नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना
चौपाई ३, दोहा १७४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना॥ करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई॥ ३ ॥
अर्थ
राजा को वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात! पिता के वचनों को प्रमाण (सत्य) करो! राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह भलाई है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १७४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी