सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ

दोहा १७१ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥ १७१ ॥

अर्थ

मुनिनाथने विलखकर (दुखी होकर) कहा-हे भरत! सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान्‌ है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाताके हाथ हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का दोहा १७१ है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी