अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं
दोहा १७४ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन॥ १७४ ॥
अर्थ
जो अनुचित और उचित का विचार छोड़कर पिता के वचनों का पालन करते हैं, वे [यहाँ] सुख और सुयश के पात्र होकर अन्त में इन्द्रपुरी (स्वर्ग) में निवास करते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का दोहा १७४ है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी