श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद
लक्ष्मणजी माता सुमित्रा से आज्ञा लेते हैं। सुमित्राजी उन्हें यही शिक्षा देती हैं कि राम और सीता की सेवा ही उनके जीवन का सच्चा धर्म है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण १२ / ४९
प्रकरण पाठ
धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुहृद बोली मृदु बानी॥ तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही॥ १ ॥
अर्थ:
परन्तु कुसमय जानकर धैर्य धारण किया और स्वभाव से ही हित चाहने वाली सुमित्राजी कोमल वाणी से बोलीं—हे तात! जानकीजी तुम्हारी माता हैं और सब प्रकार से स्नेह करने वाले श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे पिता हैं!
पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें॥ अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू॥ ४ ॥
अर्थ:
जगत् में जहाँ तक पूजनीय और परम प्रिय लोग हैं, वे सब रामजी के नाते से ही [पूजनीय और परम प्रिय] मानने योग्य हैं। हृदय में ऐसा जानकर, हे तात! उनके साथ वन जाओ और जगत् में जीने का लाभ उठाओ!
पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥ नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी॥ १ ॥
अर्थ:
संसार में वही युवती स्त्री पुत्रवती है जिसका पुत्र श्रीरघुनाथजी का भक्त हो। नहीं तो जो राम से विमुख पुत्र से अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी। पशु की भाँति उसका ब्याना व्यर्थ ही है।
उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं। पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं॥ तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई। रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई॥
अर्थ:
हे तात! मेरा यही उपदेश है (अर्थात् तुम वही करना) जिससे वन में तुम्हारे कारण श्रीरामजी और श्रीसीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार तथा नगर के सुखों की सुरति भूल जाएँ। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु को शिक्षा देकर आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजी के चरणों में तुम्हारा निर्मल, अविरल और अमल प्रेम नित-नित नया हो!