इन्द्र-बृहस्पति संवाद
भरतजी के प्रेम और संकल्प को देखकर इन्द्र के मन में चिंता उत्पन्न होती है। तब बृहस्पति उन्हें समझाते हैं कि ऐसे शुद्ध भक्त की गति को कोई विघ्न वास्तव में रोक नहीं सकता।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३४ / ४९
प्रकरण पाठ
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥ गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेट न होई॥ ४ ॥
अर्थ:
भरतजी के [इस प्रेम के] प्रभाव को देखकर देवराज इन्द्र को सोच हो गया [कि कहीं इनके प्रेमवश श्रीरामजी लौट न जायँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाय]। संसार भले के लिये भला और बुरे के लिये बुरा है (मनुष्य जैसा आप होता है जगत् उसे वैसा ही दीखता है)। उसने गुरु बृहस्पतिजी से कहा-हे प्रभो! वही उपाय कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी की भेंट ही न हो।
बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने॥ मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया॥ १ ॥
अर्थ:
इन्द्र के वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुसकराये। उन्होंने हजार नेत्रोंवाले इन्द्र को [ज्ञानरूपी] नेत्रों से रहित (मूर्ख) समझा और कहा-हे देवराज! मायापति श्रीरामचन्द्रजी के सेवक के साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है।
तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी॥ सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥ २ ॥
अर्थ:
उस समय (पिछली बार) तो श्रीरामचन्द्रजी का रुख जानकर कुछ किया था। परन्तु इस समय कुचाल करने से हानि ही होगी। हे देवराज! श्रीरघुनाथजी का स्वभाव सुनो, वे अपने प्रति किये हुए अपराध से कभी रुष्ट नहीं होते।
जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥ करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥ २ ॥
अर्थ:
यद्यपि वे सम हैं--उनमें न राग है, न रोष है। और न वे किसी का पाप-पुण्य और गुण-दोष ही ग्रहण करते हैं। उन्होंने विश्व में कर्म को ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल भोगता है।
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा॥ अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस॥ ३ ॥
अर्थ:
तथापि वे भक्त और अभक्त के हृदय के अनुसार सम और विषम व्यवहार करते हैं (भक्त को प्रेम से गले लगा लेते हैं और अभक्त को मारकर तार देते हैं)। गुणरहित, निर्लेप, मानरहित और सदा एकरस भगवान् श्रीराम भक्त के प्रेमवश ही सगुण हुए हैं।
सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी॥ स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू॥ १ ॥
अर्थ:
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सत्यप्रतिज्ञ और देवताओं के हित करनेवाले हैं। और भरतजी श्रीरामजी की आज्ञा के अनुसार चलनेवाले हैं। तुम व्यर्थ ही स्वार्थ के वश होकर व्याकुल हो रहे हो। इसमें भरतजी का कोई दोष नहीं, तुम्हारा ही मोह है।
एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं॥ जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहुँ चहु पासा॥ ३ ॥
अर्थ:
इस प्रकार भरतजी मार्ग में चले जा रहे हैं। उनकी [प्रेममयी] दशा देखकर मुनि और सिद्ध लोग भी सिहाते हैं। भरतजी जभी 'राम' कहकर लंबी साँस लेते हैं, तभी मानो चारों ओर प्रेम उमड़ पड़ता है।
द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना॥ बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए॥ ४ ॥
अर्थ:
उनके प्रेम और दीनतासे पूर्ण वचनों को सुनकर वज्र और पत्थर भी पिघल जाते हैं। अयोध्यावासियों का प्रेम कहते नहीं बनता। बीच में निवास करके भरतजी यमुनाजी के तट पर आये। यमुनाजी का जल देखकर उनके नेत्रों में जल भर आया।
रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज। होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज॥ २२० ॥
अर्थ:
श्रीरघुनाथजी के (श्याम) वर्ण का सुन्दर जल देखकर सारे समाज सहित भरतजी [प्रेमविहल होकर] श्रीरामजी के विरहरूपी समुद्र में डूबते-डूबते विवेकरूपी जहाज पर चढ़ गये (अर्थात् यमुनाजी का श्यामवर्ण जल देखकर सब लोग श्यामवर्ण भगवान के प्रेम में विहल हो गये और उन्हें न पाकर विरहव्यथासे पीड़ित हो गये; तब भरतजी को यह ध्यान आया कि जल्दी चलकर उनके साक्षात् दर्शन करेंगे, इस विवेक से वे फिर उत्साहित हो गये)।