गुर पितु मातु स्वामि हित बानी
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी
चौपाई २, दोहा १७७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी॥ उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू॥ २ ॥
अर्थ
[क्योंकि] गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृद् (मित्र) की वाणी सुनकर प्रसन्न मन से उसे अच्छी समझकर करना (मानना) चाहिये। उचित-अनुचित का विचार करने से धर्म जाता है और सिर पर पाप का भार चढ़ता है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १७७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी