मंगलाचरण
अयोध्याकांड का आरंभ भगवान शिव, गुरु और संतजनों की वंदना से होता है। तुलसीदास इस मंगलाचरण में श्रद्धा, विनय और शुभभाव का आवाहन करते हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण १ / ४९
प्रकरण पाठ
यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्। सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्॥ १ ॥
अर्थ:
जिनकी गोद में हिमाचलसुता पार्वतीजी, मस्तक पर गङ्गाजी, ललाट पर बालचन्द्रमा, कण्ठ में हलाहल विष और वक्षःस्थल पर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, संहारकर्ता [या भक्तों के पापों के नाशक], सर्वव्यापक, कल्याणरूप, चन्द्रमा के समान शुभ्रवर्ण श्रीशङ्करजी सदा मेरी रक्षा करें।
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः। मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा॥ २ ॥
अर्थ:
रघुकुल को आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी के मुखारविन्द की जो शोभा राज्याभिषेक से (राज्याभिषेक की बात सुनकर) न तो प्रसन्नता को प्राप्त हुई और न वनवास के दुःख से मलिन ही हुई, वह (मुखकमल की छवि) मेरे लिए सदा सुन्दर मंगलों की देनेवाली हो।
नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्। पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥ ३ ॥
अर्थ:
नीले कमल के समान श्याम और कोमल जिनके अंग हैं, श्रीसीताजी जिनके वाम भाग में विराजमान हैं और जिनके हाथों में [क्रमशः] अमोघ बाण और सुन्दर धनुष है, उन रघुवंश के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी को मैं नमस्कार करता हूँ।