भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार

महर्षि भरद्वाज अपने तपबल और दिव्य सामर्थ्य से भरतजी तथा उनके साथ आए सब लोगों का अद्भुत सत्कार करते हैं। ऋषि की कृपा से वन आश्रम भी राजसी अतिथि सेवा का रूप ले लेता है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३३ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सुनि मुनि बचन भरत हियँ सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू॥ जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी॥ १ ॥

अर्थ:

मुनि के वचन सुनकर भरत के हृदय में सोच हुआ कि यह बेमौके बड़ा बेढब संकोच आ पड़ा! फिर गुरुजनों की वाणी को महत्त्वपूर्ण (आदरणीय) समझकर, चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले--।

चौपाई

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा॥ भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए॥ २ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपकी आज्ञा को सिर चढ़ाकर उसका पालन करना, यह हमारा परम धर्म है। भरतजी के ये वचन मुनिश्रेष्ठ के मन को अच्छे लगे। उन्होंने विश्वासपात्र सेवकों और शिष्यों को पास बुलाया।

चौपाई

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई॥ भलेहिं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए॥ ३ ॥

अर्थ:

[और कहा कि] भरत की पहुनाई करनी चाहिये। जाकर कन्द, मूल और फल लाओ। उन्होंने “हे नाथ! बहुत अच्छा” कहकर सिर नवाया और तब वे बड़े आनन्दित होकर अपने-अपने काम को चल दिये।

चौपाई

मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता॥ सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं। आयसु होइ सो करहिं गोसाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनि को चिन्ता हुई कि हमने बहुत बड़े मेहमान को न्योता है। अब जैसा देवता हो, वैसी ही उसकी पूजा भी होनी चाहिये। यह सुनकर ऋद्धियाँ और अणिमादि सिद्धियाँ आ गयीं [और बोलीं--] हे गोसाईं! जो आपकी आज्ञा हो सो हम करें।

दोहा

राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज। पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज॥ २१३ ॥

अर्थ:

मुनिराज ने प्रसन्न होकर कहा--छोटे भाई शत्रुघ्न और समाज सहित भरतजी श्रीरामचन्द्रजी के विरह में व्याकुल हैं, इन की पहुनाई करके इन के श्रम को दूर करो।

दोहा 214 के अंतर्गत
चौपाई

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी॥ कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई॥ १ ॥

अर्थ:

ऋद्धि-सिद्धिने मुनिवर की वाणी को सिर चढ़ाकर अपनेको बड़भागिनी समझा। सब सिद्धियाँ आपसमें कहने लगीं--श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई भरत ऐसे अतिथि हैं, जिनकी तुलना में कोई नहीं आ सकता।

चौपाई

मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू॥ अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना॥ २ ॥

अर्थ:

अतः मुनि के चरणों की वन्दना करके आज वही करना चाहिये जिससे सारा राज-समाज सुखी हो। ऐसा कहकर उन्होंने बहुत-से सुन्दर घर बनाये, जिन्हें देखकर विमान भी विलखते हैं (लजा जाते हैं)।

चौपाई

भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे॥ दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें॥ ३ ॥

अर्थ:

उन घरों में बहुत-से भोग (इन्द्रियों के विषय) और ऐश्वर्य (ठाट-बाट) का सामान भरकर रख दिया, जिन्हें देखकर देवता भी ललचा गये। दासी-दास सब प्रकार की सामग्री लिये हुए मन लगाकर उनके मनों को देखते रहते हैं (अर्थात्‌ उनके मन की रुचि के अनुसार करते रहते हैं)।

चौपाई

सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं॥ प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही॥ ४ ॥

अर्थ:

जो सुख के सामान स्वर्ग में भी स्वप्न में भी नहीं हैं, ऐसे सब सामान सिद्धियों ने पलभर में सज दिये। पहले तो उन्होंने सब किसी को, जिसकी जैसी रुचि थी वैसे ही, सुन्दर सुखदायक निवासस्थान दिये।

दोहा

बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह। बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह॥ २१४ ॥

अर्थ:

और फिर कुटुम्ब सहित भरतजी को दिये, क्योंकि ऋषि भरद्वाजजी ने ऐसी ही आज्ञा दे रखी थी। [भरतजी चाहते थे कि उनके सब संगियों को आराम मिले, इसलिये उनके मन की बात जानकर मुनि ने पहले उन लोगों को स्थान देकर पीछे सपरिवार भरतजी को स्थान देने के लिये आज्ञा दी थी।] मुनिश्रेष्ठ ने तपोबल से ब्रह्मा को भी चकित कर देनेवाला वैभव रच दिया।

दोहा 215 के अंतर्गत
चौपाई

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका॥ सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी॥ १ ॥

अर्थ:

जब भरतजी ने मुनि के प्रभाव को देखा तो उसके सामने उन्हें [इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर आदि] सभी लोकपालों के लोक तुच्छ जान पड़े। सुख की सामग्री का वर्णन नहीं हो सकता, जिसे देखकर ज्ञानी लोग भी वैराग्य भूल जाते हैं।

चौपाई

आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना॥ सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना॥ २ ॥

अर्थ:

आसन, सेज, सुन्दर वस्त्र, चँदोवे, वन, बगीचे, भाँति-भाँति के पक्षी और पशु, सुगन्धित फूल और अमृत के समान स्वादिष्ट फल, अनेकों प्रकार के (तालाब, कुएँ, बावली आदि) निर्मल जलाशय थे।

चौपाई

असन पान सुचि अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से॥ सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें॥ ३ ॥

अर्थ:

तथा अमृत के भी अमृत-सरीखे पवित्र खान-पान के पदार्थ थे, जिन्हें देखकर सब लोग संयमी पुरुषों (विरक्त मुनियों) की भाँति सकुचा रहे हैं। सभी के डेरों में [मनोवांछित वस्तु देनेवाले] कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें देखकर इन्द्र और इन्द्राणी को भी अभिलाषा होती है (उनका भी मन ललचा जाता है)।

चौपाई

रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी॥ स्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा॥ ४ ॥

अर्थ:

वसन्त-ऋतु है। शीतल, मन्द, सुगन्ध तीन प्रकार की हवा बह रही है। सभी को [धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष] चारों पदार्थ सुलभ हैं। माला, चन्दन, स्त्री आदिक भोगों को देखकर सब लोग हर्ष और विषाद के वश हो रहे हैं। [हर्ष तो भोग-सामग्रियों को और मुनि के तपःप्रभाव को देखकर होता है और विषाद इस बात से होता है कि श्रीराम के वियोग में नियम-व्रत से रहनेवाले हम लोग भोग-विलास में क्यों आ फँसे; कहीं इनमें आसक्त होकर हमारा मन नियम-व्रतों को न त्याग दे]।

दोहा

संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार। तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार॥ २१५ ॥

अर्थ:

सम्पत्ति (भोग-विलास की सामग्री) चकवी है और भरतजी चकवा हैं और मुनि की आज्ञा खेल है, जिसने उस रात को आश्रमरूपी पिंजड़े में दोनों को बंद कर रखा और ऐसे ही सबेरा हो गया। [जैसे किसी बहेलिये के द्वारा एक पिंजड़े में रखे जाने पर भी चकवी-चकवे का रात को संयोग नहीं होता, वैसे ही भरद्वाजजी की आज्ञा से रातभर भोग-सामग्रियों के साथ रहने पर भी भरतजी ने मन से भी उनका स्पर्श तक नहीं किया।]

दोहा 216 के अंतर्गत
चौपाई

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा॥ रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी॥ १ ॥

अर्थ:

[प्रातःकाल] भरतजी ने तीर्थराज में स्नान किया और समाज सहित मुनि को सिर नवाकर और ऋषि की आज्ञा तथा आशीर्वाद को सिर चढ़ाकर दण्डवत् करके बहुत विनती की।

चौपाई

पथ गति कुसल साथ सब लीन्हें। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें॥ रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू॥ २ ॥

अर्थ:

तदनन्तर रास्ते की पहचान रखनेवाले लोगों (कुशल पथप्रदर्शकों) के साथ सब लोगों को लिये हुए भरतजी चित्रकूट में चित्त लगाये चले। भरतजी रामसखा गुह के हाथ में हाथ दिये हुए ऐसे जा रहे हैं, मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये हुए हो।

चौपाई

नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया॥ लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी॥ ३ ॥

अर्थ:

न तो उनके पैरों में जूते हैं और न सिर पर छाया है। उनका प्रेम, नियम, व्रत और धर्म निष्कपट (सच्चा) है। वे सखा निषादराज से लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी के रास्ते की बातें पूछते हैं, और वह कोमल वाणी से कहता है।

चौपाई

राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकें॥ देखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के ठहरने की जगहों और वृक्षों को देखकर उनके हृदय में प्रेम रोके नहीं रुकता। भरतजी की यह दशा देखकर देवता फूल बरसाने लगे। पृथ्वी कोमल हो गयी और मार्ग मंगल का मूल बन गया।

दोहा

किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात। तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात॥ २१६ ॥

अर्थ:

बादल छाया किये जा रहे हैं, सुख देनेवाली सुन्दर हवा बह रही है। भरतजी के जाते समय मार्ग जैसा सुखदायक हुआ, वैसा श्रीरामचन्द्रजी को भी नहीं हुआ था।

दोहा 217 के अंतर्गत
चौपाई

जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे॥ ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू॥ १ ॥

अर्थ:

रास्ते में असंख्य जड़-चेतन जीव थे। उनमें से जिनको प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने देखा, अथवा जिन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को देखा वे सब [उसी समय] परमपद के अधिकारी हो गये। परन्तु अब भरतजी के दर्शन ने तो उनका भव (जन्म-मरण)-रूपी रोग मिटा ही दिया। [श्रीराम-दर्शन से तो वे परमपद के अधिकारी ही हुए थे, परन्तु भरत-दर्शन से उन्हें वह परमपद प्राप्त हो गया]।

चौपाई

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं॥ बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ॥ २ ॥

अर्थ:

भरतजी के लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है, जिन्हें श्रीरामजी स्वयं अपने मन में स्मरण करते रहते हैं। जगत् में जो भी मनुष्य एक बार “राम” कह लेते हैं, वे भी तरने-तारनेवाले हो जाते हैं !।

चौपाई

भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता॥ सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर भरतजी तो श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे तथा उनके छोटे भाई ठहरे। तब भला उनके लिये मार्ग मंगलदायक कैसे न हो? सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि ऐसा कह रहे हैं और भरतजी को देखकर हृदय में हर्ष पाते हैं।