मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई

चौपाई २, दोहा १८५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई॥ धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं॥ २ ॥

अर्थ

मुनि वसिष्ठजी की वन्दना करके और भरतजी को सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घर को चले। जगत् में भरतजी का जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेह की सराहना करते जाते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी