सरुज सरीर बादि बहु भोगा

चौपाई ३, दोहा १७८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा॥ जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥ ३ ॥

अर्थ

रोगी शरीर के लिए नाना प्रकार के भोग व्यर्थ हैं। श्रीहरि की भक्ति के बिना जप और योग व्यर्थ हैं। जीव के बिना सुन्दर देह व्यर्थ है। वैसे ही श्रीरघुनाथजी के बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १७८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।

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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी