श्रीसीता-राम-संवाद

श्रीरामजी सीताजी को अयोध्या में रहने को कहते हैं, पर सीताजी पति से वियोग स्वीकार नहीं करतीं। वे प्रेम, धर्म और सहधर्मिणी के कर्तव्य का निवेदन कर वनगमन का अपना निश्चय दृढ़ करती हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ९ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं॥ राजकुमारि सिखावनु सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥ १ ॥

अर्थ:

माता के सामने सीताजी से कुछ कहने में सकुचाते हैं। पर मन में यह समझकर कि यह समय ऐसा ही है, वे बोले--हे राजकुमारी ! मेरी सिखावन सुनो। मन में कुछ दूसरी तरह न समझ लेना।

चौपाई

आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू॥ आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई॥ २ ॥

अर्थ:

जो अपना और मेरा भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर रहो। हे भामिनी! मेरी आज्ञा का पालन होगा, सास की सेवा बन पड़ेगी। घर रहने में सभी प्रकार से भलाई है।

चौपाई

एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा॥ जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी॥ ३ ॥

अर्थ:

आदरपूर्वक सास-ससुर के चरणों की पूजा (सेवा) करने से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जब-जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेम से व्याकुल होने के कारण उनकी बुद्धि भोली हो जायगी (वे अपने-आपको भूल जायँगी),

चौपाई

तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी॥ कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही॥ ४ ॥

अर्थ:

हे सुन्दरी ! तब-तब तुम कोमल वाणी से पुरानी कथाएँ कह-कहकर इन्हें समझाना। हे सुमुखि ! मुझे सैकड़ों सौगन्ध हैं, मैं यह स्वभाव से ही कहता हूँ कि मैं तुम्हें केवल माता के लिये ही घर पर रखता हूँ।

दोहा

गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस। हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस॥ ६१ ॥

अर्थ:

[मेरी आज्ञा मानकर घर पर रहने से] गुरु और वेद के द्वारा सम्मत धर्म [के आचरण] का फल तुम्हें बिना ही क्लेश के मिल जाता है। किन्तु हठ के वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सब ने संकट ही सहे।

दोहा 62 के अंतर्गत
चौपाई

मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी॥ दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा॥ १ ॥

अर्थ:

हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो, मैं भी पिता के वचन को सत्य करके शीघ्र ही लौटूँगा। दिन बीतने में देर नहीं लगेगी। हे सुन्दरी! हमारी यह सीख सुनो!

चौपाई

जौं हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा॥ काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी॥ २ ॥

अर्थ:

हे वामा! यदि प्रेमवश हठ करोगी, तो तुम परिणाम में दुःख पाओगी। वन बड़ा कठिन (क्लेशदायक) और भयानक है। वहाँ की धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं।

चौपाई

कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥ चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे॥ ३ ॥

अर्थ:

रास्ते में कुश, काँट और बहुत-से कंकड़ हैं। उन पर बिना जूते के पैदल ही चलना होगा। तुम्हारे चरण-कमल कोमल और सुन्दर हैं और रास्ते में बड़े-बड़े दुर्गम पर्वत हैं।

चौपाई

कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे॥ भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥ ४ ॥

अर्थ:

पर्वतों की गुफाएँ, खोह (दर्रे), नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देख तक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िए, सिंह और नाग ऐसे [भयानक] शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है।

दोहा

भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल। ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल॥ ६२ ॥

अर्थ:

जमीन पर सोना, पेड़ों की छाल के वस्त्र पहनना और कंद, मूल, फल का भोजन करना होगा। और वे भी क्या सदा सब दिन मिलेंगे? सब कुछ अपने-अपने समय के अनुकूल ही मिल सकेगा।

दोहा 63 के अंतर्गत
चौपाई

नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं॥ लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी॥ १ ॥

अर्थ:

मनुष्यों को खाने वाले निशाचर (राक्षस) फिरते रहते हैं। वे करोड़ों प्रकार के कपट-रूप धारण कर लेते हैं। पहाड़ का पानी बहुत ही लगता है। वन की विपत्ति बखानी नहीं जा सकती।

चौपाई

ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा॥ डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥ २ ॥

अर्थ:

वन में भीषण सर्प, भयानक पक्षी और स्त्री-पुरुषों को चुराने वाले राक्षसों के झुंड-के-झुंड रहते हैं। वन की [भयंकरता] याद आने मात्र से धीर पुरुष भी डर जाते हैं। फिर हे मृगलोचनि! तुम तो स्वभाव से ही डरपोक हो!

चौपाई

हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू॥ मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली॥ ३ ॥

अर्थ:

हे हंसगमनी! तुम वन के योग्य नहीं हो। तुम्हारे वन जाने की बात सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे (बुरा कहेंगे)। मानसरोवर के अमृत के समान जल से पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्र में जी सकती है?

चौपाई

नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला॥ रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी॥ ४ ॥

अर्थ:

नवीन आम के वन में विहार करनेवाली कोयल क्या करील के जंगल में शोभा पाती है? हे चन्द्रमुखी! हृदय में ऐसा विचार कर तुम घर ही पर रहो। वन में बड़ा कष्ट है।

दोहा

सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि। सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि॥ ६३ ॥

अर्थ:

स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदय में भरपेट पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है।

दोहा 64 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के॥ सीतल सिख दाहक भइ कैसें। चकइहि सरद चंद निसि जैसें॥ १ ॥

अर्थ:

प्रियतम के कोमल तथा मनोहर वचन सुनकर सीताजी के सुन्दर नेत्र जल से भर गये। श्रीरामजी की यह शीतल सीख उनको कैसी जलानेवाली हुई, जैसे चकवी को शरद् ऋतु की चाँदनी रात होती है।

चौपाई

उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही॥ बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी॥ २ ॥

अर्थ:

जानकीजी से कुछ उत्तर देते नहीं बनता, वे यह सोचकर व्याकुल हो उठीं कि मेरे पवित्र और प्रेमी स्वामी मुझे छोड़ जाना चाहते हैं। नेत्रों के जल (आँसुओं) को जबर्दस्ती रोककर धरती की कन्या सीताजी हृदय में धीरज धरकर,

चौपाई

लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी॥ दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई॥ ३ ॥

अर्थ:

सास के पैर लगकर, हाथ जोड़कर कहने लगीं--हे देवि! मेरी इस बड़ी भारी ढिठाई को क्षमा कीजिये। मुझे प्राणपति ने वही शिक्षा दी है जिससे मेरा परम हित हो।

चौपाई

मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

परन्तु मैंने मन में समझकर देख लिया कि पति के वियोग के समान जगत में कोई दुःख नहीं है।

दोहा

प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान। तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान॥ ६४ ॥

अर्थ:

हे प्राणनाथ! हे करुणायतन! हे सुन्दर! हे सुखद! हे सुजान! हे रघुकुल-कुमुद के चन्द्रमा! आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिए नरक के समान है।

दोहा 65 के अंतर्गत
चौपाई

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुहृद समुदाई॥ सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई॥ १ ॥

अर्थ:

माता, पिता, बहन, प्यारा भाई, प्यारा परिवार, मित्रों का समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन (बन्धु-बान्धव), सहायक और सुन्दर, सुशील और सुख देनेवाला पुत्र--.

चौपाई

जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते॥ तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू॥ २ ॥

अर्थ:

हे नाथ! जहाँ तक स्नेह और नाते हैं, पति के बिना स्त्री को सभी सूर्य से भी बढ़कर तपानेवाले हैं। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पति के बिना स्त्री के लिए यह सब शोक का समाज है।

चौपाई

भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू॥ प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

भोग रोग के समान हैं, गहने भाररूप हैं और संसार यम-यातना (नरक की पीड़ा) के समान है। हे प्राणनाथ! आपके बिना जगत में मुझे कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है।

चौपाई

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥ नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें॥ ४ ॥

अर्थ:

जैसे बिना जीव के देह और बिना जल के नदी, वैसे ही हे नाथ! बिना पुरुष के स्त्री है। हे नाथ! आपके साथ रहकर आपका शरद् के निर्मल चन्द्रमा के समान मुख देखने से मुझे समस्त सुख प्राप्त होंगे।

दोहा

खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल। नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल॥ ६५ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपके साथ पक्षी और पशु ही मेरे कुटुम्बी होंगे, वन ही नगर और वृक्षों की छाल ही निर्मल वस्त्र होंगे और पर्णकुटी (पत्तों की बनी झोंपड़ी) ही स्वर्ग के समान सुखों की मूल होगी।

दोहा 66 के अंतर्गत
चौपाई

बनदेबीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा॥ कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई॥ १ ॥

अर्थ:

उदार हृदय के वनदेवी और वनदेवता ही सास-ससुर के समान मेरी सार-सँभार करेंगे, और कुशा और पत्तों की सुन्दर साथरी (बिछौना) ही प्रभु के साथ कामदेव की मनोहर तोशक के समान होगी।

चौपाई

कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू॥ छिनु छिनु प्रभुपद कमल बिलोकी। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी॥ २ ॥

अर्थ:

कन्द, मूल और फल ही अमृत के समान आहार होंगे और [वन के] पहाड़ ही अयोध्या के सैकड़ों राजमहलों के समान होंगे। क्षण-क्षण में प्रभु के चरणकमलों को देख-देखकर मैं ऐसी आनन्दित रहूँगी जैसी दिन में चकवी रहती है।

चौपाई

बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे॥ प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना॥ ३ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपने वन के बहुत-से दुःख और बहुत-से भय, विषाद और संताप कहे। परन्तु हे कृपानिधान! वे सब मिलकर भी प्रभु (आप) के वियोग [से होनेवाले दुःख] के लवलेश के समान भी नहीं हो सकते।

चौपाई

अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि॥ बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसा जी में जानकर, हे सुजानशिरोमणि! आप मुझे साथ ले लीजिये, यहाँ न छोड़िये। हे स्वामी! मैं अधिक क्या विनती करूँ? आप करुणामय हैं और सबके हृदय के अंदर की जाननेवाले हैं।

दोहा

राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान। दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान॥ ६६ ॥

अर्थ:

हे दीनबन्धु! हे सुन्दर! हे सुख देनेवाले! हे शील और प्रेम के भण्डार! यदि अवधि (चौदह वर्ष) तक मुझे अयोध्या में रखते हैं तो जान लीजिये कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे।

दोहा 67 के अंतर्गत
चौपाई

मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी॥ सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं॥ १ ॥

अर्थ:

क्षण-क्षण में आपके चरणकमलों को देखते रहने से मुझे मार्ग चलने में थकावट न होगी। हे प्रियतम! मैं सभी प्रकार से आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलने से होने वाली सारी थकावट को दूर कर दूँगी।

चौपाई

पाय पखारि बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं॥ श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें॥ २ ॥

अर्थ:

आपके पैर धोकर, पेड़ों की छाया में बैठकर, मन में प्रसन्न होकर हवा करूँगी (पंखा झलूँगी)। पसीने की बूँदों सहित श्याम शरीर को देखकर—प्राणपति के दर्शन करते हुए दुःख के लिए मुझे अवसर ही कहाँ रहेगा।

चौपाई

सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाय पलोटिहि सब निसि दासी॥ बार बार मृदु मूरति जोही। लागिहि तात बयारि न मोही॥ ३ ॥

अर्थ:

समतल भूमि पर घास और पेड़ों के पत्ते बिछाकर यह दासी रात भर आपके चरण दबाएगी। बार-बार आपकी कोमल मूर्ति को देखकर मुझको गरम हवा भी न लगेगी।

चौपाई

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा॥ मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू॥ ४ ॥

अर्थ:

प्रभु के साथ [रहते] मेरी ओर [आँख उठाकर] देखने वाला कौन है? (अर्थात् कोई नहीं देख सकता!) जैसे सिंह की स्त्री (सिंहनी) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते। मैं सुकुमारी हूँ और नाथ वन के योग्य हैं? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय-भोग?

दोहा

ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न हृदउ बिलगान। तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान॥ ६७ ॥

अर्थ:

ऐसे कठोर वचन सुनकर भी जब मेरा हृदय न फटा तो, हे प्रभु! [मालूम होता है] ये पामर प्राण आपके वियोग का भीषण दुःख सहेंगे।

दोहा 68 के अंतर्गत
चौपाई

अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी॥ देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गयीं। वे वचन के वियोग को भी न सँभाल सकीं। (अर्थात् शरीर से वियोग की बात तो अलग रही, वचन से भी वियोग की बात सुनकर वे अत्यन्त विकल हो गयीं) उनकी यह दशा देखकर श्रीरघुनाथजी ने अपने जी में जान लिया कि हठपूर्वक इन्हें यहाँ रखने से ये प्राणों को न रखेंगी।

चौपाई

कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा॥ नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू॥ २ ॥

अर्थ:

तब कृपालु, सूर्यकुल के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी ने कहा कि सोच छोड़कर मेरे साथ वन को चलो। आज विषाद करने का अवसर नहीं है। तुरंत वनगमन की तैयारी करो।