श्रीराम का शृंगवेरपुर पहुँचना, निषादराज द्वारा सेवा

श्रीरामजी शृंगवेरपुर पहुँचते हैं, जहाँ निषादराज गुह प्रेम और विनय से उनकी सेवा करता है। वनमार्ग में भी भक्ति और आत्मीयता का यह मिलन अत्यंत मार्मिक है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण १५ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई॥ उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी॥ १ ॥

अर्थ:

सीताजी और मन्त्री सहित दोनों भाई श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ गंगा जी को देखकर श्रीरामजी उतर पड़े और बड़े हर्ष के साथ उन्होंने दण्डवत् की।

चौपाई

लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा॥ गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला॥ २ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी, सुमन्त्र और सीताजी ने भी प्रणाम किया। सबके साथ श्रीरामचन्द्रजी ने सुख पाया। गंगा जी समस्त आनन्द-मंगलों की मूल हैं। वे सब सुखों की करनेवाली और सब पीड़ाओं की हरनेवाली हैं।

चौपाई

कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा॥ सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई॥ ३ ॥

अर्थ:

अनेक कथा-प्रसंग कहते हुए श्रीरामजी गंगा जी की तरंगों को देख रहे हैं। उन्होंने मन्त्री को, छोटे भाई लक्ष्मणजी को और प्रिया सीताजी को देवनदी गंगा जी की बड़ी महिमा सुनायी।

चौपाई

मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ॥ सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू॥ ४ ॥

अर्थ:

इसके बाद सबने स्नान किया, जिससे मार्ग का सारा श्रम (थकावट) दूर हो गया और पवित्र जल पीते ही मन प्रसन्न हो गया। जिनके स्मरणमात्र से [बार-बार जन्मने और मरने का] महान् श्रम मिट जाता है, उनको 'श्रम' होना--यह केवल लौकिक व्यवहार (नरलीला) है।

दोहा

सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु। चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु॥ ८७ ॥

अर्थ:

शुद्ध (प्रकृतिजन्य त्रिगुणों से रहित, मायातीत दिव्य मंगल-विग्रह) सच्चिदानन्द-कन्दस्वरूप सूर्यकुल के ध्वजरूप भगवान् श्रीरामचन्द्रजी मनुष्यों के सदृश ऐसे चरित्र करते हैं जो संसाररूपी समुद्र के पार उतरने के लिये पुल के समान हैं।

दोहा 88 के अंतर्गत
चौपाई

यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई॥ लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा॥ १ ॥

अर्थ:

जब निषादराज गुह ने यह खबर पायी, तब आनन्दित होकर उसने अपने प्रियजनों और भाई-बन्धुओं को बुला लिया और भेंट देने के लिये फल, मूल (कन्द) लेकर और उन्हें भारों (बहँगियों) में भरकर मिलने के लिये चला। उसके हृदय में हर्ष का पार नहीं था।

चौपाई

करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें॥ सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई॥ २ ॥

अर्थ:

दण्डवत् करके भेंट सामने रखकर वह अत्यन्त प्रेम से प्रभु को देखने लगा। श्रीरघुनाथजी ने स्वाभाविक स्नेह के वश होकर उसे अपने पास बैठाकर कुशल पूछी।

चौपाई

नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें॥ देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा॥ ३ ॥

अर्थ:

निषादराज ने उत्तर दिया-हे नाथ! आपके चरणकमल के दर्शन से ही कुशल है [आपके चरणारविन्दों के दर्शन कर] आज मैं भाग्यवान् पुरुषों की गिनती में आ गया। हे देव! यह पृथ्वी, धन और घर सब आपका है। मैं तो परिवार सहित आपका नीच सेवक हूँ।

चौपाई

कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिअ जनु सबु लोगु सिहाऊ॥ कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना॥ ४ ॥

अर्थ:

अब कृपा करके पुर (श्रृंगवेरपुर) में पधारिये और इस दास की प्रतिष्ठा बढ़ाइये, जिससे सब लोग मेरे भाग्य की बड़ाई करें। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा--हे सुजान सखा! तुमने जो कुछ कहा सब सत्य है। परन्तु पिताजी ने मुझको और ही आज्ञा दी है।

दोहा

बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु। ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु॥ ८८ ॥

अर्थ:

[उनके आज्ञानुसार] मुझे चौदह वर्ष तक मुनियों का व्रत और वेष धारण कर और मुनियों के योग्य आहार करते हुए वन में ही बसना है, गाँव के भीतर निवास करना उचित नहीं है। यह सुनकर गुह को बड़ा दुःख हुआ।

दोहा 89 के अंतर्गत
चौपाई

राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी॥ ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी के रूप को देखकर गाँव के स्त्री-पुरुष प्रेम के साथ चर्चा करते हैं। [कोई कहती है--] हे सखी! कहो तो, वे माता-पिता कैसे हैं, जिन्होंने ऐसे [सुन्दर सुकुमार] बालकों को वन में भेज दिया है!।

चौपाई

एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा॥ तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना॥ २ ॥

अर्थ:

कोई एक कहते हैं--राजा ने अच्छा ही किया, इसी बहाने हमें भी ब्रह्मा ने नेत्रों का लाभ दिया। तब निषादराज ने हृदय में अनुमान किया, तो सिंसुपा के पेड़ को [उनके ठहरने के लिये] मनोहर समझा।

चौपाई

लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा॥ पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए॥ ३ ॥

अर्थ:

उसने श्रीरघुनाथजी को ले जाकर वह स्थान दिखाया। श्रीरामचन्द्रजी ने [देखकर] कहा कि यह सब प्रकार से सुन्दर है। पुरवासी लोग जोहार (वन्दना) करके अपने-अपने घर लौटे और श्रीरामचन्द्रजी सन्ध्या करने पधारे।

चौपाई

गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई॥ सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी॥ ४ ॥

अर्थ:

गुह ने [इसी बीच] कुश और कोमल पत्तों की कोमल और सुन्दर साथरी सजाकर बिछा दी; और पवित्र, मीठे और कोमल देख-देखकर दोनों में भर-भरकर फल-मूल और पानी रख दिया [अथवा अपने हाथ से फल-मूल दोनों में भर-भरकर रख दिये]।

दोहा

सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ। सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ॥ ८९ ॥

अर्थ:

सीताजी, सुमन्त्रजी और भाई लक्ष्मणजी सहित कन्द-मूल-फल खाकर रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी लेट गये। भाई लक्ष्मणजी उनके पैर दबाने लगे।