सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना
चौपाई २, दोहा १७२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥ सोचिअ नृपति जो नीति न जाना जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥ २ ॥
अर्थ
सोच उस ब्राह्मण का करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय-भोग में ही लीन रहता है। उस राजा का सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणों के समान प्यारी नहीं है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १७२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी