वन मार्ग में तापस से भेंट
वनमार्ग में एक तापस से भेंट होती है, जो प्रभु के दर्शन से धन्य हो उठता है। यह संक्षिप्त मिलन भी भक्ति की गहराई और प्रभु-कृपा को उजागर करता है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण १९ / ४९
प्रकरण पाठ
तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा॥ कबि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी॥ ४ ॥
अर्थ:
उसी अवसर पर वहाँ एक तपस्वी आया, जो तेजपुंज, छोटी अवस्था का और सुन्दर था। उसकी गति कवियों को नहीं मालूम [अथवा वह तपस्वी था जो अपना परिचय नहीं देना चाहता]। वह वैरागी के वेष में था और मन, वचन तथा कर्म से श्रीरामचन्द्रजी का अनुरागी था।
राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा॥ मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरें तन कह सबु कोऊ॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी ने प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसको हृदय से लगा लिया। [उसे इतना आनन्द हुआ] मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो। सब कोई [देखनेवाले] कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ (परम तत्त्व) दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हैं।
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा॥ पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा॥ २ ॥
अर्थ:
फिर वह लक्ष्मणजी के चरणों लगा। उन्होंने प्रेम से उमड़कर उसको उठा लिया। फिर उसने सीताजी की चरणधूलि को अपने सिर पर धारण किया। माता सीताजी ने भी उसको अपना छोटा बच्चा जानकर आशीर्वाद दिया।
कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही॥ पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा॥ ३ ॥
अर्थ:
फिर निषादराज ने उसकी दण्डवत की। श्रीरामचन्द्रजी के प्रेमी को देखकर वह उससे आनन्दित होकर मिला। वह तपस्वी अपने नेत्ररूपी पटलों से रामजी की सौन्दर्य-सुधा का पान करने लगा और ऐसा आनन्दित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी स्वादिष्ट भोजन पाकर आनन्दित होता है।
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥ राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी॥ ४ ॥
अर्थ:
[इधर गाँव की स्त्रियाँ कह रही हैं—] हे सखी! कहो तो, वे माता-पिता कैसे हैं जिन्होंने ऐसे (सुन्दर, सुकुमार) बालकों को वन में भेज दिया है। श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी के रूप को देखकर सब स्त्री-पुरुष स्नेह से व्याकुल हो जाते हैं।