बैखानस सोइ सोचै जोगू
बैखानस सोइ सोचै जोगू
चौपाई १, दोहा १७३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बैखानस सोइ सोचै जोगू। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥ सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥ १ ॥
अर्थ
वानप्रस्थ वही सोच करने योग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओं के साथ विरोध रखनेवाला है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी