भरत-कौसल्या संवाद और दशरथजी की अंत्येष्टि क्रिया

भरतजी माता कौसल्या के चरणों में गिरकर अपनी निष्कपटता प्रकट करते हैं, और करुणा से भरा संवाद होता है। इसके बाद गुरुजनों के मार्गदर्शन में महाराज दशरथ की अंत्येष्टि क्रिया संपन्न की जाती है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २७ / ४९

प्रकरण पाठ

दोहा

मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार॥ १६३ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरे का रंग बदला हुआ है, व्याकुल हैं, दुःख के बोझ से शरीर सूख गया है। ऐसी लगती हैं मानो सोने की सुन्दर कल्पलता वन में पाले से झुलस गयी हो।

दोहा 164 के अंतर्गत
चौपाई

भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई॥ देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी॥ १ ॥

अर्थ:

भरत को देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जाने से मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीर की सुध भुलाकर चरणों में गिर पड़े।

चौपाई

मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई॥ कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा॥ २ ॥

अर्थ:

माता! पिताजी कहाँ हैं? उन्हें दिखा दे। सीता, राम और दोनों भाई लक्ष्मण कहाँ हैं? [उन्हें दिखा दे।] कैकेयी जगत् में क्यों जनमी? और यदि जनमी ही, तो बाँझ क्यों न हुई?

चौपाई

कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही॥ को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी॥ ३ ॥

अर्थ:

जिसने कुल के कलंक, अपयश के भाजन और प्रियजनों के द्रोही मुझ-जैसे पुत्र को उत्पन्न किया। तीनों लोकों में मेरे समान अभागा कौन है? जिसके कारण, हे माता! तेरी यह दशा हुई!

चौपाई

पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतू॥ धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी॥ ४ ॥

अर्थ:

पिताजी स्वर्ग में हैं और श्रीरामजी वन में हैं। केतु के समान केवल मैं ही इन सब अनर्थों का कारण हूँ। मुझे धिक्कार है! मैं बाँस के वन में आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषों का भागी बना।

दोहा

मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि। लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि॥ १६४ ॥

अर्थ:

भरतजी के कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरत को उठाकर छाती से लगा लिया और नेत्रों से आँसू बहाने लगीं।

दोहा 165 के अंतर्गत
चौपाई

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए॥ भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई॥ १ ॥

अर्थ:

सरल स्वभाववाली माताने बड़े प्रेम से भरतजी को छाती से लगा लिया; मानो श्रीरामजी ही लौटकर आ गये हों। फिर लक्ष्मणजी के छोटे भाई को हृदय से लगाया। शोक और स्नेह हृदय में समाता नहीं है।

चौपाई

देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई॥ माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पोंछि मृदु बचन उचारे॥ २ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी का स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं—श्रीराम की माता का ऐसा स्वभाव क्यों न हो। माता ने भरतजी को गोद में बैठा लिया और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोलीं—।

चौपाई

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू॥ जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानी॥ ३ ॥

अर्थ:

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू॥ जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानी॥

चौपाई

काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता॥ जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा॥ ४ ॥

अर्थ:

किसी को दोष मत दो, हे तात! विधाता ने मुझे सब प्रकार से बाम कर दिया है, जो इतने दुःख पर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है?

दोहा

पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर। बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर॥ १६५ ॥

अर्थ:

हे तात! पिताकी आज्ञा से श्रीरघुवीर ने भूषण-वस्त्र त्याग दिये और वल्कल-वस्त्र पहन लिये। उनके हृदय में न कुछ विषाद था, न हर्ष।

दोहा 166 के अंतर्गत
चौपाई

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू॥ चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी॥ १ ॥

अर्थ:

उनका मुख प्रसन्न था, मन में न आसक्ति थी, न रोष (द्वेष)। सब का सब तरह से सन्तोष कराकर वे वन को चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीराम के चरणों की अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं।

चौपाई

सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा॥ तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई॥ २ ॥

अर्थ:

सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले। श्रीरघुनाथ ने उन्हें रोकने के बहुत यत्न किये, पर वे न रहे। तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मण को साथ लेकर चले गये।

चौपाई

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए॥ यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वन को चले गये। मैं न तो साथ ही गयी और न मैंने अपने प्राण ही उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आँखों के सामने हुआ। तो भी अभागे जीव ने शरीर नहीं छोड़ा।

चौपाई

मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी॥ जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना॥ ४ ॥

अर्थ:

अपने स्नेह की ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम-सरीखे पुत्र की मैं माता! जीना और मरना तो राजा ने खूब जाना। मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रों के समान कठोर है।

दोहा

कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु। ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु॥ १६६ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी के वचनों को सुनकर भरत सहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा। राजमहल मानो शोक का निवास बन गया।

दोहा 167 के अंतर्गत
चौपाई

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई॥ भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए॥ १ ॥

अर्थ:

भरत, शत्रुघ्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजी ने उनको हृदय से लगा लिया। अनेकों प्रकार से भरतजी को समझाया और बहुत-सी विवेकभरी बातें उन्हें कहकर सुनायी।

चौपाई

भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं॥ छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी॥ २ ॥

अर्थ:

भरतजी ने भी सब माताओं को पुराण और वेदों की सुन्दर कथाएँ कहकर समझाया। दोनों हाथ जोड़कर भरतजी छलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले--।

चौपाई

जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें॥ जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें॥ ३ ॥

अर्थ:

जो पाप माता-पिता और पुत्र के मारने से होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणों के नगर जलाने से होते हैं; जो पाप स्त्री और बालक की हत्या करने से होते हैं और जो मित्र और राजाको ज़हर देने से होते हैं--।

चौपाई

जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं॥ ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता॥ ४ ॥

अर्थ:

कर्म, वचन और मन से होने वाले जितने पातक एवं उपपातक (बड़े-छोटे पाप) हैं, जिनको कवि लोग कहते हैं; हे विधाता! यदि इस काम में मेरा मत हो, तो हे माता! वे सब पाप मुझे लगें।

दोहा

जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर। तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर॥ १६७ ॥

अर्थ:

जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजी के चरणों को छोड़कर भयानक भूत-प्रेतों को भजते हैं, हे माता! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे।

दोहा 168 के अंतर्गत
चौपाई

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥ कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥ १ ॥

अर्थ:

जो लोग वेदों को बेचते हैं, धर्म को दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरों के पापों को कह देते हैं; जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदों की निन्दा करने वाले और विश्व-विरोधी हैं;।

चौपाई

लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा॥ पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा॥ २ ॥

अर्थ:

जो लोभी, लम्पट और लालची आचरण वाले हैं; जो पराये धन और परायी स्त्री की ताक में रहते हैं; हे जननी! यदि इस काम में मेरी सम्मति हो तो मैं उनकी भयानक गति को पाऊँ।

चौपाई

जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे॥ जे न भजहिं हरि नर तनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई॥ ३ ॥

अर्थ:

जिनका सत्संग में प्रेम नहीं है; जो अभागे परमार्थ के मार्ग से विमुख हैं; जो मनुष्य शरीर पाकर श्रीहरि का भजन नहीं करते; जिन्हें हरि-हर (भगवान् विष्णु और शंकरजी) का सुयश नहीं सुहाता;

चौपाई

तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं॥ तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

जो वेदमार्ग को छोड़कर वाम (वेदप्रतिकूल) मार्ग पर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत् को छलते हैं; हे माता! यदि मैं इस भेद को जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगों की गति दें।

दोहा

मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ॥ १६८ ॥

अर्थ:

माता कौसल्याजी भरतजी के स्वाभाविक ही सच्चे और सरल वचनों को सुनकर कहने लगीं-- हे तात! तुम तो मन, वचन और शरीर से सदा ही श्रीरामचन्द्र के प्यारे हो।

दोहा 169 के अंतर्गत
चौपाई

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे॥ बिधु बिष चवै स्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीराम तुम्हारे प्राणों से भी बढ़कर प्राण (प्रिय) हैं और तुम भी श्रीरघुनाथ को प्राणों से भी अधिक प्यारे हो। चन्द्रमा चाहे विष चुआने लगे और पाला आग बरसाने लगे; जलचर जीव जल से विरक्त हो जाय,

चौपाई

भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू॥ मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं॥ २ ॥

अर्थ:

ज्ञान हो जाने पर भी चाहे मोह न मिटे; पर तुम श्रीरामचन्द्र के प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत् में जो कोई ऐसा कहते हैं वे स्वप्न में भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे।

चौपाई

अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्रवहिं नयन जल छाए॥ करत बिलाप बहुत एहि भाँती। बैठेहिं बीति गई सब राती॥ ३ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर माता कौसल्याजी ने भरतजी को हृदय से लगा लिया। उनके स्तनों से दूध बहने लगा और नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल छा गया। इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए सारी रात बैठे-ही-बैठे बीत गयी।

चौपाई

बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥ मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे॥ ४ ॥

अर्थ:

तब वामदेवजी और वसिष्ठजी आये। उन्होंने सब मन्त्रियों तथा महाजनोंको बुलवाया। फिर मुनि वसिष्ठजीने परमार्थके सुन्दर समयानुकूल वचन कहकर बहुत प्रकारसे भरतजीको उपदेश दिया।

दोहा

तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु॥ १६९ ॥

अर्थ:

[वसिष्ठजी ने कहा--] हे तात! हृदय में धीरज धरो और आज जिस कार्य के करने का अवसर है, उसे करो। गुरुजी के वचन सुनकर भरतजी उठे और उन्होंने सब तैयारी करने के लिये कहा।

दोहा 170 के अंतर्गत
चौपाई

नृप तनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा॥ गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी॥ १ ॥

अर्थ:

वेदों में बतायी हुई विधि से राजाकी देह को स्नान कराया गया और परम विचित्र विमान बनाया गया। भरतजी ने सब माताओं को चरण पकड़कर रखा (अर्थात् प्रार्थना करके उनको सती होने से रोक लिया)। वे रानियाँ भी [श्रीरामके] दर्शनकी अभिलाषासे रह गयीं।

चौपाई

चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए॥ सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई॥ २ ॥

अर्थ:

चन्दन और अगरके तथा और भी अनेकों प्रकारके अपार [कपूर, गुग्गुल, केसर आदि] सुगन्ध-द्रव्योंके बहुत-से बोझ आये। सरयूजीके तटपर सुन्दर चिता रचकर बनायी गयी, [जो ऐसी मालूम होती थी] मानो स्वर्गकी सुन्दर सीढ़ी हो।

चौपाई

एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही॥ सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना॥ ३ ॥

अर्थ:

इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलाञ्जलि दी। फिर वेद, स्मृति और पुराणों का मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजीने पिताका दशगात्र-विधान(दस दिनोंके कृत्य) किया।

चौपाई

जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा॥ भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने जहाँ जैसी आज्ञा दी, वहाँ भरतजीने सब वैसा ही हजारों प्रकारसे किया। शुद्ध हो जानेपर [विधिपूर्वक] सब दान दिये। गौएँ तथा घोड़े, हाथी आदि अनेक प्रकारकी सवारियाँ,

दोहा

सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम। दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम॥ १७० ॥

अर्थ:

सिंहासन, गहने, कपड़े, अन्न, पृथ्वी, धन और मकान भरतजीने दिये; भूदेव ब्राह्मण दान पाकर परिपूर्णकाम हो गये (अर्थात् उनकी सारी मनोकामनाएँ अच्छी तरहसे पूरी हो गयीं)।