भरत-कौसल्या संवाद और दशरथजी की अंत्येष्टि क्रिया
भरतजी माता कौसल्या के चरणों में गिरकर अपनी निष्कपटता प्रकट करते हैं, और करुणा से भरा संवाद होता है। इसके बाद गुरुजनों के मार्गदर्शन में महाराज दशरथ की अंत्येष्टि क्रिया संपन्न की जाती है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २७ / ४९
प्रकरण पाठ
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतू॥ धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी॥ ४ ॥
अर्थ:
पिताजी स्वर्ग में हैं और श्रीरामजी वन में हैं। केतु के समान केवल मैं ही इन सब अनर्थों का कारण हूँ। मुझे धिक्कार है! मैं बाँस के वन में आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषों का भागी बना।
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू॥ चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी॥ १ ॥
अर्थ:
उनका मुख प्रसन्न था, मन में न आसक्ति थी, न रोष (द्वेष)। सब का सब तरह से सन्तोष कराकर वे वन को चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीराम के चरणों की अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं।
जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें॥ जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें॥ ३ ॥
अर्थ:
जो पाप माता-पिता और पुत्र के मारने से होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणों के नगर जलाने से होते हैं; जो पाप स्त्री और बालक की हत्या करने से होते हैं और जो मित्र और राजाको ज़हर देने से होते हैं--।
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥ कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥ १ ॥
अर्थ:
जो लोग वेदों को बेचते हैं, धर्म को दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरों के पापों को कह देते हैं; जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदों की निन्दा करने वाले और विश्व-विरोधी हैं;।
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे॥ बिधु बिष चवै स्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीराम तुम्हारे प्राणों से भी बढ़कर प्राण (प्रिय) हैं और तुम भी श्रीरघुनाथ को प्राणों से भी अधिक प्यारे हो। चन्द्रमा चाहे विष चुआने लगे और पाला आग बरसाने लगे; जलचर जीव जल से विरक्त हो जाय,
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू॥ मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं॥ २ ॥
अर्थ:
ज्ञान हो जाने पर भी चाहे मोह न मिटे; पर तुम श्रीरामचन्द्र के प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत् में जो कोई ऐसा कहते हैं वे स्वप्न में भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे।
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्रवहिं नयन जल छाए॥ करत बिलाप बहुत एहि भाँती। बैठेहिं बीति गई सब राती॥ ३ ॥
अर्थ:
ऐसा कहकर माता कौसल्याजी ने भरतजी को हृदय से लगा लिया। उनके स्तनों से दूध बहने लगा और नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल छा गया। इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए सारी रात बैठे-ही-बैठे बीत गयी।
नृप तनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा॥ गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी॥ १ ॥
अर्थ:
वेदों में बतायी हुई विधि से राजाकी देह को स्नान कराया गया और परम विचित्र विमान बनाया गया। भरतजी ने सब माताओं को चरण पकड़कर रखा (अर्थात् प्रार्थना करके उनको सती होने से रोक लिया)। वे रानियाँ भी [श्रीरामके] दर्शनकी अभिलाषासे रह गयीं।
चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए॥ सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई॥ २ ॥
अर्थ:
चन्दन और अगरके तथा और भी अनेकों प्रकारके अपार [कपूर, गुग्गुल, केसर आदि] सुगन्ध-द्रव्योंके बहुत-से बोझ आये। सरयूजीके तटपर सुन्दर चिता रचकर बनायी गयी, [जो ऐसी मालूम होती थी] मानो स्वर्गकी सुन्दर सीढ़ी हो।
एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही॥ सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना॥ ३ ॥
अर्थ:
इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलाञ्जलि दी। फिर वेद, स्मृति और पुराणों का मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजीने पिताका दशगात्र-विधान(दस दिनोंके कृत्य) किया।