रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा

चौपाई २, दोहा १७४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा॥ तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी॥ २ ॥

अर्थ

राजा ने राजपद तुमको दिया है। पिता का वचन तुम्हें सत्य करना चाहिये, जिन्होंने वचन के लिये ही श्रीरामचन्द्रजी को त्याग दिया और राम-विरह की अग्नि में अपने शरीर की आहुति दे दी।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १७४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी