भरतजी का प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज संवाद

भरतजी प्रयाग पहुँचकर तीर्थ की वंदना करते हैं और महर्षि भरद्वाज के आश्रम में उपस्थित होते हैं। वहाँ उनके हृदय की सरलता, भक्ति और धर्मनिष्ठा से युक्त संवाद होता है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३२ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं॥ साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

निषादराज को आगे करके पीछे सब माताओं की पालकियाँ चलायीं। छोटे भाई को बुलाकर उनके साथ कर दिया। फिर ब्राह्मणों सहित गुरुजी ने गमन किया।

चौपाई

आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू॥ गवने भरत पयादेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए॥ २ ॥

अर्थ:

तदनन्तर आप (भरतजी) ने सुरसरि को प्रणाम किया और लक्ष्मण सहित श्रीसीतारामजी का स्मरण किया। भरतजी पैदल ही चले। उनके साथ कोतल बागडोर से बँधे हुए चल रहे हैं।

चौपाई

कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा॥ रामु पयादेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए॥ ३ ॥

अर्थ:

उत्तम सेवक बार-बार कहते हैं कि हे नाथ! आप घोड़े पर सवार हो लीजिए। [भरतजी जवाब देते हैं कि] श्रीरामचन्द्रजी तो पैदल ही गये और हमारे लिये रथ, हाथी और घोड़े बनाये गये हैं।

चौपाई

सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा॥ देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी॥ ४ ॥

अर्थ:

मुझे उचित तो ऐसा है कि मैं सिर के बल चलकर जाऊँ। सेवक का धर्म सबसे कठिन होता है। भरतजी की दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवकगण ग्लानि के मारे गले जा रहे हैं।

दोहा

भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग। कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग॥ २०३ ॥

अर्थ:

प्रेम में उमँग-उमँगकर सीताराम-सीताराम कहते हुए भरतजी ने तीसरे पहर प्रयाग में प्रवेश किया।

दोहा 204 के अंतर्गत
चौपाई

झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस ओस कन जैसें॥ भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू॥ १ ॥

अर्थ:

उनके चरणों में झलक कैसे चमकती है, जैसे कमल की कली पर ओस की बूँदें चमकती हों। भरतजी आज पैदल ही चलकर आए हैं, यह समाचार सुनकर सारा समाज दुःखी हो गया।

चौपाई

खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए॥ सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने॥ २ ॥

अर्थ:

खबर ले ली कि सब लोग नहा चुके हैं। त्रिवेणी में आकर प्रणाम किया। विधिपूर्वक [गंगा-यमुनाके ] श्वेत और श्याम जल में स्नान किया और दान देकर महिसुरों का सम्मान किया।

चौपाई

देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे॥ सकल कामप्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

श्याम और सफेद (यमुना जी और गंगा जी की) लहरों को देखकर भरतजी का शरीर पुलकित हो उठा और उन्होंने हाथ जोड़ दिए। हे तीर्थराज! आप समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं। आपका प्रभाव वेदों में प्रसिद्ध और संसार में प्रकट है।

चौपाई

मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू॥ अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं अपना धर्म (न माँगने का क्षत्रियधर्म) त्यागकर आपसे भीख माँगता हूँ। आर्त मनुष्य कौन-सा कुकर्म नहीं करता? ऐसा हृदय में जानकर सुजान उत्तम दानी जगत् में माँगनेवाले की वाणी को सफल किया करते हैं (अर्थात् वह जो माँगता है, सो दे देते हैं)।

दोहा

अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥ २०४ ॥

अर्थ:

मुझे न अर्थ की रुचि है, न धर्म की, न काम की और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ। जन्म-जन्म में मेरा श्रीरामजी के चरणों में प्रेम हो, बस यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं।

दोहा 205 के अंतर्गत
चौपाई

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही॥ सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥ १ ॥

अर्थ:

स्वयं श्रीरामचन्द्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरु तथा साहिब का द्रोही भले ही कहें; पर श्रीसीतारामजी के चरणों में मेरा प्रेम आपकी कृपा से दिन-दिन बढ़ता ही रहे।

चौपाई

जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥ चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई॥ २ ॥

अर्थ:

मेघ चाहे जन्म भर चातक की सुधि भुला दे और जल माँगने पर वह चाहे वज्र और पत्थर ही बरसाए, पर चातक की रट घटने से तो उसकी बात ही घट जाएगी। उसकी तो प्रेम बढ़ने में ही सब तरह से भलाई है।

चौपाई

कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें॥ भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी॥ ३ ॥

अर्थ:

जैसे तपाने से सोने में चमक आ जाती है, वैसे ही प्रियतम के चरणों में नियम निबाहने से प्रेमी सेवक का गौरव बढ़ जाता है। भरतजी के वचन सुनकर बीच त्रिवेणी से कोमल, सुमंगल देनेवाली वाणी हुई।

चौपाई

तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू॥ बादि गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

हे तात भरत! तुम सब प्रकार से साधु हो। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में तुम्हारा अथाह प्रेम है। तुम व्यर्थ ही मन में ग्लानि कर रहे हो। श्रीरामचन्द्र को तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है।

दोहा

तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल। भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल॥ २०५ ॥

अर्थ:

त्रिवेणीजी के अनुकूल वचन सुनकर भरतजी का शरीर पुलकित हो गया, हृदय में हर्ष छा गया। भरत धन्य हैं, धन्य हैं, कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे।

दोहा 206 के अंतर्गत
चौपाई

प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी॥ कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेहु सीलु सुचि साँचा॥ १ ॥

अर्थ:

तीर्थराज प्रयाग में रहनेवाले वैखानस, बटु, गृहस्थ और उदासीन सब बहुत ही आनन्दित हैं और दस-पाँच मिलकर आपस में कहते हैं कि भरतजी का स्नेह, शील, पवित्र और सच्चा है।

चौपाई

सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए॥ दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर गुणसमूहों को सुनते हुए वे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजी के पास आए। मुनि ने भरतजी को दण्डवत्-प्रणाम करते देखा और उन्हें अपना मूर्तिमान् सौभाग्य समझा।

चौपाई

धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे॥ आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे॥ ३ ॥

अर्थ:

दौड़कर उन्हें उठाया, हृदय से लगा लिया। आशीर्वाद दिया और कृतार्थ किया। आसन दिया। सिर नवाकर वे इस तरह बैठे मानो भागकर संकोच के घर में घुस जाना चाहते हों।

चौपाई

मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू॥ सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई॥ ४ ॥

अर्थ:

उनके मन में यह बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे [तो मैं क्या उत्तर दूँगा]। भरतजी के शील और संकोच को देखकर ऋषि बोले—भरत! सुनो, हम सब खबर पा चुके हैं। विधाता के कर्तव्य पर कुछ वश नहीं चलता।

दोहा

तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझि मातु करतूति। तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति॥ २०६ ॥

अर्थ:

माता की करतूत को समझकर (याद करके) तुम हृदय में ग्लानि मत करो। हे तात! कैकेयी का कोई दोष नहीं है, उसकी बुद्धि तो सरस्वती ने बिगाड़ दी थी।

दोहा 207 के अंतर्गत
चौपाई

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेदु बुध संमत दोऊ॥ तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई॥ १ ॥

अर्थ:

यह कहना भी कोई भला न कहेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनों ही विद्वानों को मान्य है। किन्तु हे तात! तुम्हारा निर्मल यश गाकर तो लोक और वेद दोनों बड़ाई पावेंगे।

चौपाई

लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई॥ राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई॥ २ ॥

अर्थ:

लोक और वेद दोनों को यह मान्य है और सब यही कहते हैं कि पिता जिसको राज्य दे वही पाता है। राजा सत्यव्रत थे; तुमको बुलाकर राज्य देते, तो सुख मिलता, धर्म रहता और बड़ाई होती।

चौपाई

राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला॥ सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी का वनगमन सारे अनर्थों की जड़ है, जिसे सुनकर समस्त संसार को पीड़ा हुई। वह वनगमन भी भावीवश हुआ। बेसमझ रानी ने कुचाल करके अन्त में पछतायी।

चौपाई

तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू॥ करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू॥ ४ ॥

अर्थ:

उसमें भी तुम्हारा कोई तनिक-सा भी अपराध कहे, तो वह अधम, अज्ञानी और असाधु है। यदि तुम राज्य करते तो भी तुम्हें दोष न होता। सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को भी सन्तोष ही होता।

दोहा

अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु। सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु॥ २०७ ॥

अर्थ:

हे भरत! अब तो तुमने बहुत ही अच्छा किया; यही मत तुम्हारे लिए उचित था। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में प्रेम होना ही संसार में समस्त मंगलों का मूल है।

दोहा 208 के अंतर्गत
चौपाई

सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥ यह तुम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥ १ ॥

अर्थ:

सो वह श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का प्रेम ही तुम्हारा धन, जीवन और प्राण है; तुम्हारे समान बड़भागी कौन है? हे तात! तुम्हारे लिए यह आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि तुम दशरथजी के पुत्र और श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे भाई हो।

चौपाई

सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं॥ लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती॥ २ ॥

अर्थ:

हे भरत! सुनो, श्रीरघुबर के मन में तुम्हारे समान प्रेमपात्र दूसरा कोई नहीं है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी को सारी रात तुम्हारी अत्यन्त प्रेम के साथ सराहना करते ही बीती।

चौपाई

जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा॥ तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रयागराज में जब वे स्नान कर रहे थे, उस समय मैंने उनका यह मर्म जाना। वे तुम्हारे प्रेम में मग्र हो रहे थे। तुमपर श्रीरामचन्द्रजी का ऐसा ही (अगाध) स्नेह है जैसा मूर्ख मनुष्य का संसार में सुखमय जीवन पर होता है।

चौपाई

यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई॥ तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू॥ ४ ॥

अर्थ:

यह श्रीरघुवीर की बहुत बड़ाई नहीं है। क्योंकि श्रीरघुनाथजी तो शरणागत के कुटुम्बभर को पालनेवाले हैं। हे भरत! मेरा यह मत है कि तुम तो मानो शरीरधारी श्रीरामजी के प्रेम ही हो।

दोहा

तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु। राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु॥ २०८ ॥

अर्थ:

हे भरत! तुम्हारे लिए (तुम्हारी समझ में) यह कलंक है, पर हम सबके लिए तो उपदेश है। श्रीरामभक्ति रस की सिद्धि के लिए यह समय गणेशजी की कृपा से बड़ा शुभ हुआ है।

दोहा 209 के अंतर्गत
चौपाई

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥ उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥ १ ॥

अर्थ:

है तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजी के दास कुमुद और चकोर हैं [वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोर को दुःख होता है]; परन्तु यह तुम्हारा यशरूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं। जगद्रूपी आकाश में यह घटेगा नहीं, वरन् दिन-दिन दूना होगा।

चौपाई

कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही॥ निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू॥ २ ॥

अर्थ:

त्रैलोक्यरूपी चकवा इस यशरूपी चन्द्रमा पर अत्यन्त प्रेम करेगा और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का प्रतापरूपी सूर्य इसकी छवि को हरण नहीं करेगा। यह चन्द्रमा रात-दिन सदा सब किसी को सुख देनेवाला होगा। कैकेयी का कुकर्मरूपी राहु इसे ग्रास नहीं करेगा।

चौपाई

पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा॥ रामभगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ॥ ३ ॥

अर्थ:

यह चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर प्रेमरूपी अमृत से पूर्ण है। यह गुरु के अवमानरूपी दोष से दूषित नहीं है। तुमने इस यशरूपी चन्द्रमा की सृष्टि करके पृथ्वी पर भी अमृत को सुलभ कर दिया। अब श्रीरामजी के भक्त इस अमृत से तृप्त हो लें।

चौपाई

भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुमंगल खानी॥ दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

राजा भगीरथ गंगा जी को लाये, जिनका स्मरण ही सम्पूर्ण सुमंगलों की खान है। दशरथजी के गुण-समूहों का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता; अधिक क्या, जिनकी बराबरी का जगत् में कोई नहीं है।

दोहा

जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ। जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ॥ २०९ ॥

अर्थ:

जिनके प्रेम और संकोच (शील) के वश में होकर स्वयं [सच्चिदानन्दघन] भगवान् श्रीराम आकर प्रकट हुए, जिन्हें श्रीमहादेवजी अपने हृदय के नेत्रों से कभी अघाकर नहीं देख पाये (अर्थात् जिनका स्वरूप हृदय में देखते-देखते शिवजी कभी तृप्त नहीं हुए)।

दोहा 210 के अंतर्गत
चौपाई

कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा॥ तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ॥ १ ॥

अर्थ:

आपने कीर्तिरूपी अनुपम चन्द्रमा को उत्पन्न किया, जिसमें श्रीरामप्रेम ही हिरन के रूप में बसता है। हे तात! तुम व्यर्थ ही हृदय में ग्लानि कर रहे हो। पारस पाकर भी तुम दरिद्रता से डर रहे हो!

चौपाई

सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं॥ सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा॥ २ ॥

अर्थ:

हे भरत! सुनो, हम झूठ नहीं कहते। हम उदासीन हैं (किसी का पक्ष नहीं करते), तपस्वी हैं (किसी की मुँहदेखी नहीं कहते) और वन में रहते हैं (किसी से कुछ प्रयोजन नहीं रखते)। सब साधनों का उत्तम फल हमें लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी का दर्शन प्राप्त हुआ।

चौपाई

तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा॥ भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन मुनि भयऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

[सीता-लक्ष्मणसहित श्रीरामदर्शनरूप] उस महान् फल का परम फल यह तुम्हारा दर्शन है। प्रयागराज समेत हमारा बड़ा भाग्य है। हे भरत! तुम धन्य हो, तुमने अपने यश से जगत् को जीत लिया है। ऐसा कहकर मुनि प्रेम में मग्र हो गये।

चौपाई

सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥ धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनि के वचन सुनकर सभासद् हर्षित हो गये। 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओं ने फूल बरसाये। आकाश में और प्रयागराज में 'धन्य, धन्य' की ध्वनि सुन-सुनकर भरतजी प्रेम में मग्र हो रहे हैं।

दोहा

पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन। करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन॥ २१० ॥

अर्थ:

भरतजी का शरीर पुलकित है, हृदय में श्रीराम और सीता हैं और कमल के समान नेत्र [प्रेमाश्रु के जल से भरे] हैं। वे मुनियों की मण्डली को प्रणाम करके गद्गद वचन बोले--।

दोहा 211 के अंतर्गत
चौपाई

मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू॥ एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई॥ १ ॥

अर्थ:

मुनियों का समाज है और फिर तीर्थराज है। यहाँ सच्ची सौगंध खाने से भी भरपूर हानि होती है। इस स्थान में यदि कुछ बनाकर कहा जाय, तो इसके समान कोई बड़ा पाप और नीचता न होगी।

चौपाई

तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ॥ मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू॥ २ ॥

अर्थ:

मैं सच्चे भाव से कहता हूँ। आप सर्वज्ञ हैं, और श्रीरघुनाथजी हृदय के भीतर की जाननेवाले हैं (मैं कुछ भी असत्य कहूँगा तो आपसे और उनसे छिपा नहीं रह सकता)। मुझे माता कैकेयी की करनी का कुछ भी सोच नहीं है। और न मेरे मन में इसी बात का दुःख है कि जगत् मुझे नीच समझेगा।

चौपाई

नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू॥ सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए॥ ३ ॥

अर्थ:

न यही डर है कि मेरा परलोक बिगड़ जायगा और न पिताजी के मरने का ही मुझे शोक है। क्योंकि उनका सुन्दर पुण्य और सुयश भुवनभर में सुशोभित है। उन्होंने श्रीराम-लक्ष्मण-सरीखे पुत्र पाये।

चौपाई

राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू॥ राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर जिन्होंने श्रीरामचन्द्रजी के विरह में अपने क्षणभंगुर शरीर को त्याग दिया, ऐसे राजा के लिये सोच करने का कौन प्रसंग है? [सोच इसी बात की है कि] श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी पैरों में बिना जूती के मुनियों का वेष बनाये वन-वन में फिरते हैं।

दोहा

अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात। बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात॥ २११ ॥

अर्थ:

वे वल्कल वस्त्र पहनते हैं, फलों का भोजन करते हैं, पृथ्वी पर कुश और पत्ते बिछाकर सोते हैं और वृक्षों के नीचे निवास करके नित्य सर्दी, गर्मी, वर्षा और हवा सहते हैं।

दोहा 212 के अंतर्गत
चौपाई

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती॥ एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं॥ १ ॥

अर्थ:

इसी दुःख की जलन से निरन्तर मेरी छाती जलती रहती है। मुझे न दिन में भूख लगती है, न रात को नींद आती है। मैंने मन-ही-मन समस्त विश्व को खोज डाला, पर इस कुरोग की औषध कहीं नहीं है।

चौपाई

मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥ कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रू॥ २ ॥

अर्थ:

माता का कुमत (बुरा विचार) पापों का मूल बढ़ई है। उसने हमारे हित का बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठ का कुयन्त्र बनाया और चौदह वर्ष की अवधिरूपी कठिन कुमन्त्र पढ़कर उस यन्त्र को गाड़ दिया। [यहाँ माताका कुविचार बढ़ई है, भरतको राज्य बसूला है, रामका वनवास कुयन्त्र है और चौदह वर्षकी अवधि कुमन्त्र है]।

चौपाई

मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा॥ मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ॥ ३ ॥

अर्थ:

मेरे लिये उसने यह सारा कुठाट (बुरा साज) रचा और सारे जगत् को बारहबाट (छिन्न-भिन्न) करके नष्ट कर डाला। यह कुयोग श्रीरामचन्द्रजी के लौट आने पर ही मिट सकता है और तभी अयोध्या बस सकती है, दूसरे किसी उपाय से नहीं।

चौपाई

भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्हि बहु भाँति बड़ाई॥ तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटिहि राम पग देखी॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी के वचन सुनकर मुनि ने सुख पाया और सभी ने उनकी बहुत प्रकार से बड़ाई की। [मुनि ने कहा--] हे तात! अधिक सोच मत करो। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का दर्शन करते ही सारा दुःख मिट जायगा।

दोहा

करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु। कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु॥ २१२ ॥

अर्थ:

इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजी ने उनका समाधान करके कहा--अब आप लोग हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनिये और कृपा करके कन्द-मूल, फल-फूल जो कुछ हम दें, स्वीकार कीजिये।