श्रीभरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक

भरतजी और शत्रुघ्नजी अयोध्या पहुँचते हैं, पर नगर को शोकमग्न देखकर उनका हृदय व्याकुल हो उठता है। पिता महाराज दशरथ के देहावसान और श्रीरामजी के वनगमन का समाचार पाकर वे विलाप करने लगते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २६ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके॥ हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई॥ १ ॥

अर्थ:

हवाके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलोंको लाँघते हुए चले। उनके हृदय में बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। मन में ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुँच जाऊँ।

चौपाई

एक निमेष बरष सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई॥ असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा॥ २ ॥

अर्थ:

एक-एक निमेष वर्षके समान बीत रहा था। इस प्रकार भरतजी नगरके निकट पहुँचे। नगर में प्रवेश करते समय अपशकुन होने लगे। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरह से काँव-काँव कर रहे हैं।

चौपाई

खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला॥ श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा॥ ३ ॥

अर्थ:

गधे और सियार विपरीत बोल रहे हैं। यह सुन-सुनकर भरत के मन में बड़ी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं। नगर बहुत ही भयानक लग रहा है।

चौपाई

खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए॥ नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के वियोगरूपी बुरे रोग से सताये हुए पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी [ऐसे दुखी हो रहे हैं कि] देखे नहीं जाते। नगर के स्त्री-पुरुष अत्यन्त दुखी हो रहे हैं। मानो सब ने अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठी हो।

दोहा

पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं। भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं॥ १५८ ॥

अर्थ:

नगर के लोग मिलते हैं, पर कुछ कहते नहीं; चुपके से जोहार करके चले जाते हैं। भरतजी भी किसी से कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मन में भय और विषाद छा रहा है।

दोहा 159 के अंतर्गत
चौपाई

हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥ आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥ १ ॥

अर्थ:

बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगर में दसों दिशाओं में दावानल लगी है! पुत्र को आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमल के लिए चाँदनीरूपी कैकेयी [बड़ी] हर्षित हुई।

चौपाई

सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई॥ भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा॥ २ ॥

अर्थ:

वह आरती सजाकर आनन्द में भरकर उठ दौड़ी और दरवाजे पर ही मिलकर भरत को भवन में ले आई। भरत ने सारे परिवार को दुखी देखा। मानो कमलों के वन को पाला मार गया हो।

चौपाई

कैकेई हरषित एहि भाँती। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती॥ सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें॥ ३ ॥

अर्थ:

कैकेयी ही इस तरह हर्षित दीखती है मानो भीलनी जंगल में आग लगाकर आनन्द में भर रही हो। पुत्र को सोचित और मन मारे देखकर वह पूछने लगी--हमारे नैहर में कुशल तो है?

चौपाई

सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई॥ कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी ने सब कुशल कह सुनायी। फिर अपने कुल की कुशल-भलाई पूछी। [भरतजी ने कहा--] कहो, पिताजी कहाँ हैं? मेरी सब माताएँ कहाँ हैं? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं ?

दोहा

सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन। भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन॥ १५९ ॥

अर्थ:

पुत्र के स्नेहमय वचन सुनकर नेत्रों में कपट का जल भरकर पापिनी कैकेयी भरत के कानों में और मन में शूल के समान चुभने वाले वचन बोली--

दोहा 160 के अंतर्गत
चौपाई

तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी॥ कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मंथरा सहायक हुई। पर विधाता ने बीच में जरा-सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा स्वर्गलोक को पधार गये।

चौपाई

सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा॥ तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी॥ २ ॥

अर्थ:

भरत यह सुनते ही विषाद के मारे विवश हो गये। मानो सिंह की गर्जना सुनकर हाथी सहम गया हो। वे “तात! तात! हा तात!” पुकारते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर जमीन पर गिर पड़े।

चौपाई

चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही॥ बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी॥ ३ ॥

अर्थ:

[और विलाप करने लगे कि] हे तात! मैं आपको [स्वर्ग जाते समय] चलते हुए देख भी न सका। [हाय!] आप मुझे श्रीरामजी को सौंप भी नहीं गये! फिर धीरज धरकर वे सँभलकर उठे और बोले--माता! पिताके मरने का कारण तो बताओ।

चौपाई

सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई॥ आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी॥ ४ ॥

अर्थ:

पुत्र का वचन सुनकर कैकेयी कहने लगी। मानो मर्मस्थान को पाछकर उसमें जहर भर रही हो। कुटिल और कठोर कैकेयी ने अपनी सब करनी शुरू से आखिर तक बड़े प्रसन्न मन से सुना दी।

दोहा

भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु। हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु॥ १६० ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के वन जाना सुनकर भरतजी को पिताके मरने का ध्यान भी न रहा और हृदय में इस सारे अनर्थ का कारण अपने को ही जानकर वे मौन होकर स्तम्भित रह गये।

दोहा 161 के अंतर्गत
चौपाई

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥ तात राउ नहिं सोचै जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू॥ १ ॥

अर्थ:

पुत्र को व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जले पर नमक लगा रही हो। [वह बोली--] हे तात! राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका पर्याप्त भोग किया।

चौपाई

जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए॥ अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू॥ २ ॥

अर्थ:

जीवनकाल में ही उन्होंने जन्म लेने के सम्पूर्ण फल पा लिये और अन्त में वे इन्द्रलोक को चले गये। ऐसा विचारकर सोच छोड़ दो और समाजसहित नगर का राज्य करो।

चौपाई

सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू॥ धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापिनि सबहि भाँति कुल नासा॥ ३ ॥

अर्थ:

राजकुमार भरतजी यह सुनकर बहुत ही सहम गये। मानो पके घाव पर अँगार छू गया हो। उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लंबी साँस लेते हुए कहा--पापिनी ! तूने सभी तरह से कुल का नाश कर दिया।

चौपाई

जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही॥ पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा॥ ४ ॥

अर्थ:

हाय! यदि तेरी ऐसी ही अत्यन्त बुरी रुचि थी, तो तूने जन्मते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला? तूने पेड़ को काटकर पत्ते को सींचा है और मछली के जीने के लिए पानी को उलीच डाला! (अर्थात् मेरा हित करने जाकर उलटा तूने मेरा अहित कर डाला)।

दोहा

हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ। जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ॥ १६१ ॥

अर्थ:

मुझे सूर्यवंश-सा वंश, दशरथजी-सरीखे पिता और राम-लक्ष्मण-से भाई मिले। पर हे जननी! मुझे जन्म देनेवाली माता तू हुईं! [क्या किया जाय!] विधाता से कुछ भी वश नहीं चलता।

दोहा 162 के अंतर्गत
चौपाई

जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ हृदउ न गयऊ॥ बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा॥ १ ॥

अर्थ:

अरी कुमति! जब तूने हृदय में यह बुरा विचार (निश्चय) ठाना, उसी समय तेरे हृदय के टुकड़े-टुकड़े [क्यों] न हो गये? वरदान माँगते समय तेरे मन में कुछ भी पीड़ा नहीं हुई? तेरी जीभ गल नहीं गयी? तेरे मुँह में कीड़े नहीं पड़ गये?

चौपाई

भूपँ प्रतीति तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही॥ बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी॥ २ ॥

अर्थ:

राजाने तेरा विश्वास कैसे कर लिया? [जान पड़ता है,] विधाता ने मरने के समय उनकी बुद्धि हर ली थी। विधि भी नारी के हृदय की गति नहीं जान सके। वह सम्पूर्ण कपट, पाप और अवगुणों की खान है।

चौपाई

सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ॥ अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर राजा तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे। वे भला, स्त्री-स्वभाव को कैसे जानते? और, जगत् के जीव-जन्तुओं में ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी प्राणों के समान प्यारे नहीं हैं?

चौपाई

भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही॥ जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहि जाई॥ ४ ॥

अर्थ:

वे श्रीरामजी भी तुझे अहित हो गये (वैरी लगे)! तू कौन है? मुझे सच-सच कह! तू जो है, सो है, अब मुँह में स्याही पोतकर (मुँह काला करके) उठकर मेरी आँखों की ओट में जा बैठ।

दोहा

राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि। मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि॥ १६२ ॥

अर्थ:

विधाता ने मुझे श्रीरामजी से विरोध करनेवाले हृदय से उत्पन्न किया [अथवा विधाता ने मुझे हृदय से राम का विरोधी जाहिर कर दिया]। मेरे बराबर पापी दूसरा कौन है? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूँ।

दोहा 163 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई॥ तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई॥ १ ॥

अर्थ:

माता की कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजी के सब अंग क्रोध से जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय कुबरी वहाँ आई। उसने भाँति-भाँति के वस्त्र और आभूषण बनाकर (पहनकर) रखे थे।

चौपाई

लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई॥ हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा॥ २ ॥

अर्थ:

उसे देखकर लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोध से भर गये। मानो जलती हुई आग को घी की आहुति मिल गयी हो। उन्होंने जोर से लात तानकर कूबड़ पर प्रहार किया। वह चिल्लाती हुई मुँह के बल धरती पर गिर पड़ी।

चौपाई

कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू॥ आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा॥ ३ ॥

अर्थ:

उसका कूबड़ टूट गया, सिर फट गया, दाँत टूट गये और मुँह से खून बहने लगा। [वह कराहती हुई बोली—] हाय दैव! मैंने क्या बिगाड़ा? जो भला करते, बुरा फल पाया।

चौपाई

सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी॥ भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई॥ ४ ॥

अर्थ:

उसकी यह बात सुनकर और उसे नख से शिखा तक दुष्ट जानकर शत्रुघ्नजी झोंटा पकड़-पकड़कर उसे घसीटने लगे। तब दयानिधि भरतजी ने उसको छुड़ा दिया और दोनों भाई कौसल्याजी के पास गये।