श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद

लक्ष्मणजी श्रीरामजी के साथ वन जाने का आग्रह करते हैं और सेवा को अपना परम सौभाग्य मानते हैं। श्रीरामजी उन्हें संयम और कर्तव्य की शिक्षा देते हैं, पर अंततः उनका प्रेम विजयी होता है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ११ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए॥ कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा॥ १ ॥

अर्थ:

जब लक्ष्मणजी ने ये समाचार पाए, तब वे व्याकुल होकर उदास-मुँह उठ दौड़े। शरीर काँप रहा है, रोमाञ्च हो रहा है, नेत्र आँसुओं से भरे हैं। प्रेम से अत्यन्त अधीर होकर उन्होंने श्रीरामजी के चरण पकड़ लिये।

चौपाई

कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े॥ सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृतु सिरान हमारा॥ २ ॥

अर्थ:

वे कुछ कह नहीं सकते, खड़े-खड़े देख रहे हैं। [ऐसे दीन हो रहे हैं मानो जल से निकाली गई मछली हो।] हृदय में यह सोच है कि हे विधाता! क्या होनेवाला है? क्या हमारा सब सुख और पुण्य पूरा हो गया?

चौपाई

मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा॥ राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें॥ ३ ॥

अर्थ:

मुझको श्रीरघुनाथजी क्या कहेंगे? घर पर रखेंगे या साथ ले चलेंगे? श्रीरामचन्द्रजी ने भाई लक्ष्मण को हाथ जोड़े और शरीर तथा घर सभी से नाता तोड़े हुए खड़ा देखा।

चौपाई

बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर॥ तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू॥ ४ ॥

अर्थ:

तब नीति में निपुण और शील, स्नेह, सरलता और सुख के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी वचन बोले—हे तात! परिणाम में होने वाले आनन्द को हृदय में समझकर तुम प्रेमवश अधीर मत होओ।

दोहा

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ॥ ७० ॥

अर्थ:

जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामी की सीख को स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेने का लाभ पाया है; नहीं तो जगत में जन्म व्यर्थ है।

दोहा 71 के अंतर्गत
चौपाई

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई॥ भवन भरतु रिपुसूदनु नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं॥ १ ॥

अर्थ:

हे भाई! हृदय में ऐसा जानकर मेरी सीख सुनो और माता-पिता के चरणों की सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घर पर नहीं हैं, महाराज वृद्ध हैं और उनके मन में मेरा दुःख है।

चौपाई

मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा॥ गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू॥ २ ॥

अर्थ:

इस अवस्था में मैं तुमको साथ लेकर वन जाऊँ तो अयोध्या सभी प्रकार से अनाथ हो जायगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार सभी पर दुःख का दुःसह भार आ पड़ेगा।

चौपाई

रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू॥ जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥ ३ ॥

अर्थ:

अतः तुम यहीं रहो और सब का सन्तोष करते रहो। नहीं तो हे तात! बड़ा दोष होगा। जिसके राज्य में प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है।

चौपाई

रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी॥ सिअरें बचन सूखि गए कैसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें॥ ४ ॥

अर्थ:

हे तात! ऐसी नीति विचारकर तुम घर रह जाओ। यह सुनते ही लक्ष्मणजी बहुत ही व्याकुल हो गये। इन शीतल वचनों से वे कैसे सूख गये, जैसे पाले के स्पर्श से कमल सूख जाता है!

दोहा

उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ। नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ॥ ७१ ॥

अर्थ:

प्रेमवश लक्ष्मणजी से कुछ उत्तर देते नहीं बनता। उन्होंने व्याकुल होकर श्रीरामजी के चरण पकड़ लिये और कहा—हे नाथ! मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं; अतः आप मुझे छोड़ ही दें तो मेरा क्या वश है?

दोहा 72 के अंतर्गत
चौपाई

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं॥ नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी॥ १ ॥

अर्थ:

हे स्वामी! आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मुझे अपनी कायरता से वह मेरे लिए अगम (पहुंच के बाहर) लगी। शास्त्र और नीति के तो वे ही श्रेष्ठ पुरुष अधिकारी हैं जो धीर हैं और धर्म की धुरी को धारण करने वाले हैं।

चौपाई

मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला॥ गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू॥ २ ॥

अर्थ:

मैं तो प्रभु (आप) के स्नेह में पला हुआ छोटा बच्चा हूँ! क्या हंस भी मन्दराचल या सुमेरु पर्वत को उठा सकते हैं! हे नाथ! स्वभाव से ही कहता हूँ, आप विश्वास करें, मैं गुरु, पिता, माता किसी को भी नहीं जानता।

चौपाई

जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई॥ मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी॥ ३ ॥

अर्थ:

जगत में जहाँ तक स्नेह का सम्बन्ध, प्रेम और विश्वास है, जिनको स्वयं वेद ने गाया है—हे स्वामी! हे दीनबंधु! हे सब के हृदय के अंदर की जानने वाले! मेरे तो वे सब कुछ केवल आप ही हैं।

चौपाई

धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही॥ मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई॥ ४ ॥

अर्थ:

धर्म और नीति का उपदेश तो उसको करना चाहिए जिसे कीर्ति, विभूति (ऐश्वर्य) या सुगति प्रिय हो। किन्तु जो मन, वचन और कर्म से चरणों में ही प्रेम रखता हो, हे कृपासिन्धु! क्या वह भी त्यागने के योग्य है?

दोहा

करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन बिनीत। समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत॥ ७२ ॥

अर्थ:

दयाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी ने भले भाई के कोमल और नम्रतायुक्त वचन सुनकर और उन्हें स्नेह के कारण डरे हुए जानकर, हृदय से लगाकर समझाया।

दोहा 73 के अंतर्गत
चौपाई

मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई॥ मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी॥ १ ॥

अर्थ:

[और कहा—] हे भाई! जाकर माता से विदा माँग आओ और जल्दी वन को चलो! रघुकुल में श्रेष्ठ श्रीरघुबरजी की वाणी सुनकर लक्ष्मणजी आनन्दित हो गये। बड़ी हानि दूर हो गयी और बड़ा लाभ हुआ!

चौपाई

हरषित हृदयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए॥ जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा॥ २ ॥

अर्थ:

वे हर्षित हृदय से माता सुमित्राजी के पास आये, मानो अंधा फिर से नेत्र पा गया हो। उन्होंने जाकर माता के चरणों में मस्तक नवाया। किन्तु उनका मन रघुकुल को आनन्द देने वाले श्रीरामजी और जानकीजी के साथ था।

चौपाई

पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी॥ गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा॥ ३ ॥

अर्थ:

माता ने उदास मन देखकर उनसे [कारण] पूछा। लक्ष्मणजी ने सब कथा विस्तार से कह सुनायी। सुमित्राजी कठोर वचनों को सुनकर ऐसी सहम गयीं जैसे हिरनी चारों ओर वन-दाव देखकर सहम जाती है।

चौपाई

लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू॥ मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

लक्ष्मण ने देखा कि आज अनर्थ हुआ। ये स्नेह वश काम बिगाड़ देंगी! इसलिये वे विदा माँगते हुए भय से सकुचाते हैं [और मन-ही-मन सोचते हैं] कि जाकर [माता] साथ जाने को कहेंगी कि नहीं।

दोहा

समुझि सुमित्राँ राम सिय रूपु सुसीलु सुभाउ। नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ॥ ७३ ॥

अर्थ:

सुमित्राजी ने श्रीरामजी और श्रीसीताजी के रूप, सुशील और स्वभाव को समझकर और राजा का प्रेम देखकर अपना सिर धुन लिया और कहा कि पापिनी कैकेयी ने बुरा दाँव लगाया।