कौसल्या-सुनयना संवाद, श्रीसीताजी का शील

माता कौसल्या और सुनयना के बीच करुणा, धर्म और स्त्रीधर्म पर गहन संवाद होता है। इस वार्ता में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत की महिमा उजागर होती है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४३ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं॥ सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार सब मनोरथ कर रहे हैं। उनके प्रेमयुक्त वचन सुनते ही [सुनने वालों के] मनों को हर लेते हैं। उसी समय सीताजी की माता श्रीसुनयनाजी की भेजी हुई दासियाँ [कौसल्याजी आदि के मिलने का] सुन्दर अवसर देखकर आयीं।

चौपाई

सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू॥ कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी॥ २ ॥

अर्थ:

उनसे यह सुनकर कि सीता की सब सासुएँ इस समय फुरसत में हैं, जनकराज का रनिवास उनसे मिलने आया। कौसल्याजी ने आदरपूर्वक उनका सम्मान किया और समयोचित आसन लाकर दिये।

चौपाई

सीलु सनेहु सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा॥ पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन॥ ३ ॥

अर्थ:

दोनों ओर सबके शील और प्रेम को देखकर और सुनकर कठोर वज्र भी पिघल जाते हैं। शरीर पुलकित और शिथिल हैं और नेत्रों में [शोक और प्रेम के] आँसू हैं। सब अपने [पैरों के] नखों से जमीन कुरेदने और सोचने लगीं।

चौपाई

सब सिय राम प्रीति कि सि मूरति। जनु करुना बहु बेष बिसूरति॥ सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी॥ ४ ॥

अर्थ:

सभी श्रीसीतारामजी के प्रेम की मूर्ति-सी हैं, मानो स्वयं करुणा ही बहुत-से वेष (रूप) धारण करके विसूर रही हो (दुःख कर रही हो)। सीताजी की माता सुनयनाजी ने कहा-विधाता की बुद्धि बड़ी टेढ़ी है, जो दूध के फेन-जैसी कोमल वस्तु को वज्र की टाँकी से फोड़ रहा है (अर्थात्‌ जो अत्यन्त कोमल और निर्दोष हैं उन पर विपत्ति-पर-विपत्ति ढहा रहा है)।

दोहा

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल॥ २८१ ॥

अर्थ:

अमृत केवल सुनने में आता है और विष जहाँ-तहाँ प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। विधाता की सभी करतूतें भयडूर हैं। जहाँ-तहाँ कौए, उल्लू और बगुले ही [दिखायी देते] हैं; हंस तो एक मानसरोवर में ही है।

दोहा 282 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा॥ जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बालकेलि सम बिधि मति भोरी॥ १ ॥

अर्थ:

यह सुनकर देवी सुमित्राजी शोक के साथ कहने लगीं--विधाता की चाल बड़ी ही विपरीत और विचित्र है, जो सृष्टि को उत्पन्न करके पालता है और फिर नष्ट कर डालता है। विधाता की बुद्धि बालकों के खेल के समान भोली (विवेकशून्य) है।

चौपाई

कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू॥ कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता॥ २ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी ने कहा--किसी का दोष नहीं है; दुःख-सुख, हानि-लाभ सब कर्म के अधीन हैं। कर्म की गति कठिन (दुर्विज्ञेय) है, उसे विधाता ही जानता है, जो शुभ और अशुभ सभी फलों का देनेवाला है।

चौपाई

ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें॥ देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी॥ ३ ॥

अर्थ:

ईश्वर की आज्ञा सभी के सिर पर है। उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और लय (संहार) तथा अमृत और विष के भी सिर पर है (ये सब भी उसी के अधीन हैं)। हे देवि! मोह वश सोच करना व्यर्थ है। विधाता का प्रपञ्च ऐसा ही अचल और अनादि है।

चौपाई

भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी॥ सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी॥ ४ ॥

अर्थ:

महाराज के मरने और जीने की बात को हृदय में याद करके जो चिन्ता करती हैं, वह तो हे सखी ! हम अपने ही हित की हानि देखकर (स्वार्थवश) करती हैं। सीताजी की माता ने कहा--आपका कथन उत्तम और सत्य है। आप पुण्यात्माओं की सीमारूप अवधपति (महाराज दशरथजी) की ही तो रानी हैं। [फिर, भला ऐसा क्यों न कहेंगी]।

दोहा

लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु। गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु॥ २८२ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी ने दुःखभरे हृदय से कहा--श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वन में जायें, इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरत की चिन्ता है।

दोहा 283 के अंतर्गत
चौपाई

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी॥ राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥ १ ॥

अर्थ:

ईश्वर के अनुग्रह और आपके आशीर्वाद से मेरे [चारों] पुत्र और [चारों] बहुएँ गंगाजी के जल के समान पवित्र हैं। हे सखी ! मैंने कभी श्रीरामजी की शपथ नहीं की, सो आज श्रीरामजी की शपथ करके सत्य भाव से कहती हूँ--।

चौपाई

भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई॥ कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥ २ ॥

अर्थ:

भरत के शील, गुण, विनय, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और भलाई का वर्णन करने में सरस्वतीजी की बुद्धि भी हिचकती है। सीप से कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं ?।

चौपाई

जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा॥ कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ॥ ३ ॥

अर्थ:

मैं भरत को सदा कुल का दीपक जानती हूँ। महाराज ने भी बार-बार मुझे यही कहा था। सोना कसौटी पर कसे जाने पर और रत्न पारखी (जौहरी) के मिलने पर ही पहचाना जाता है। वैसे ही पुरुष की परीक्षा समय पड़ने पर उसके स्वभाव से ही (उसका चरित्र देखकर) हो जाती है।

चौपाई

अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा॥ सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी॥ ४ ॥

अर्थ:

किन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है। शोक और स्नेह में सयानापन (विवेक) कम हो जाता है (लोग कहेंगे कि मैं स्नेहवश भरत की बड़ाई कर रही हूँ)। कौसल्याजी की गड़ाजी के समान पवित्र करनेवाली वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेह के मारे विकल हो उठीं।

दोहा

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि। को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि॥ २८३ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी ने फिर धीरज धरकर कहा-हे देवि मिथिलेशि! सुनिये, ज्ञान के भण्डार श्रीजनकजी की प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है ?।

दोहा 284 के अंतर्गत
चौपाई

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई॥ रखिअहिं लखनु भरतु गवनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन॥ १ ॥

अर्थ:

हे रानी! मौका पाकर आप राजा को अपनी ओर से जहाँ तक हो सके समझाकर कहियेगा कि लक्ष्मण को घर रख लिया जाय और भरत वन को जायें। यदि यह राय राजा के मन में [ठीक] जँच जाय,।

चौपाई

तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सोचु भरत कर भारी॥ गूढ़ सनेह भरत मन माहीं। रहें नीक मोहि लागत नाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

तो भलीभाँति खूब विचारकर ऐसा यत्न करें। मुझे भरत का अत्यधिक सोच है। भरत के मन में गूढ़ प्रेम है। उनके घर रहने में मुझे भलाई नहीं जान पड़ती (यह डर लगता है कि उनके प्राणों को कोई भय न हो जाय)।

चौपाई

लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी॥ नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि॥ ३ ॥

अर्थ:

कौसल्याजीका स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणी को सुनकर सब रानियाँ करुणरस में निमग्र हो गयीं। आकाश से पुष्पवर्षा की झड़ी लग गयी और धन्य-धन्य की ध्वनि होने लगी। सिद्ध, योगी और मुनि स्नेह से शिथिल हो गये।

चौपाई

सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ॥ देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनि उठी सप्रीती॥ ४ ॥

अर्थ:

सारा रनिवास देखकर थकित रह गया (निस्तब्ध हो गया), तब सुमित्राजी ने धीरज धरके कहा कि हे देवि! दो घड़ी रात बीत गयी है। यह सुनकर श्रीरामजी की माता कौसल्याजी प्रेमपूर्वक उठीं।

दोहा

बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय। हमरें तौ अब ईस गति कै मिथिलेस सहाय॥ २८४ ॥

अर्थ:

और प्रेमसहित सद्भावसे बोलीं--अब आप शीघ्र डेरे को पधारिये। हमारे तो अब ईश्वर ही गति हैं, अथवा मिथिलेश्वर जनकजी सहायक हैं।

दोहा 285 के अंतर्गत
चौपाई

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता॥ देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी॥ १ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी के प्रेम को देखकर और उनके विनम्र वचनों को सुनकर जनकजी की प्रिय पत्नी ने उनके पवित्र चरण पकड़ लिये और कहा--हे देवि! आप राजा दशरथजी की रानी और श्रीरामजी की माता हैं। आपकी ऐसी नम्रता उचित ही है।

चौपाई

प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं॥ सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी॥ २ ॥

अर्थ:

प्रभु अपने नीच जनों का भी आदर करते हैं। अग्नि धुएँ को और पर्वत तृण (घास) को अपने सिर पर धारण करते हैं। हमारे राजा तो कर्म, मन और वाणी से आपके सेवक हैं और सदा सहायक तो श्रीमहादेव-पार्वतीजी हैं।

चौपाई

रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै॥ रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू॥ ३ ॥

अर्थ:

आपके सहायक होने योग्य जगत में कौन है ? दीपक सूर्य की सहायता करने जाकर कहीं शोभा पा सकता है? श्रीरामचन्द्रजी वन में जाकर देवताओं का कार्य करके अवधपुरी में अचल राज्य करेंगे।

चौपाई

अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपनें थल॥ यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा॥ ४ ॥

अर्थ:

देवता, नाग और मनुष्य सब श्रीरामचन्द्रजी की भुजाओं के बल पर अपने-अपने स्थानों (लोकों) में सुखपूर्वक बसेंगे। यह सब याज्ञवल्क्य मुनि ने पहले ही से कह रखा है। हे देवि! मुनि का कथन व्यर्थ (झूठा) नहीं हो सकता।

दोहा

अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ। सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ॥ २८५ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर बड़े प्रेम से पैरों पड़कर सीताजी [को साथ भेजने] के लिये विनती करके और सुन्दर आज्ञा पाकर तब सीताजी समेत सीताजी की माता डेरे को चलीं।

दोहा 286 के अंतर्गत
चौपाई

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही॥ तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी॥ १ ॥

अर्थ:

जानकीजी अपने प्यारे कुटुम्बियों से--जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं। जानकीजी को तपस्विनी के वेष में देखकर सभी शोक से अत्यन्त व्याकुल हो गये।

चौपाई

जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई॥ लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुनि पावन पेम प्रान की॥ २ ॥

अर्थ:

जनकजी श्रीरामजी के गुरु वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर डेरे को चले और आकर उन्होंने सीताजी को देखा। जनकजी ने अपने पवित्र प्रेम और प्राणों की पाहुनी जानकीजी को हृदय से लगा लिया।

चौपाई

उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू॥ सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा॥ ३ ॥

अर्थ:

उनके हृदय में [वात्सल्य] प्रेम का समुद्र उमड़ पड़ा। राजा का मन मानो प्रयाग हो गया। उस समुद्र के अंदर उन्होंने [आदिशक्ति] सीताजी के [अलौकिक] स्नेहरूपी अक्षयवट को बढ़ते हुए देखा। उस (सीताजी के प्रेमरूपी बट) पर श्रीरामजी का प्रेमरूपी बालक (बालरूपधारी भगवान्) सुशोभित हो रहा है।

चौपाई

चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु॥ मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की॥ ४ ॥

अर्थ:

जनकजी का ज्ञानरूपी चिरंजीवी मुनि व्याकुल होकर डूबते-डूबते मानो उस श्रीराम-प्रेमरूपी बालक का सहारा पाकर बच गया। वस्तुतः [ज्ञानिशिरोमणि] विदेहराज की बुद्धि मोह में मग्न नहीं है। यह तो श्रीसीतारामजी के प्रेम की महिमा है [जिसने उन-जैसे महान् ज्ञानी के ज्ञान को भी विकल कर दिया]।

दोहा

सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि। धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि॥ २८६ ॥

अर्थ:

पिता-माता के प्रेम के मारे सीताजी ऐसी विकल हो गयीं कि अपने को सँभाल न सकीं। [परन्तु परम धैर्यवती] पृथ्वी की कन्या सीताजी ने समय और सुन्दर धर्म का विचार कर धैर्य धारण किया।

दोहा 287 के अंतर्गत
चौपाई

तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी॥ पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ॥ १ ॥

अर्थ:

सीताजी को तपस्विनी-वेष में देखकर जनकजी को विशेष प्रेम और सन्तोष हुआ। [उन्होंने कहा-] बेटी! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिये। तेरे निर्मल यश से सारा जगत् उज्ज्वल हो रहा है; ऐसा सब कोई कहते हैं।

चौपाई

जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी॥ गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे॥ २ ॥

अर्थ:

तेरी कीर्तिरूपी नदी देवनदी गंगाजी को भी जीतकर [जो एक ही ब्रह्माण्ड में बहती है] करोड़ों ब्रह्माण्डों में बह चली है। गंगाजी ने तो पृथ्वी पर तीन ही स्थानों (हरिद्वार, प्रयागराज और गंगासागर) को बड़ा (तीर्थ) बनाया है। पर तेरी इस कीर्तिनदी ने तो अनेकों संतसमाजरूपी तीर्थस्थान बना दिये हैं।

चौपाई

पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी॥ पुनि पितु मातु लीन्हि उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई॥ ३ ॥

अर्थ:

पिता जनकजी ने तो स्नेह से सच्ची सुन्दर वाणी कही। परन्तु अपनी बड़ाई सुनकर सीताजी मानो संकोच में समा गयीं। पिता-माता ने उन्हें फिर हृदय से लगा लिया और हितभरी सुन्दर सीख और आशीष दी।

चौपाई

कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं॥ लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

सीताजी कुछ कहती नहीं हैं, परन्तु मन में सकुचा रही हैं कि रात में [सासुओं की सेवा छोड़कर] यहाँ रहना अच्छा नहीं है। रानी सुननयनाजी ने जानकीजी का रुख देखकर (उनके मन की बात समझकर) राजा जनकजी को जना दिया। तब दोनों अपने हृदयों में सीताजी के शील और स्वभाव की सराहना करने लगे।

दोहा

बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि॥ २८७ ॥

अर्थ:

राजा-रानी ने बार-बार मिलकर और हृदय से लगाकर तथा सम्मान करके सीताजी को विदा किया। चतुर रानी ने समय पाकर राजा से सुन्दर वाणी में भरतजी की दशा का वर्णन किया।