सोचिअ बयसु कृपन धनवानू

चौपाई ३, दोहा १७२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥ सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥ ३ ॥

अर्थ

उस वैश्य का सोच करना चाहिये जो धनवान् होकर भी कंजूस है, और जो अतिथि-सत्कार तथा शिवजी की भक्ति करने में कुशल नहीं है। उस शूद्र का सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणों का अपमान करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मान-बड़ाई चाहनेवाला और ज्ञान का घमंड रखनेवाला है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १७२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी