कैकेई भव तनु अनुरागे
कैकेई भव तनु अनुरागे
चौपाई १, दोहा १८० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कैकेई भव तनु अनुरागे। पावँर प्रान अघाइ अभागे॥ जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे॥ १ ॥
अर्थ
कैकेयी से उत्पन्न देह में प्रेम करनेवाले ये पामर प्राण भरपेट (पूरी तरह से) अभागे हैं। जब प्रिय के वियोग में भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं तब अभी आगे मैं और भी बहुत कुछ देखूँ-सुनूँगा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १८० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी