श्रीराम-भरत संवाद
श्रीरामजी भरतजी को पितृ आज्ञा, लोकमर्यादा और राजधर्म का मर्म समझाते हैं। भरतजी अत्यंत विनय से सब सुनते हैं, पर उनके हृदय में श्रीरामजी के प्रति सेवा और समर्पण ही प्रधान रहता है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४६ / ४९
प्रकरण पाठ
सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी॥ भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला॥ २ ॥
अर्थ:
शोक रूपी हिरण्याक्ष ने [सारी सभा की] बुद्धि रूपी पृथ्वी को हर लिया जो विमल गुणसमूह रूपी जगत् की योनि (उत्पन्न करनेवाली) थी। भरतजी के विवेक रूपी विशाल वराह (वराहरूपधारी भगवान्) ने [शोक रूपी हिरण्याक्ष को नष्ट कर] बिना ही परिश्रम उसका उद्धार कर दिया!।
करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे॥ छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा॥ ३ ॥
अर्थ:
भरतजी ने प्रणाम करके सबके प्रति हाथ जोड़े तथा श्रीरामचन्द्रजी, राजा जनकजी, गुरु वसिष्ठजी और साधु-संत सबसे विनती की और कहा--आज मेरे इस अत्यन्त अनुचित बर्ताव को क्षमा कीजियेगा। मैं कोमल (छोटे) मुख से कठोर (धृष्टतापूर्ण) वचन कह रहा हूँ।
हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई॥ बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली॥ ४ ॥
अर्थ:
फिर उन्होंने हृदय में सुहावनी सरस्वतीजी का स्मरण किया। वे मानस से (उनके मनरूपी मानसरोवर से) उनके मुखारविन्द पर आ विराजीं। निर्मल विवेक, धर्म और नीति से युक्त भरतजी की वाणी सुन्दर हंसिनी [के समान गुण-दोष का विवेचन करनेवाली] है।
राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥ कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी॥ १ ॥
अर्थ:
हे नाथ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभाव की बड़ाई जगत् में प्रसिद्ध है, और वेद-शास्त्रों ने गायी है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी (नास्तिक) और निःशंक (निडर) हैं।
तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥ देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने॥ २ ॥
अर्थ:
उन्हें भी आपने शरण में सम्मुख आया सुनकर एक बार प्रणाम करने पर ही अपना लिया। उन (शरणागतों) के दोषों को देखकर भी आप कभी हृदय में नहीं लाये और उनके गुणों को सुनकर साधुओं के समाज में उनका बखान किया।
को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी॥ निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें॥ ३ ॥
अर्थ:
ऐसा सेवक पर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवक का सारा साज-सामान सज दे (उसकी सारी आवश्यकताओं को पूर्ण कर दे) और स्वप्न में भी अपनी कोई करनी न समझकर (अर्थात् मैंने सेवक के लिये कुछ किया है ऐसा न जानकर) उलटा सेवक को संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदय में रखे!।
सो गोसाइँ नहिं दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी॥ पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना॥ ४ ॥
अर्थ:
मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर (बड़े जोर के साथ) कहता हूँ, ऐसा स्वामी आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। [बंदर आदि] पशु नाचते और तोते [सीखे हुए] पाठ में प्रवीण हो जाते हैं। परन्तु तोते का [पाठप्रवीणतारूप] गुण और पशु के नाचने की गति [क्रमशः] पढ़ानेवाले और नचानेवाले के अधीन है।
सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ॥ तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा॥ १ ॥
अर्थ:
मैं शोक से या स्नेह से या बालक स्वभाव से आज्ञा को बायें लाकर (न मानकर) चला आया, तो भी कृपालु स्वामी (आप) ने अपनी ओर देखकर सभी प्रकार से मेरा भला ही माना (मेरे इस अनुचित कार्य को अच्छा ही समझा)।
देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला॥ बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू॥ २ ॥
अर्थ:
मैंने सुन्दर मंगलों के मूल आपके चरणों का दर्शन किया, और यह जान लिया कि स्वामी मुझ पर स्वभाव से ही अनुकूल हैं। इस बड़े समाज में अपने भाग्य को देखा कि इतनी बड़ी चूक होने पर भी स्वामी का मुझ पर कितना अनुराग है!।
कृपा अनुग्रहु अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई॥ राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं॥ ३ ॥
अर्थ:
कृपानिधान ने मुझ पर पर्याप्त कृपा और अनुग्रह, सब अधिक ही किये हैं (अर्थात् मैं जिसके जरा भी लायक नहीं था उतनी अधिक सर्वांशपूर्ण कृपा आपने मुझ पर की है)। हे गोसाईं! आपने अपने शील, स्वभाव और भलाई से मेरा दुलार रखा।
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई॥ सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥ १ ॥
अर्थ:
प्रभु (आप) के चरणकमलों की रज, जो सत्य, सुकृत (पुण्य) और सुख की सुहावनी सीमा (अवधि) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदय की जागते, सोते और स्वप्न में भी बनी रहनेवाली रुचि (इच्छा) कहता हूँ।
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥ अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा॥ २ ॥
अर्थ:
वह रुचि है--कपट, स्वार्थ और [अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप] चारों फलों को छोड़कर स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा करना। और आज्ञापालन के समान श्रेष्ठ स्वामी की और कोई सेवा नहीं है। हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवक को मिल जाय।
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी॥ प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई॥ ३ ॥
अर्थ:
भरतजी ऐसा कहकर प्रेम के बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं] का जल भर आया। अकुलाकर (व्याकुल होकर) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमल पकड़ लिये। उस समय को और स्नेह को कहा नहीं जा सकता।
कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी॥ भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ॥ ४ ॥
अर्थ:
कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजी ने सुन्दर वाणी से भरतजी का सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया। भरतजी की विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुराऊ स्नेह से शिथिल हो गये।
प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला॥ सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे॥ २ ॥
अर्थ:
पहले तो कुमत (बुरा विचार) करके कपट को बटोरा (अनेक प्रकार के कपट का साज सजा)। फिर वह (कपटजनित) उचाट सब के सिर पर डाल दिया। फिर देवमाया से सब लोगों को विशेषरूप से मोहित कर दिया। किन्तु श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम से उनका अत्यन्त बिछोह नहीं हुआ (अर्थात् उनका श्रीरामजी के प्रति प्रेम कुछ तो बना ही रहा)।
भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं॥ दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी॥ ३ ॥
अर्थ:
भय और उचाट के वश किसी का मन स्थिर नहीं है। क्षण में उनकी वन में रहने की रुचि होती है और क्षण में उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं। मन की इस प्रकार की दुविधामयी स्थिति से प्रजा दुखी है। मानो नदी और समुद्र के संगम का जल क्षुब्ध हो रहा हो। (जैसे नदी और समुद्र के संगम का जल स्थिर नहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकार की दशा प्रजा के मन की हो गयी)।
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं॥ लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥ ४ ॥
अर्थ:
चित्त दोतरफा हो जाने से वे कहीं संतोष नहीं पाते और एक-दूसरे से अपना मर्म भी नहीं कहते। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी यह दशा देखकर हृदय में हँसकर कहने लगे—कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक (कामी पुरुष) एक-सरीखे (एक ही स्वभाव के) हैं। [पाणिनीय व्याकरण के अनुसार श्वन्, युवन् और मघवन् शब्दों के रूप भी एक-सरीखे होते हैं]।
कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥ सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री॥ १ ॥
अर्थ:
कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजी ने लोगों को अपने स्नेह और देवराज इन्द्र के भारी छल से दुखी देखा। सभा, राजा, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री आदि सभी की बुद्धि भरतजी की भक्ति से जंत्री हो गयी।
रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से॥ भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥ २ ॥
अर्थ:
सब लोग चित्रलिखे-से श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख रहे हैं। सकुचाते हुए सिखाये हुए-से वचन बोलते हैं। भरतजी की प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुनने में सुख देनेवाली है, पर उसके वर्णन करने में कठिनाई है।
जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥ महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी॥ ३ ॥
अर्थ:
जिनकी भक्ति का लवलेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेम में मग्र हो गये, उन भरतजी की महिमा तुलसीदास कैसे कहे? उनकी भक्ति और सुन्दर भाव से [कवि के] हृदय में सुबुद्धि हुलस रही है (विकसित हो रही है)।
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी॥ कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई॥ ४ ॥
अर्थ:
परन्तु वह बुद्धि अपने को छोटी और भरतजी की महिमा को बड़ी जानकर कविकुल की मर्यादा मानकर सकुचा गयी (उसका वर्णन करने का साहस नहीं कर सकी)। उसकी गुणों में रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धि की गति बालक के वचनों की तरह हो गयी (वह कुण्ठित हो गयी)।
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥ कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को॥ १ ॥
अर्थ:
भरतजी के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिये भी सुगम नहीं है। [अतः] मेरी तुच्छ बुद्धि की चञ्चलता को कविलोग क्षमा करें! भरतजी के सद्भाव को कहते-सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजी के चरणों में अनुरक्त न हो जायगा।
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभु तेहि सरिस बाम को॥ देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की॥ २ ॥
अर्थ:
भरतजी का स्मरण करने से जिसको श्रीरामजी का प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम (अभागा) और कौन होगा? दयालु और सुजान श्रीरामजी ने सभी की दशा देखकर और भक्त (भरतजी) के हृदय की स्थिति जानकर,
बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥ तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥ ४ ॥
अर्थ:
[तदनुसार] ऐसे वचन बोले जो मानो वाणी के सर्वस्व ही थे, परिणाम में हितकारी थे और सुनने में चन्द्रमा के रस (अमृत)-सरीखे थे। [उन्होंने कहा--] हे तात भरत! तुम धर्म की धुरी को धारण करनेवाले हो, लोक और वेद दोनों के जाननेवाले और प्रेम में प्रवीण हो।
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥ तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा॥ ४ ॥
अर्थ:
यदि बिना समय के (संध्या से पूर्व ही) सूर्य अस्त हो जाय तो कहो जगत् में किसको क्लेश न होगा? हे तात! उसी प्रकार का उत्पात विधाता ने यह (पिता की असामयिक मृत्यु) किया है। पर मुनि महाराज ने तथा मिथिलेश्वर ने सब को बचा लिया।
सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥ मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू॥ १ ॥
अर्थ:
गुरुजी का प्रसाद (अनुग्रह) ही घर में और वन में समाज सहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है। माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा [का पालन] समस्त धर्मरूपी पृथ्वी को धारण करने में शेषजी के समान है।
जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा॥ होहिं कुठायँ सुबंधु सहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए॥ ४ ॥
अर्थ:
तुमको कोमल जानकर भी मैं कठोर (वियोग की बात) कह रहा हूँ। हे तात! बुरे समय में मेरे लिये यह कोई अनुचित बात नहीं है। कुठायँ (कुअवसर) में श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं। वज्र के आघात भी हाथ से ही रोके जाते हैं।
भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥ मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥ २ ॥
अर्थ:
भरतजी को परम सन्तोष हुआ। स्वामी के सम्मुख (अनुकूल) होते ही उनके दुःख और दोषों ने मुँह मोड़ लिया (वे उन्हें छोड़कर भाग गये)। उनका मुख प्रसन्न हो गया और मन का विषाद मिट गया। मानो गूँगे पर सरस्वती की कृपा हो गयी हो।
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू॥ मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता॥ ३ ॥
अर्थ:
[श्रीरघुनाथजी बोले--] अवश्य ही अत्रि ऋषि की आज्ञा को सिर पर धारण करो (उनसे पूछकर वे जैसा कहें वैसा करो) और निर्भय होकर वन में विचरो। हे भाई! अत्रि मुनि के प्रसाद से वन मंगलों का देने वाला, परम पवित्र और अत्यन्त सुन्दर है--।
रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं॥ सुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा॥ ४ ॥
अर्थ:
और ऋषियों के प्रमुख अत्रिजी जहाँ आज्ञा दें, वहीं [लाया हुआ] तीर्थों का जल स्थापित कर देना। प्रभु के वचन सुनकर भरतजी ने सुख पाया और आनन्दित होकर मुनि अत्रिजी के चरणकमलों में सिर नवाया।
भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू॥ सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन॥ २ ॥
अर्थ:
भरतजी और श्रीरामचन्द्रजी के गुण-समूह की तथा प्रेम की विदेहराज जनकजी पुलकित होकर प्रशंसा कर रहे हैं। सेवक और स्वामी दोनों का सुन्दर स्वभाव है। इनके नियम और प्रेम पवित्र को भी अत्यन्त पवित्र करने वाले हैं।
मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे॥ सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू॥ ३ ॥
अर्थ:
मन्त्री और सभासद सभी प्रेममुग्ध होकर अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार सराहना करने लगे। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी का संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजों के हृदयों में हर्ष और विषाद (भरतजी के सेवाधर्म को देखकर हर्ष और रामवियोग की सम्भावना से विषाद) दोनों हुए।
राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी॥ एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी की माता ने दुःख और सुख को समान जानकर श्रीरामजी के गुण कहकर दूसरी रानियों को धैर्य बँधाया। कोई श्रीरामजी की बड़ाई (बड़प्पन) की चर्चा कर रहे हैं, तो कोई भरतजी के अच्छेपन की सराहना करते हैं।