कहहिं परसपर भा बड़ काजू

चौपाई ३, दोहा १८५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कहहिं परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू॥ जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी॥ ३ ॥

अर्थ

आपस में कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलने की तैयारी करने लगे। जिसको भी घर की रखवाली के लिये रहना हो, ऐसा कहकर रखते हैं, वही समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी