सुमंत्र का अयोध्या लौटना और सर्वत्र शोक देखना
सुमंत्र खाली रथ लेकर अयोध्या लौटते हैं। नगर, महल और प्रजा सब ओर श्रीराम-वियोग का गहरा शोक व्याप्त मिलता है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २३ / ४९
प्रकरण पाठ
बिबिधि कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी॥ सोक सिथिल रथु सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी॥ २ ॥
अर्थ:
कोमल वाणी से भाँति-भाँति की कथाएँ कहकर निषाद ने जबर्दस्ती लाकर सुमन्त्र को रथ पर बैठाया। परन्तु शोक के मारे वे इतने शिथिल हो गये कि रथ को हाँक नहीं सकते। उनके हृदय में श्रीरामचन्द्रजी के विरह की बड़ी तीव्र वेदना है।
चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे॥ अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें॥ ३ ॥
अर्थ:
तड़फड़ाते हैं और ठीक रास्ते पर नहीं चलते। मानो जंगली पशु लाकर रथ में जोत दिये गये हों। वे श्रीरामचन्द्रजी के वियोग से विकल घोड़े कभी ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कभी घूमकर पीछे की ओर देखने लगते हैं। वे तीक्ष्ण दुःख से व्याकुल हैं।
जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही॥ बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनुमनिफनिक बिकल जेहि भाँती॥ ४ ॥
अर्थ:
जो कोई राम, लक्ष्मण या जानकी का नाम ले लेता है, घोड़े हिकर-हिकरकर उसकी ओर प्यार से देखने लगते हैं। घोड़ों की विरहदशा कैसे कही जा सकती है? वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे मणि के बिना साँप व्याकुल होता है।
गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई॥ चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा॥ १ ॥
अर्थ:
निषादराज गुह सारथी (सुमन्त्रजी) को पहुँचाकर (विदा करके) लौटा। उसके विरह और दुःख का वर्णन नहीं किया जा सकता। वे चारों निषाद रथ लेकर अवध को चले। [सुमन्त्र और घोड़ों को देख-देखकर] वे भी क्षण-क्षण भर विषाद में डूबे जाते थे।
सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना॥ रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू॥ २ ॥
अर्थ:
व्याकुल और दुःख से दीन हुए सुमन्त्रजी सोचते हैं कि श्रीरघुवीर के बिना जीने को धिक्कार है। आखिर यह अधम शरीर रहेगा ही नहीं। अभी श्रीरामचन्द्रजी के बिछुड़ते ही इसने यश क्यों नहीं ले लिया।
मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहुँ कृपन धन रासि गवाँई॥ बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई॥ ४ ॥
अर्थ:
सुमन्त्र हाथ मल-मलकर और सिर पीट-पीटकर पछताते हैं। मानो कोई कंजूस धन का खजाना खो बैठा हो। वे इस प्रकार चले मानो कोई बड़ा योद्धा वीर का बाना पहनकर और उत्तम शूरवीर कहलाकर युद्ध से भाग चला हो!
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी॥ रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहू॥ १ ॥
अर्थ:
जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधुस्वभाव की, समझदार और मन, वचन, कर्म से पति को ही देवता मानने वाली पतिव्रता स्त्री को भाग्यवश पति को छोड़कर रहना पड़े, उस समय उसके हृदय में जैसे भयानक संताप होता है, वैसे ही मन्त्री के हृदय में हो रहा है।
लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी॥ सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी॥ २ ॥
अर्थ:
नेत्रों में जल भरा है, दृष्टि मन्द हो गयी है। कानों से सुनायी नहीं पड़ता, व्याकुल हुई बुद्धि बेठिकाने हो रही है। ओठ सूख रहे हैं, मुँह में लाठी लग गयी है। किन्तु [ये सब मृत्यु के लक्षण हो जाने पर भी] प्राण नहीं निकलते; क्योंकि हृदय में अवधिरूपी किवाड़ लगे हैं (अर्थात् चौदह वर्ष बीत जाने पर भगवान् फिर मिलेंगे, यही आशा रुकावट डाल रही है)।
बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी॥ हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी॥ ३ ॥
अर्थ:
सुमन्त्रजी के मुख का रंग बदल गया है, जो देखा नहीं जाता। ऐसा मालूम होता है मानो इन्होंने माता-पिता को मार डाला हो। उनके मन में रामवियोग रूपी हानि की महान ग्लानि (पीड़ा) छा रही है, जैसे कोई पापी मनुष्य नरक को जाता हुआ रास्ते में सोच कर रहा हो।
बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई॥ राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई॥ ४ ॥
अर्थ:
मुँह से वचन नहीं निकलते। हृदय में पछताते हैं कि मैं अयोध्या में जाकर क्या देखूँगा? श्रीरामचन्द्रजी से शून्य रथ को जो भी देखेगा, वही मुझे देखने में संकोच करेगा (अर्थात् मेरा मुँह नहीं देखना चाहेगा)।
एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा॥ बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा॥ १ ॥
अर्थ:
सुमन्त्र इस प्रकार मार्ग में पछतावा कर रहे थे, इतने में ही रथ तुरंत तमसा नदी के तट पर आ पहुँचा। मन्त्री ने विनय करके चारों निषादों को विदा किया। वे विषाद से व्याकुल होते हुए सुमन्त्र के पैरों पड़कर लौटे।
रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे॥ नगर नारि नर ब्याकुल कैसें। निघटत नीर मीनगन जैसें॥ ४ ॥
अर्थ:
रथ को पहचानकर और घोड़ों को व्याकुल देखकर उनके शरीर ऐसे गले जा रहे हैं (क्षीण हो रहे हैं) जैसे घाम में ओले! नगर के स्त्री-पुरुष कैसे व्याकुल हैं जैसे जल के घटने पर मछलियाँ [व्याकुल होती हैं]।
अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी॥ सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृपु तेहि तेहि बूझा॥ १ ॥
अर्थ:
अत्यन्त आर्त होकर सब रानियाँ पूछती हैं; पर सुमन्त्र को कुछ उत्तर नहीं आता, उनकी वाणी विकल हो गयी (रुक गयी) है। न कानों से सुनायी पड़ता है और न आँखों से कुछ सूझता। वे जो भी सामने आता है उस-उससे पूछती हैं—कहो, राजा कहाँ हैं?
लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती॥ राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही॥ ४ ॥
अर्थ:
राजा क्षण-क्षण में सोच से छाती भर लेते हैं। ऐसी विकल दशा है मानो [गीधराज जटायु के भाई] सम्पाती के पंख जल जाने पर वह गिर पड़ा हो। राजा बार-बार “राम, राम”, “हे स्नेही राम!” कहते हैं, फिर “हे राम, हे लक्ष्मण, हे बैदेही” ऐसा कहने लगते हैं।