भा सब कें मन मोदु न
भा सब कें मन मोदु न
चौपाई १, दोहा १८५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥ चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥ १ ॥
अर्थ
सब के मन में कम आनन्द नहीं हुआ (अर्थात् बहुत ही आनन्द हुआ)! मानो मेघों की गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। [दूसरे दिन] प्रातःकाल चलने का सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभी को प्राणप्रिय हो गये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी