आन उपाउ मोहि नहिं सूझा

चौपाई १, दोहा १८३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

आन उपाउ मोहि नहिं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा॥ एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥ १ ॥

अर्थ

मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता। श्रीरामजी के बिना मेरे हृदय की बात कौन जान सकता है? मन में एक ही निश्चय है कि प्रातःकाल प्रभु श्रीरामजी के पास चल दूँगा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १८३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी