श्रीसीता-राम-संवाद
श्रीरामजी सीताजी को अयोध्या में रहने को कहते हैं, पर सीताजी पति से वियोग स्वीकार नहीं करतीं। वे प्रेम, धर्म और सहधर्मिणी के कर्तव्य का निवेदन कर वनगमन का अपना निश्चय दृढ़ करती हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ९ / ४९
प्रकरण पाठ
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा॥ जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी॥ ३ ॥
अर्थ:
आदरपूर्वक सास-ससुर के चरणों की पूजा (सेवा) करने से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जब-जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेम से व्याकुल होने के कारण उनकी बुद्धि भोली हो जायगी (वे अपने-आपको भूल जायँगी),
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी॥ कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही॥ ४ ॥
अर्थ:
हे सुन्दरी ! तब-तब तुम कोमल वाणी से पुरानी कथाएँ कह-कहकर इन्हें समझाना। हे सुमुखि ! मुझे सैकड़ों सौगन्ध हैं, मैं यह स्वभाव से ही कहता हूँ कि मैं तुम्हें केवल माता के लिये ही घर पर रखता हूँ।
कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे॥ भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥ ४ ॥
अर्थ:
पर्वतों की गुफाएँ, खोह (दर्रे), नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देख तक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िए, सिंह और नाग ऐसे [भयानक] शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है।
ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा॥ डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥ २ ॥
अर्थ:
वन में भीषण सर्प, भयानक पक्षी और स्त्री-पुरुषों को चुराने वाले राक्षसों के झुंड-के-झुंड रहते हैं। वन की [भयंकरता] याद आने मात्र से धीर पुरुष भी डर जाते हैं। फिर हे मृगलोचनि! तुम तो स्वभाव से ही डरपोक हो!
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू॥ मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली॥ ३ ॥
अर्थ:
हे हंसगमनी! तुम वन के योग्य नहीं हो। तुम्हारे वन जाने की बात सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे (बुरा कहेंगे)। मानसरोवर के अमृत के समान जल से पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्र में जी सकती है?
उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही॥ बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी॥ २ ॥
अर्थ:
जानकीजी से कुछ उत्तर देते नहीं बनता, वे यह सोचकर व्याकुल हो उठीं कि मेरे पवित्र और प्रेमी स्वामी मुझे छोड़ जाना चाहते हैं। नेत्रों के जल (आँसुओं) को जबर्दस्ती रोककर धरती की कन्या सीताजी हृदय में धीरज धरकर,
जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते॥ तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू॥ २ ॥
अर्थ:
हे नाथ! जहाँ तक स्नेह और नाते हैं, पति के बिना स्त्री को सभी सूर्य से भी बढ़कर तपानेवाले हैं। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पति के बिना स्त्री के लिए यह सब शोक का समाज है।
जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥ नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें॥ ४ ॥
अर्थ:
जैसे बिना जीव के देह और बिना जल के नदी, वैसे ही हे नाथ! बिना पुरुष के स्त्री है। हे नाथ! आपके साथ रहकर आपका शरद् के निर्मल चन्द्रमा के समान मुख देखने से मुझे समस्त सुख प्राप्त होंगे।
कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू॥ छिनु छिनु प्रभुपद कमल बिलोकी। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी॥ २ ॥
अर्थ:
कन्द, मूल और फल ही अमृत के समान आहार होंगे और [वन के] पहाड़ ही अयोध्या के सैकड़ों राजमहलों के समान होंगे। क्षण-क्षण में प्रभु के चरणकमलों को देख-देखकर मैं ऐसी आनन्दित रहूँगी जैसी दिन में चकवी रहती है।
मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी॥ सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं॥ १ ॥
अर्थ:
क्षण-क्षण में आपके चरणकमलों को देखते रहने से मुझे मार्ग चलने में थकावट न होगी। हे प्रियतम! मैं सभी प्रकार से आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलने से होने वाली सारी थकावट को दूर कर दूँगी।
पाय पखारि बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं॥ श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें॥ २ ॥
अर्थ:
आपके पैर धोकर, पेड़ों की छाया में बैठकर, मन में प्रसन्न होकर हवा करूँगी (पंखा झलूँगी)। पसीने की बूँदों सहित श्याम शरीर को देखकर—प्राणपति के दर्शन करते हुए दुःख के लिए मुझे अवसर ही कहाँ रहेगा।
को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा॥ मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू॥ ४ ॥
अर्थ:
प्रभु के साथ [रहते] मेरी ओर [आँख उठाकर] देखने वाला कौन है? (अर्थात् कोई नहीं देख सकता!) जैसे सिंह की स्त्री (सिंहनी) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते। मैं सुकुमारी हूँ और नाथ वन के योग्य हैं? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय-भोग?
अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी॥ देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना॥ १ ॥
अर्थ:
ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गयीं। वे वचन के वियोग को भी न सँभाल सकीं। (अर्थात् शरीर से वियोग की बात तो अलग रही, वचन से भी वियोग की बात सुनकर वे अत्यन्त विकल हो गयीं) उनकी यह दशा देखकर श्रीरघुनाथजी ने अपने जी में जान लिया कि हठपूर्वक इन्हें यहाँ रखने से ये प्राणों को न रखेंगी।