प्रयाग पहुँचना, श्रीराम-भरद्वाज-संवाद, यमुनातट निवासियों का प्रेम
प्रयाग पहुँचकर श्रीरामजी भरद्वाज मुनि से मिलते हैं और उनके आश्रम में आदर पाते हैं। यमुना तट के निवासी भी प्रभु पर सहज प्रेम बरसाते हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण १८ / ४९
प्रकरण पाठ
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥ प्रात प्रातकृत करि रघुराई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥ १ ॥
अर्थ:
उस दिन पेड़ के नीचे निवास हुआ। लक्ष्मणजी और सखा गुह ने [विश्राम की] सब सुव्यवस्था कर दी। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने सबेरे प्रातःकाल की सब क्रियाएँ करके जाकर तीर्थराज प्रयाग के दर्शन किये।
छेत्रु अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा॥ सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा॥ ३ ॥
अर्थ:
प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुन्दर गढ़ है, जिसको स्वप्न में भी [पापरूपी] शत्रु नहीं पा सके हैं। सम्पूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पाप की सेना को कुचल डालने वाले और बड़े रणधीर हैं।
संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥ चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा॥ ४ ॥
अर्थ:
[गंगा, यमुना और सरस्वती का] संगम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहासन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियों के भी मन को मोहित कर लेता है। यमुना और गंगाजी की तरंगें उसके [श्याम और श्वेत] चँवर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है।
तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए॥ मुनि मन मोद न कछु कहि जाई। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई॥ ४ ॥
अर्थ:
[स्नान, पूजन आदि सब करके] तब प्रभु श्रीरामजी भरद्वाजजी के पास आये। उन्हें दण्डवत् करते हुए ही मुनि ने हृदय से लगा लिया। मुनि के मन का आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो उन्हें ब्रह्मानन्द की राशि मिल गयी हो।
दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि। लोचनगोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि॥ १०६ ॥
अर्थ:
मुनीश्वर भरद्वाजजी ने आशीर्वाद दिया। उनके हृदय में ऐसा जानकर अत्यन्त आनन्द हुआ कि आज विधाता ने [ श्रीसीताजी और लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कराकर] मानो हमारे सम्पूर्ण पुण्यों के फल को लाकर आँखों के सामने कर दिया।
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हरें दरस आस सब पूजी॥ अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू॥ ४ ॥
अर्थ:
लाभ की अवधि और सुख की अवधि [प्रभु के दर्शन को छोड़कर] दूसरी कुछ भी नहीं है। आपके दर्शन से मेरी सब आशाएँ पूर्ण हो गयीं। अब कृपा करके यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलों में मेरा स्वाभाविक प्रेम हो।
सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने॥ तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा॥ १ ॥
अर्थ:
मुनि के वचन सुनकर, उनकी भाव-भक्ति के कारण आनन्द से तृप्त हुए भगवान् श्रीरामचन्द्रजी [लीला की दृष्टि से] सकुचा गये। तब [अपने ऐश्वर्य को छिपाते हुए] श्रीरामचन्द्रजी ने भरद्वाज मुनि का सुन्दर सुयश करोड़ों प्रकार से कहकर सबको सुनाया।
सो बड़ सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू॥ मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं॥ २ ॥
अर्थ:
उन्होंने कहा-- हे मुनीश्वर! जिसको आप आदर दें, वही बड़ा है और वही सब गुणसमूहों का घर है। इस प्रकार श्रीरामजी और मुनि भरद्वाजजी दोनों परस्पर विनम्र हो रहे हैं और अनिर्वचनीय सुख का अनुभव कर रहे हैं।
मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे॥ करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई॥ ३ ॥
अर्थ:
तब मुनि ने चार ब्रह्मचारियों को साथ कर दिया, जिन्होंने बहुत जन्मों तक सब सुकृत (पुण्य) किए थे। श्रीरघुनाथजी ने प्रणाम कर और ऋषि की आज्ञा पाकर हृदय में बड़े ही आनन्दित होकर चले।
सुनत तीरबासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी॥ लखन राम सिय सुंदरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई॥ १ ॥
अर्थ:
यमुना जी के किनारे रहने वाले स्त्री-पुरुष [यह सुनकर कि निषाद के साथ दो परम सुन्दर सुकुमार नवयुवक और एक परम सुन्दरी स्त्री आ रही है] सब अपना-अपना काम भूलकर दौड़े और लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी का सौन्दर्य देखकर अपने भाग्य की बड़ाई करने लगे।
अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं॥ जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने॥ २ ॥
अर्थ:
उनके मन में [परिचय जानने की] बहुत-सी लालसाएँ भरी हैं। पर वे नाम-गाँव पूछते सकुचाते हैं। उन लोगों में जो वयोवृद्ध और चतुर थे; उन्होंने युक्ति से श्रीरामचन्द्रजी को पहचान लिया।