भरतजी का प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज संवाद
भरतजी प्रयाग पहुँचकर तीर्थ की वंदना करते हैं और महर्षि भरद्वाज के आश्रम में उपस्थित होते हैं। वहाँ उनके हृदय की सरलता, भक्ति और धर्मनिष्ठा से युक्त संवाद होता है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३२ / ४९
प्रकरण पाठ
देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे॥ सकल कामप्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
श्याम और सफेद (यमुना जी और गंगा जी की) लहरों को देखकर भरतजी का शरीर पुलकित हो उठा और उन्होंने हाथ जोड़ दिए। हे तीर्थराज! आप समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं। आपका प्रभाव वेदों में प्रसिद्ध और संसार में प्रकट है।
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू॥ अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी॥ ४ ॥
अर्थ:
मैं अपना धर्म (न माँगने का क्षत्रियधर्म) त्यागकर आपसे भीख माँगता हूँ। आर्त मनुष्य कौन-सा कुकर्म नहीं करता? ऐसा हृदय में जानकर सुजान उत्तम दानी जगत् में माँगनेवाले की वाणी को सफल किया करते हैं (अर्थात् वह जो माँगता है, सो दे देते हैं)।
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें॥ भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी॥ ३ ॥
अर्थ:
जैसे तपाने से सोने में चमक आ जाती है, वैसे ही प्रियतम के चरणों में नियम निबाहने से प्रेमी सेवक का गौरव बढ़ जाता है। भरतजी के वचन सुनकर बीच त्रिवेणी से कोमल, सुमंगल देनेवाली वाणी हुई।
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू॥ बादि गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
हे तात भरत! तुम सब प्रकार से साधु हो। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में तुम्हारा अथाह प्रेम है। तुम व्यर्थ ही मन में ग्लानि कर रहे हो। श्रीरामचन्द्र को तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है।
मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू॥ सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई॥ ४ ॥
अर्थ:
उनके मन में यह बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे [तो मैं क्या उत्तर दूँगा]। भरतजी के शील और संकोच को देखकर ऋषि बोले—भरत! सुनो, हम सब खबर पा चुके हैं। विधाता के कर्तव्य पर कुछ वश नहीं चलता।
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥ यह तुम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥ १ ॥
अर्थ:
सो वह श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का प्रेम ही तुम्हारा धन, जीवन और प्राण है; तुम्हारे समान बड़भागी कौन है? हे तात! तुम्हारे लिए यह आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि तुम दशरथजी के पुत्र और श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे भाई हो।
जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा॥ तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें॥ ३ ॥
अर्थ:
प्रयागराज में जब वे स्नान कर रहे थे, उस समय मैंने उनका यह मर्म जाना। वे तुम्हारे प्रेम में मग्र हो रहे थे। तुमपर श्रीरामचन्द्रजी का ऐसा ही (अगाध) स्नेह है जैसा मूर्ख मनुष्य का संसार में सुखमय जीवन पर होता है।
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥ उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥ १ ॥
अर्थ:
है तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजी के दास कुमुद और चकोर हैं [वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोर को दुःख होता है]; परन्तु यह तुम्हारा यशरूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं। जगद्रूपी आकाश में यह घटेगा नहीं, वरन् दिन-दिन दूना होगा।
कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही॥ निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू॥ २ ॥
अर्थ:
त्रैलोक्यरूपी चकवा इस यशरूपी चन्द्रमा पर अत्यन्त प्रेम करेगा और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का प्रतापरूपी सूर्य इसकी छवि को हरण नहीं करेगा। यह चन्द्रमा रात-दिन सदा सब किसी को सुख देनेवाला होगा। कैकेयी का कुकर्मरूपी राहु इसे ग्रास नहीं करेगा।
पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा॥ रामभगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ॥ ३ ॥
अर्थ:
यह चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर प्रेमरूपी अमृत से पूर्ण है। यह गुरु के अवमानरूपी दोष से दूषित नहीं है। तुमने इस यशरूपी चन्द्रमा की सृष्टि करके पृथ्वी पर भी अमृत को सुलभ कर दिया। अब श्रीरामजी के भक्त इस अमृत से तृप्त हो लें।
जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ। जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ॥ २०९ ॥
अर्थ:
जिनके प्रेम और संकोच (शील) के वश में होकर स्वयं [सच्चिदानन्दघन] भगवान् श्रीराम आकर प्रकट हुए, जिन्हें श्रीमहादेवजी अपने हृदय के नेत्रों से कभी अघाकर नहीं देख पाये (अर्थात् जिनका स्वरूप हृदय में देखते-देखते शिवजी कभी तृप्त नहीं हुए)।
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा॥ तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ॥ १ ॥
अर्थ:
आपने कीर्तिरूपी अनुपम चन्द्रमा को उत्पन्न किया, जिसमें श्रीरामप्रेम ही हिरन के रूप में बसता है। हे तात! तुम व्यर्थ ही हृदय में ग्लानि कर रहे हो। पारस पाकर भी तुम दरिद्रता से डर रहे हो!
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं॥ सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा॥ २ ॥
अर्थ:
हे भरत! सुनो, हम झूठ नहीं कहते। हम उदासीन हैं (किसी का पक्ष नहीं करते), तपस्वी हैं (किसी की मुँहदेखी नहीं कहते) और वन में रहते हैं (किसी से कुछ प्रयोजन नहीं रखते)। सब साधनों का उत्तम फल हमें लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी का दर्शन प्राप्त हुआ।
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा॥ भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन मुनि भयऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
[सीता-लक्ष्मणसहित श्रीरामदर्शनरूप] उस महान् फल का परम फल यह तुम्हारा दर्शन है। प्रयागराज समेत हमारा बड़ा भाग्य है। हे भरत! तुम धन्य हो, तुमने अपने यश से जगत् को जीत लिया है। ऐसा कहकर मुनि प्रेम में मग्र हो गये।
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥ धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा॥ ४ ॥
अर्थ:
मुनि के वचन सुनकर सभासद् हर्षित हो गये। 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओं ने फूल बरसाये। आकाश में और प्रयागराज में 'धन्य, धन्य' की ध्वनि सुन-सुनकर भरतजी प्रेम में मग्र हो रहे हैं।
तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ॥ मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू॥ २ ॥
अर्थ:
मैं सच्चे भाव से कहता हूँ। आप सर्वज्ञ हैं, और श्रीरघुनाथजी हृदय के भीतर की जाननेवाले हैं (मैं कुछ भी असत्य कहूँगा तो आपसे और उनसे छिपा नहीं रह सकता)। मुझे माता कैकेयी की करनी का कुछ भी सोच नहीं है। और न मेरे मन में इसी बात का दुःख है कि जगत् मुझे नीच समझेगा।
राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू॥ राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
फिर जिन्होंने श्रीरामचन्द्रजी के विरह में अपने क्षणभंगुर शरीर को त्याग दिया, ऐसे राजा के लिये सोच करने का कौन प्रसंग है? [सोच इसी बात की है कि] श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी पैरों में बिना जूती के मुनियों का वेष बनाये वन-वन में फिरते हैं।
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥ कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रू॥ २ ॥
अर्थ:
माता का कुमत (बुरा विचार) पापों का मूल बढ़ई है। उसने हमारे हित का बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठ का कुयन्त्र बनाया और चौदह वर्ष की अवधिरूपी कठिन कुमन्त्र पढ़कर उस यन्त्र को गाड़ दिया। [यहाँ माताका कुविचार बढ़ई है, भरतको राज्य बसूला है, रामका वनवास कुयन्त्र है और चौदह वर्षकी अवधि कुमन्त्र है]।
मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा॥ मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ॥ ३ ॥
अर्थ:
मेरे लिये उसने यह सारा कुठाट (बुरा साज) रचा और सारे जगत् को बारहबाट (छिन्न-भिन्न) करके नष्ट कर डाला। यह कुयोग श्रीरामचन्द्रजी के लौट आने पर ही मिट सकता है और तभी अयोध्या बस सकती है, दूसरे किसी उपाय से नहीं।
भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्हि बहु भाँति बड़ाई॥ तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटिहि राम पग देखी॥ ४ ॥
अर्थ:
भरतजी के वचन सुनकर मुनि ने सुख पाया और सभी ने उनकी बहुत प्रकार से बड़ाई की। [मुनि ने कहा--] हे तात! अधिक सोच मत करो। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का दर्शन करते ही सारा दुःख मिट जायगा।