कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू
कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू
चौपाई ४, दोहा १८५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू॥ ४ ॥
अर्थ
कोई-कोई कहते हैं—रहने के लिये किसी को भी मत कहो, जगत् में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता ?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ द्वारा भरत को धर्म-उपदेश और चित्रकूट यात्रा की तैयारी का वर्णन है।
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वसिष्ठ-भरत संवाद, चित्रकूट यात्रा की तैयारी