कौसल्या धरि धीरजु कहई

चौपाई १, दोहा १७६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई॥ सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी॥ १ ॥

अर्थ

कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं-हे पुत्र! गुरुजी की आज्ञा पथ्यरूप है। उसका आदर करना चाहिये और हित मानकर उसका पालन करना चाहिये। काल की गति को जानकर विषाद का त्याग कर देना चाहिये।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १७६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी