सोचिअ पुनि पति बंचक नारी
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी
चौपाई ४, दोहा १७२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥ सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥ ४ ॥
अर्थ
पुनः उस स्त्री का सोच करना चाहिये जो पति को छलने वाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रत को छोड़ देता है और गुरु की आज्ञा के अनुसार नहीं चलता।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १७२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी