजी ने सुख पाया और आनन्दित होकर मुनि अत्रिजी के चरणकमलों में सिर नवाया।

दोहा

भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल। सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल॥ ३०८ ॥

अर्थ:

समस्त सुन्दर मंगलों का मूल भरतजी और श्रीरामचन्द्रजी का संवाद सुनकर स्वार्थी देवता रघुकुल की सराहना करके कल्पवृक्ष के फूल बरसाने लगे।

दोहा 309 के अंतर्गत
चौपाई

धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआईं॥ मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥ १ ॥

अर्थ:

“भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजी की जय हो!” ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक (अत्यधिक) हर्षित होने लगे। भरतजी के वचन सुनकर मुनि, मिथिलेश और सभा में सब किसी को बड़ा उत्साह (आनन्द) हुआ।

चौपाई

भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू॥ सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन॥ २ ॥

अर्थ:

भरतजी और श्रीरामचन्द्रजी के गुण-समूह की तथा प्रेम की विदेहराज जनकजी पुलकित होकर प्रशंसा कर रहे हैं। सेवक और स्वामी दोनों का सुन्दर स्वभाव है। इनके नियम और प्रेम पवित्र को भी अत्यन्त पवित्र करने वाले हैं।

चौपाई

मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे॥ सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू॥ ३ ॥

अर्थ:

मन्त्री और सभासद सभी प्रेममुग्ध होकर अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार सराहना करने लगे। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी का संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजों के हृदयों में हर्ष और विषाद (भरतजी के सेवाधर्म को देखकर हर्ष और रामवियोग की सम्भावना से विषाद) दोनों हुए।

चौपाई

राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी॥ एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी की माता ने दुःख और सुख को समान जानकर श्रीरामजी के गुण कहकर दूसरी रानियों को धैर्य बँधाया। कोई श्रीरामजी की बड़ाई (बड़प्पन) की चर्चा कर रहे हैं, तो कोई भरतजी के अच्छेपन की सराहना करते हैं।

दोहा

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप॥ ३०९ ॥

अर्थ:

तब अत्रिजी ने भरतजी से कहा--इस पर्वत के समीप ही एक सुन्दर कुआँ है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत-जैसे तीर्थजल को उसी में स्थापित कर दीजिये।