लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीता से सुमंत्र का संवाद, सुमंत्र का लौटना
लक्ष्मण और निषाद के बीच गूढ़ विचारों से भरा संवाद होता है। सुमंत्र श्रीरामजी और सीताजी से आज्ञा लेकर भारी हृदय से अयोध्या लौटते हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण १६ / ४९
प्रकरण पाठ
उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी॥ कछुक दूरि सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन॥ १ ॥
अर्थ:
फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को सोते जानकर लक्ष्मणजी उठे और कोमल वाणी से मन्त्री सुमन्त्रजी को सोने के लिये कहकर वहाँ से कुछ दूर पर धनुष-बाण से सजकर, वीरासन से बैठकर जागने (पहरा देने) लगे।
भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा॥ मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे॥ ४ ॥
अर्थ:
महाराज दशरथजी का महल तो स्वभाव से ही सुन्दर है, इन्द्रभवन भी जिसकी समानता नहीं पा सकता। उसमें सुन्दर मणियों के रचे चौबारे (छत के ऊपर बँगले) हैं, जिन्हें मानो रति के पति कामदेव ने अपने ही हाथों सजाकर बनाया है;।
बिबिध बसन उपधान तुराईं। छीर फेन मृदु बिसद सुहाईं॥ तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं॥ १ ॥
अर्थ:
जहाँ [ओढ़ने-बिछाने के] अनेकों वस्त्र, तकिये और गद्दे हैं, जो दूध के फेन के समान कोमल, निर्मल (उज्वल) और सुन्दर हैं; वहाँ (उन चौबारों में) श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी रात को सोया करते थे और अपनी शोभा से रति और कामदेव के गर्व को हरण करते थे।
ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए॥ मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी॥ २ ॥
अर्थ:
वही श्रीसीता और श्रीरामजी आज घास-फूस की साथरी पर थके हुए बिना वस्त्र के ही सोये हैं। ऐसी दशा में वे देखे नहीं जाते। माता, पिता, कुटुम्बी, पुरवासी (प्रजा), मित्र, अच्छे शील-स्वभाव के दास और दासियाँ--।
जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाईं। महि सोवत तेइ राम गोसाईं॥ पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
सब जिनकी अपने प्राणों की तरह सार-सँभार करते थे, वही प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आज पृथ्वी पर सो रहे हैं। जिनके पिता जनकजी हैं, जिनका प्रभाव जगत् में प्रसिद्ध है; जिनके ससुर इन्द्र के मित्र रघुराज दशरथजी हैं।
रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही॥ सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू॥ ४ ॥
अर्थ:
और पति श्रीरामचन्द्रजी हैं, वही जानकीजी आज जमीन पर सो रही हैं। विधाता किसको प्रतिकूल नहीं होता! सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी क्या वन के योग्य हैं? लोग सच कहते हैं कि कर्म (भाग्य) ही प्रधान है।
होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा॥ सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू॥ ३ ॥
अर्थ:
विवेक होने पर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञान का नाश होने पर) श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रेम होता है। हे सखा! मन, वचन और कर्म से श्रीरामजी के चरणों में प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है।
राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा॥ सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी परमार्थस्वरूप (परमवस्तु) परब्रह्म हैं। वे अविगत (जानने में न आनेवाले), अलख (स्थूल दृष्टि से देखने में न आनेवाले), अनादि (आदिरहित), अनुपम (उपमारहित), सब विकारों से रहित और भेदशून्य हैं, वेद जिनका नित्य “नेति-नेति” कहकर निरूपण करते हैं।
सकल सौच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा॥ अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए॥ २ ॥
अर्थ:
शौच के सब कार्य करके [नित्य] पवित्र और सुजान श्रीरामचन्द्रजी ने स्नान किया। फिर वट का दूध मँगाया और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित उस दूध से सिर पर जटाएँ बनायीं। यह देखकर सुमन्त्रजी के नेत्रों में जल छा गया।
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें॥ सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें॥ १ ॥
अर्थ:
आप भी पिता के समान ही मेरे बड़े हितैषी हैं। हे तात! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ कि आपका भी सब प्रकार से वही कर्तव्य है जिसमें पिताजी हम लोगों के सोच में दुःख न पावें।
जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया॥ नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना॥ ४ ॥
अर्थ:
अतएव जिस तरह सीता अयोध्या को लौट आवें, तुमको और श्रीरामचन्द्रजी को वही उपाय करना चाहिये। नहीं तो मैं बिलकुल ही बिना सहारे का होकर वैसे ही नहीं जीऊँगा जैसे बिना जल के मछली नहीं जीती।
बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती॥ पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना॥ १ ॥
अर्थ:
राजा ने जिस तरह (जिस दीनता और प्रेम से) विनती की है, वह दीनता और प्रेम कहा नहीं जा सकता। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने पिता का सन्देश सुनकर सीताजी को करोड़ों (अनेक) प्रकार से सीख दी।
प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी॥ प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई॥ ३ ॥
अर्थ:
हे प्रभो! आप करुणामय और परम ज्ञानी हैं। [कृपा करके विचार कीजिए] शरीर को छोड़कर छाया अलग कैसे रोकी रह सकती है? सूर्य की प्रभा सूर्य को छोड़कर कहाँ जा सकती है? और चाँदनी चन्द्रमा को त्यागकर कहाँ जा सकती है?
पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई॥ तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी॥ ४ ॥
अर्थ:
इस प्रकार पति को प्रेममयी विनती सुनाकर सीताजी मन्त्री से सुहावनी वाणी कहने लगीं—आप मेरे पिताजी और ससुरजी के समान मेरा हित करनेवाले हैं। आपको मैं बदले में उत्तर देती हूँ, यह बहुत ही अनुचित है।
पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥ सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥ १ ॥
अर्थ:
मैंने पिताजी के ऐश्वर्य की छटा देखी है, जिनके चरण रखने की चौकी से सर्वशिरोमणि राजाओं के मुकुट मिलते हैं (अर्थात बड़े-बड़े राजा जिनके चरणों में प्रणाम करते हैं)। ऐसे पिताजी का घर, जो सब प्रकार के सुखों का भण्डार है, पति के बिना मेरे मन को भूलकर भी नहीं भाता।
ससुर एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू॥ बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा॥ ३ ॥
अर्थ:
ऐसे [ऐश्वर्यशाली] ससुर; [उनकी राजधानी] अयोध्या का निवास; प्रिय कुटुम्बी और माता के समान सासुएँ—ये कोई भी श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों की रज के बिना मुझे स्वप्न में भी सुखदायक नहीं लगते।
प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा॥ नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें॥ १ ॥
अर्थ:
वीरों में अग्रगण्य तथा धनुष और तरकश धारण किये मेरे प्राणनाथ और प्यारे देवर साथ हैं। इससे मुझे न रास्ते की थकावट है, न भ्रम है, और न मेरे मन में कोई दुःख ही है। आप मेरे लिये भूलकर भी सोच न करें।
सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी॥ नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना॥ २ ॥
अर्थ:
सुमन्त्र सीताजी की शीतल वाणी सुनकर ऐसे व्याकुल हो गये, जैसे साँप मणि खो जाने पर। नेत्रों से कुछ सूझता नहीं, कानों से सुनाई नहीं देता। वे बहुत व्याकुल हो गये, कुछ कह नहीं सकते।
राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। तदपि होति नहिं सीतलि छाती॥ जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे॥ ३ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी ने उनका बहुत प्रकार से समाधान किया। तो भी उनकी छाती ठंडी न हुई। साथ चलने के लिये मन्त्री ने अनेक यत्न किये (युक्तियाँ पेश कीं), पर रघुनन्दन श्रीरामजी [उन सब युक्तियों का] यथोचित उत्तर देते गये।
मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करमगति कछु न बसाई॥ राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी की आज्ञा मेटी नहीं जा सकती। कर्म की गति कठिन है, उस पर कुछ भी वश नहीं चलता। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी के चरणों में सिर नवाकर सुमन्त्र इस तरह लौटे जैसे कोई व्यापारी अपना मूलधन (पूँजी) गँवाकर लौटे।