यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम

श्रीरामजी यमुना को प्रणाम करते हैं और आगे बढ़ते हैं। मार्ग में वनवासी और ग्रामवासी सरल प्रेम से दर्शन पाकर अपने जीवन को धन्य मानते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २० / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी॥ चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई॥ १ ॥

अर्थ:

फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजी ने हाथ जोड़कर यमुना जी को पुनः प्रणाम किया और सूर्यकन्या यमुना जी की बड़ाई करते हुए सीताजी सहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले।

चौपाई

पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता॥ राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें॥ २ ॥

अर्थ:

रास्ते में जाते हुए उन्हें अनेक यात्री मिलते हैं। वे दोनों भाइयों को देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहते हैं कि तुम्हारे सब अंगों में राजचिह्न देखकर हमारे हृदय में बड़ा सोच होता है।

चौपाई

मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ॥ अगमु पंथु गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी॥ ३ ॥

अर्थ:

[ऐसे राजचिह्नों के होते हुए भी] तुम लोग रास्ते में पैदल ही चल रहे हो, इससे हमारी समझ में आता है कि ज्योतिष-शास्त्र झूठा ही है। भारी जंगल और बड़े-बड़े पहाड़ों का दुर्गम रास्ता है। तिस पर तुम्हारे साथ सुकुमारी स्त्री है।

चौपाई

करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहिं जो आयसु होई॥ जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई॥ ४ ॥

अर्थ:

हाथी और सिंहों से भरा यह भयानक वन देखा तक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहाँ तक जाएँगे वहाँ तक पहुँचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आवेंगे।

दोहा

एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन। कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन॥ ११२ ॥

अर्थ:

इस प्रकार वे यात्री प्रेम वश पुलकित शरीर हो और नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनययुक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।

दोहा 113 के अंतर्गत
चौपाई

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं॥ केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए॥ १ ॥

अर्थ:

जो पुर और गाँव रास्ते में बसे हैं, नागों और देवताओं के नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवान् ने किस शुभ घड़ी में इनको बसाया था, जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुन्दर हो रहे हैं।

चौपाई

जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं॥ पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी॥ २ ॥

अर्थ:

जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजी के चरण चले जाते हैं, उनके समान अमरावती भी नहीं है। रास्ते के निकट बसने वाले भी बड़े पुण्यात्मा हैं—स्वर्ग में रहने वाले देवता भी उनकी सराहना करते हैं—।

चौपाई

जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि॥ जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं॥ ३ ॥

अर्थ:

जो नेत्र भरकर सीताजी और लक्ष्मणजी सहित घनश्याम श्रीरामजी के दर्शन करते हैं, जिन तालाबों और नदियों में श्रीरामजी स्नान कर लेते हैं, देव-सरोवर और देव-नदियाँ भी उनकी बड़ाई करते हैं।

चौपाई

जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई॥ परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा॥ ४ ॥

अर्थ:

जिस वृक्ष के नीचे प्रभु जा बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों की रज का स्पर्श करके पृथ्वी अपना बहुत बड़ा सौभाग्य मानती है।

दोहा

छाँह करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं॥ ११३ ॥

अर्थ:

रास्ते में बादल छाया करते हैं और देवता फूल बरसाते और हर्ष से सिहरते हैं। पर्वत, वन और पशु-पक्षी देखते हुए श्रीरामजी मार्ग में चले जा रहे हैं।

दोहा 114 के अंतर्गत
चौपाई

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई॥ सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृह काजु बिसारी॥ १ ॥

अर्थ:

सीताजी और लक्ष्मणजी सहित श्रीरघुनाथजी जब किसी गाँव के पास जा निकलते हैं तब उनका आना सुनते ही बालक-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सब अपने घर और काम-काज को भूलकर तुरंत उन्हें देखने के लिये चल देते हैं।

चौपाई

राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी॥ सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी का रूप देखकर, नेत्रों का [परम] फल पाकर वे सुखी होते हैं। दोनों भाइयों को देखकर सब प्रेमानन्द में मग्र हो गये। उनके नेत्रों में जल भर आया और शरीर पुलकित हो गये।

चौपाई

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी॥ एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती। मानो दरिद्रों ने चिन्तामणि की ढेरी पा ली हो। वे एक-एक को पुकारकर सीख देते हैं कि इसी क्षण नेत्रों का लाभ ले लो।

चौपाई

रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे॥ एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी॥ ४ ॥

अर्थ:

कोई श्रीरामचन्द्रजी को देखकर ऐसे अनुराग में भर गये हैं कि वे उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं। कोई नेत्रमार्ग से उनकी छविको हृदय में लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणी से शिथिल हो जाते हैं (अर्थात्‌ उनके शरीर, मन और वाणी का व्यवहार बंद हो जाता है)।

दोहा

एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात॥ ११४ ॥

अर्थ:

कोई बड़ी सुन्दर छाया देखकर, वहाँ नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षण भर यहाँ बैठकर थकावट मिटा लीजिये। फिर चाहे अभी चले जाइये, चाहे प्रातःकाल।

दोहा 115 के अंतर्गत
चौपाई

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥ सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी॥ १ ॥

अर्थ:

कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणी से कहते हैं—नाथ! आचमन तो कर लीजिये। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यन्त प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजी ने—।

चौपाई

जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं॥ मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा॥ २ ॥

अर्थ:

मन में सीताजी को थकी हुई जानकर घड़ी भर बड़ी छाया में विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूप ने उनके नेत्रों और मनों को लुभा लिया है।

चौपाई

एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा॥ तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा॥ ३ ॥

अर्थ:

सब लोग टकटकी लगाये श्रीरामचन्द्रजी के मुखचन्द्र को चकोर की तरह (तन्मय होकर) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी का नवीन तमाल वृक्ष के रंग का (श्याम) शरीर अत्यन्त शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेवों के मन मोहित हो जाते हैं।

चौपाई

दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के॥ मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा॥ ४ ॥

अर्थ:

बिजली के-से रंग के लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नख से शिख तक सुन्दर हैं और मन को बहुत भाते हैं। मुनियों के पट (बल्कल आदि) वस्त्र पहने हैं और कमर में तरकस कसे हुए हैं। कमल के समान हाथों में धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं।

दोहा

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल। सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल॥ ११५ ॥

अर्थ:

श्याम और गौर वर्ण है, सुन्दर किशोर अवस्था है; दोनों ही परम सुन्दर और शोभा के धाम हैं। शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान इनके मुख और शरद ऋतु के कमल के समान इनके नेत्र हैं।

दोहा 116 के अंतर्गत
चौपाई

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥ राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई॥ १ ॥

अर्थ:

उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि शोभा बहुत अधिक है, और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी की सुन्दरता को सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनों को लगाकर देख रहे हैं।

चौपाई

थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से॥ सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

प्रेम के प्यासे [वे गाँवों के] स्त्री-पुरुष [इनके सौन्दर्य-माधुर्य की छटा देखकर] ऐसे थकित रह गये जैसे दीपक को देखकर हिरनी और हिरन [निस्तब्ध रह जाते हैं] ! गाँवों की स्त्रियाँ सीताजी के पास जाती हैं; परन्तु अत्यन्त स्नेह के कारण पूछते सकुचाती हैं।

चौपाई

बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ॥ राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

बार-बार सब उनके पाँव लगतीं और सहज ही सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं—हे राजकुमारी! हम विनती करती हैं (कुछ निवेदन करना चाहती हैं), परन्तु स्त्री-स्वभाव के कारण कुछ पूछते हुए डरती हैं।

चौपाई

स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी॥ राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने॥ ४ ॥

अर्थ:

हे स्वामिनि! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा। ये दोनों राजकुमार स्वभाव से ही लावण्यमय (परम सुन्दर) हैं। मरकतमणि (पन्ने) और सुवर्ण ने कान्ति इन्हीं से पायी है (अर्थात्‌ मरकतमणि में और स्वर्ण में जो हरित और स्वर्णवर्णनीय आभा है वह इनकी हरिताभ-नील और स्वर्णकान्ति के एक कण के बराबर भी नहीं है)।

दोहा

स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन। सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन॥ ११६ ॥

अर्थ:

श्याम और गौर वर्ण है, सुन्दर किशोर अवस्था है; दोनों ही परम सुन्दर और शोभा के धाम हैं। शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान इनके मुख और शरद ऋतु के कमल के समान इनके नेत्र हैं।

दोहा 117 के अंतर्गत
चौपाई

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥ सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥ १ ॥

अर्थ:

हे सुमुखि! कहो तो, अपनी सुन्दरता से करोड़ों कामदेवों को लजानेवाले ये तुम्हारे कौन हैं? उनकी ऐसी प्रेममयी सुन्दर वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं और मन-ही-मन मुसकरायीं।

चौपाई

तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचति बरबरनी॥ सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी॥ २ ॥

अर्थ:

उत्तम (गौर) वर्णवाली सीताजी उनको देखकर [संकोचवश] पृथ्वी की ओर देखती हैं। वे दोनों ओर के संकोच से सकुचा रही हैं (अर्थात्‌ न बताने में ग्राम की स्त्रियों को दुःख होने का संकोच है और बताने में लज्जारूप संकोच)। हिरण के बच्चे के सदृश नेत्रों वाली और कोकिल की-सी वाणीवाली सीताजी सकुचाकर प्रेम सहित मधुर वचन बोलीं--।

चौपाई

सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे॥ बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी॥ ३ ॥

अर्थ:

ये जो सहजस्वभाव, सुन्दर और गोरे शरीर के हैं, उनका नाम लक्ष्मण है; ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीताजी ने [लज्जावश] अपने चन्द्रमुख को आँचल से ढककर और प्रियतम (श्रीरामजी) की ओर निहारकर भौंहें टेढ़ी करके,।

चौपाई

खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥ भईं मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं॥ ४ ॥

अर्थ:

खंजन पक्षी के-से सुन्दर नेत्रों की तिरछा करके सीताजी ने इशारे से उन्हें कहा कि ये (श्रीरामचन्द्रजी) मेरे पति हैं। यह जानकर गाँव की सब युवती स्त्रियाँ इस प्रकार आनन्दित हुईं मानो कंगालों ने धन की राशियाँ लूट ली हों।

दोहा

अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस। सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस॥ ११७ ॥

अर्थ:

वे अत्यन्त प्रेम से सीताजी के पैरों पड़कर बहुत प्रकार से आशिष देती हैं (शुभ कामना करती हैं) कि जब तक शेषजी के सिर पर पृथ्वी रहे, तब तक तुम सदा सुहागिनी बनी रहो।

दोहा 118 के अंतर्गत
चौपाई

पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू॥ पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी॥ १ ॥

अर्थ:

और पार्वतीजी के समान अपने पति की प्यारी होओ। हे देवि! हम पर कृपा न छोड़ना (बनाये रखना)। हम बार-बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं कि आप फिर इसी रास्ते लौटें।

चौपाई

दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी॥ मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं॥ २ ॥

अर्थ:

दर्शन दें, हमें अपनी दासी जानकर। सीताजी ने उन सबको प्रेम की प्यासी देखा, और मधुर वचन कह-कहकर उनका भलीभाँति सन्तोष किया। मानो चाँदनी ने कुमुदिनियों को खिलाकर पुष्ट कर दिया हो।

चौपाई

तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी॥ सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी॥ ३ ॥

अर्थ:

उसी समय श्रीरामचन्द्रजी का रुख जानकर लक्ष्मणजी ने कोमल वाणी से लोगों से रास्ता पूछा। यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दुःखी हो गये। उनके शरीर पुलकित हो गये और नेत्रों में [वियोग की सम्भावना से प्रेम का] जल भर आया।

चौपाई

मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने॥ समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

उनका आनन्द मिट गया और मन ऐसे उदास हो गये मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीने लेता हो। कर्म की गति समझकर उन्होंने धैर्य धारण किया और अच्छी तरह निर्णय करके सुगम मार्ग बतला दिया।

दोहा

लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ। फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ॥ ११८ ॥

अर्थ:

तब लक्ष्मणजी और जानकीजी सहित श्रीरघुनाथजी ने गमन किया और सब लोगों को प्रिय वचन कहकर लौटाया, किन्तु उनके मनों को अपने साथ ही लगा लिया।

दोहा 119 के अंतर्गत
चौपाई

फिरत नारि नर अति पछिताहीं। दैअहि दोषु देहिं मन माहीं॥ सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं॥ १ ॥

अर्थ:

लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन-ही-मन दैव को दोष देते हैं। परस्पर [बड़े ही] विषाद के साथ कहते हैं कि विधाता के सभी काम उलटे हैं।

चौपाई

निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू॥ रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा॥ २ ॥

अर्थ:

वह विधाता बिलकुल निरंकुश (स्वतन्त्र), निर्दय और निडर है, जिसने चन्द्रमा को रोगी (घटने-बढ़नेवाला) और कलंकी बनाया, कल्पवृक्ष को पेड़ और समुद्र को खारा बनाया। उसी ने इन राजकुमारों को वन में भेजा है।

चौपाई

जौं पै इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू॥ ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना॥ ३ ॥

अर्थ:

जब विधाता ने इनको वनवास दिया है, तब उसने भोग-विलास व्यर्थ ही बनाये। जब ये बिना जूते के (नंगे ही पैरों) रास्ते में चल रहे हैं, तब विधाता ने अनेक वाहन (सवारियाँ) व्यर्थ ही रचे।

चौपाई

ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता॥ तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

जब ये कुश और पत्ते बिछाकर जमीन पर ही पड़े रहते हैं, तब विधाता सुन्दर सेज (पलंग और बिछौने) किस लिये बनाता है? विधाता ने जब इनको बड़े-बड़े पेड़ों के नीचे का निवास दिया, तब उज्ज्वल महलों को बना-बनाकर उसने व्यर्थ ही परिश्रम किया।

दोहा

जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार। बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार॥ ११९ ॥

अर्थ:

जो ये सुन्दर और अत्यन्त सुकुमार होकर मुनियों के (बल्कल) वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो फिर करतार ने भाँति-भाँति के गहने और कपड़े वृथा ही बनाये।

दोहा 120 के अंतर्गत
चौपाई

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं॥ एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए॥ १ ॥

अर्थ:

जो ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत् में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं। कोई एक कहते हैं—ये स्वभाव से ही सुन्दर हैं [इनका सौन्दर्य-माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है]। ये अपने-आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्मा के बनाये नहीं हैं।

चौपाई

जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी॥ देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी॥ २ ॥

अर्थ:

हमारे कानों, नेत्रों और मन के द्वारा अनुभव में आनेवाली विधाता की करनी को जहाँ तक वेदों ने वर्णन करके कहा है, वहाँ तक चौदहों लोकों में ढूँढ़ देखो, ऐसे पुरुष और ऐसी स्त्रियाँ कहाँ हैं? [कहीं भी नहीं हैं, इसी से सिद्ध है कि ये विधाता के चौदहों लोकों से अलग हैं और अपनी महिमा से ही आप निर्मित हुए हैं]।

चौपाई

इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा॥ कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए तेहिं इरिषा बन आनि दुराए॥ ३ ॥

अर्थ:

इन्हें देखकर विधाता का मन अनुरक्त (मुग्ध) हो गया, तब वह भी इन्हीं की उपमा के योग्य दूसरे स्त्री-पुरुष बनाने लगा। उसने बहुत परिश्रम किया, परन्तु कोई उसकी अटकल में ही नहीं आये (पूरे नहीं उतरे)। इसी ईर्ष्या के मारे उसने इनको जंगल में लाकर छिपा दिया है।

चौपाई

एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं॥ ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे॥ ४ ॥

अर्थ:

कोई एक कहते हैं—हम बहुत नहीं जानते। हाँ, अपने को परम धन्य अवश्य मानते हैं [जो इनके दर्शन कर रहे हैं] और हमारी समझ में वे भी बड़े पुण्यवान् हैं जिन्होंने इनको देखा है, जो देख रहे हैं और जो देखेंगे।

दोहा

एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर॥ १२० ॥

अर्थ:

इस प्रकार प्रिय वचन कह-कहकर सब नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीरवाले दुर्गम मार्ग में कैसे चलेंगे।

दोहा 121 के अंतर्गत
चौपाई

नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकईं साँझ समय जनु सोहीं॥ मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी॥ १ ॥

अर्थ:

स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो सन्ध्या के समय चकईं [भावी वियोग की पीड़ा से] सोह रही हों (दुखी हो रही हों)। इनके चरणकमलों को कोमल तथा मार्ग को कठोर जानकर वे व्यथित हृदय से उत्तम वाणी कहती हैं--।

चौपाई

परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे॥ जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा॥ २ ॥

अर्थ:

इनके कोमल और लाल-लाल चरणों (तलवों) को छूते ही पृथ्वी वैसे ही सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। जगदीश्वर ने यदि इन्हें वनवास ही दिया, तो सारे रास्ते को पुष्पमय क्यों नहीं बना दिया?

चौपाई

जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं॥ जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि ब्रह्मा से माँगे मिले तो हे सखि! [हम तो उनसे माँगकर] इन्हें अपनी आँखों में ही रखें। जो स्त्री-पुरुष इस अवसर पर नहीं आये, वे श्रीसीतारामजी को नहीं देख सके।

चौपाई

सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई॥ समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

उनके सौन्दर्य को सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई! अबतक वे कहाँ तक गये होंगे? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्म का परम फल पाकर, विशेष आनन्दित होकर लौटते हैं।

दोहा

अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं। होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं॥ १२१ ॥

अर्थ:

[गर्भवती, प्रसूता आदि] अबला स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े [दर्शन न पाने से] हाथ मलते और पछताते हैं। इस प्रकार जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजी जाते हैं, वहाँ-वहाँ लोग प्रेम के वश में हो जाते हैं।

दोहा 122 के अंतर्गत
चौपाई

गावँ गावँ अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू॥ जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं॥ १ ॥

अर्थ:

सूर्यकुलरूपी कुमुदिनी के प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कर गाँव-गाँव में ऐसा ही आनन्द हो रहा है। जो लोग [वनवास दिये जाने का] कुछ भी समाचार सुन पाते हैं, वे राजा-रानी [दशरथ-कैकेयी] को दोष लगाते हैं।

चौपाई

कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू॥ कहहिं परसपर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं॥ २ ॥

अर्थ:

कोई एक कहते हैं कि राजा बहुत ही अच्छे हैं, जिन्होंने हमें अपने नेत्रों का लाभ दिया। स्त्री-पुरुष सभी आपस में सीधी, स्नेहभरी सुन्दर बातें कह रहे हैं।

चौपाई

ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए॥ धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ॥ ३ ॥

अर्थ:

[कहते हैं--] वे माता-पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया। वह नगर धन्य है जहाँ से ये आये हैं। वह देश, पर्वत, वन और गाँव धन्य है, और वही स्थान धन्य है जहाँ-जहाँ ये जाते हैं।

चौपाई

सुखु पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही॥ राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई॥ ४ ॥

अर्थ:

ब्रह्मा ने उसी को रचकर सुख पाया है जिसके ये (श्रीरामचन्द्रजी) सब प्रकार से स्नेही हैं। पथिकरूप श्रीराम-लक्ष्मण की सुन्दर कथा सारे रास्ते और जंगल में छा गयी है।

दोहा

एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत। जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत॥ १२२ ॥

अर्थ:

रघुकुलरूपी कमल के खिलानेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार मार्ग के लोगों को सुख देते हुए सीताजी और लक्ष्मणजी सहित वन को देखते हुए चले जा रहे हैं।

दोहा 123 के अंतर्गत
चौपाई

आगें रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें॥ उभय बीच सिय सोहति कैसें। ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥ १ ॥

अर्थ:

आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मणजी सुशोभित हैं। तपस्वियों के वेष बनाये दोनों बड़ी ही शोभा पा रहे हैं। दोनों के बीच में सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीव के बीच में माया!

चौपाई

बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥ उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही॥ २ ॥

अर्थ:

फिर जैसी छबि मेरे मन में बस रही है, उसको कहता हूँ--मानो वसन्त-ऋतु और कामदेव के बीच में रति (कामदेव की स्त्री) शोभित हो। फिर अपने हृदय में खोजकर उपमा कहता हूँ कि मानो बुध (चन्द्रमा के पुत्र) और चन्द्रमा के बीच में रोहिणी (चन्द्रमा की स्त्री) सोह रही हो।

चौपाई

प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता॥ सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के [जमीनपर अड्डित होनेवाले दोनों] चरणचिह्नों के बीच-बीच में पैर रखती हुई सीताजी [कहीं भगवान् के चरणचिह्नों पर पैर न टिक जाय इस बात से] डरती हुई मार्ग में चल रही हैं, और लक्ष्मणजी [मर्यादा की रक्षाके लिये] सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी दोनों के चरणचिह्नों को बचाते हुए उन्हें दाहिने रखकर रास्ता चल रहे हैं।

चौपाई

राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई॥ खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी की सुन्दर प्रीति वाणी का विषय नहीं है (अर्थात् अनिर्वचनीय है), अतः वह कैसे कही जा सकती है? पक्षी और पशु भी उस छवि को देखकर (प्रेमानन्द में) मग्न हो जाते हैं। पथिकरूप श्रीरामचन्द्रजी ने उनके भी चित्त चुरा लिये हैं।

दोहा

जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ। भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ॥ १२३ ॥

अर्थ:

प्यारे पथिक सीताजी सहित दोनों भाइयों को जिन-जिन लोगों ने देखा, उन्होंने भव का अगम मार्ग (जन्म-मृत्युरूपी संसार में भटकने का भयानक मार्ग) बिना ही परिश्रम आनन्द के साथ तै कर लिया (अर्थात् वे आवागमन के चक्र से सहज ही छूटकर मुक्त हो गये)।

दोहा 124 के अंतर्गत
चौपाई

अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ॥ राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई॥ १ ॥

अर्थ:

आज भी जिसके हृदय में स्वप्न में भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम तीनों बटोही आ बसें, तो वह भी श्रीरामजी के परमधाम के उस मार्ग को पा जाएगा, जिस मार्ग को कभी कोई बिरले ही मुनि पाते हैं।

चौपाई

तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी॥ तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई॥ २ ॥

अर्थ:

तब श्रीरामचन्द्रजी ने सीताजी को श्रमित जानकर और निकट ही बटु तथा शीतल पानी देखकर उस दिन वहीं ठहर गये। कन्द, मूल, फल खाकर [रातभर वहाँ रहकर] प्रातःकाल स्नान करके श्रीरघुनाथजी आगे चले।